डियर प्राइम मिनिस्टर, हिंदुस्तान में लोग सिर्फ मरने के लिए पैदा नहीं होते..

प्रशांत तिवारी

किसी ने मुझसे पूछा कि मुजफ्फरनगर रेल हादसे के बाद क्या बयान आएगा? मैंने कहा कि साहब लोगों का क्या बयान आ सकता हैं. वो हमें भी पता है और आपको भी क्योंकि आज़ादी के बाद से आज तक कई सरकारें बदली, सदियां तक बदल गई पर बयान आज भी वही हैं की ‘हमें दुःख हैं इस हादसे पर और मरने वालों को इतने लाख और घायलों को इतने हज़ार का मुआवज़ा दिया जाएगा’.

कोई यहां ज़िन्दगी के बदले कम से कम और ज़िंदगियां बचाने का वादा तक नहीं करता. उसके बाद भी लगातार और हादसे होते हैं. रेलवे में सफर करने वाले लोग ये सोच कर घर से निकलते हैं.कि सही सलामत मंज़िल तक पहुंच जाएँ किसी तरह.रेलवे में लगातार पैसे बढाए ई वेटिंग टिकट के कैंसिल करने पर भी चार्ज काट कर रेलवे को मुनाफा दिया, तत्काल टिकट को महंगा कर प्रीमियम तत्काल निकाला जनता के आंखों पर विकास कि पट्टी बांध कर खूब लूटा आपने.

पर हमने कभी उफ़ तक नहीं की. आपने बुलेट ट्रेन चलाने की योजना तैयार कर ली. आप के साथ वो भी खुश थे जिनकी हैसियत कभी उस ट्रैन में बैठने की नहीं थी. उनका कहना था चलो हमरे देश में बुलेट ट्रैन आ गई हैं भैया. साल 1947 से आज तक रेलवे के जनरल कोच को आपने बढ़वाने के बारे में नहीं सोचा. लोग जानवरों से भी बद्द्तर तरीके से बैठ कर अपनी यात्रा करते हैं और अगर कोई गलती से स्लीपर क्लास में बैठ जाए तो आपके ही सरकारी लोग जो हमारे ही पैसों पर पलते हैं, बड़ी बदतमीज़ी से बात करते हुए आपके ही देश के नागरिक को ऐसे भागते हैं जैसे ग़ुलामी के वक़्त में अंग्रेज हमें दुत्कार दिया करते थे.

फिर किसी तरह रोने गिड़गिड़ाने के बाद कुछ पैसे रिश्वत लेने के बाद वो टीटीई उन्हें स्लीपर क्लास की ज़मीं पर बैठने की अनुमति ऐसे देता था जैसे हम आज भी उसके ग़ुलाम हैं. लिखना शुरू कर दूँ अगर रेलवे पर तो प्रभुजी आपकी और मोदीजी दोनों की आंखें शर्म झुक जायेगी फिर एहसास होगा आपको की आज़ादी के एकहत्तर साल बाद भी हिंदुस्तान को बुलेट ट्रैन नहीं.

उससे भी ज़्यादा ज़रूरी पटरियों की मरम्मत और हर ट्रैन में जनरल बोगियों और स्लीपर बोगियों और ज़्यादा ट्रैन चलाने की ज़रूरत हैं ताकि आपके ही देश का यात्री सुकून से यात्रा कर सके.. पर कहां सोचेंगे आप इन बुनियादी ज़रूरतों को. आप तो खुद को व्यापारी कहते हैं ना सिर्फ मुनाफों से मतलब जान की कीमत मुआवज़े के चंद टुकड़े उसके बाद फिर हादसे तो होते रहते हैं.  रेल मंत्री जी इस्तीफ़ा दे कर अपनी जवाबदेही ख़त्म कर लेते हैं, कहते हैं हमारा देश बदल रहा.

साहब आप तो कहते हैं सोच बदलो देश बदलेगा आपकी सोच कब बदलेगी सर? कब हम सुकून भरी सांस ले पाएंगे कब जी पाएंगे खुली हवा में? क्योंकि हम थक गए हैं रोज मर-मर के. कभी आपकी सियासत मारती हैं तो कभी आपकी लापरवाही और कुछ बच्चे तो सर मज़ाक-मज़ाक में ही मर जाते हैं और आपके ही मंत्री कहते हैं की अगस्त का महीना मरने का ही होता हैं.

वो बिल्कुल सही कहते हैं इतिहास गवाह हैं की सियासी वहशियत का शिकार लोग अगस्त के महीने में ही सब से ज़्यादा हुए हैं. बात करते हैं आज़ादी के वक़्त की 1947 की जब हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बंटवारे में जिसमें लगभग 20 लाख लोग मारे गए थे तब वो महीना भी शायद अगस्त का ही था सर.

हम आज़ाद तो हैं गये पर हुकूमत और सियासत करने का तरीका हमने अंग्रेज़ों का ही अपनाया है… फिर आप खुद ही सोचे हमें आज़ादी किस चीज़ से मिली थी. साहब आप कुछ नहीं कर सकते तो कम से कम अपने मंत्रियों से बोलिये की अगर इतिहास को बदलने की औकात नहीं हैं तो बोलना बंद कर दें.

हिंदुस्तानी जब हज़ारों सालों की ग़ुलामी झेल सकते हैं तो फिर आपकी गन्दी सियासत भी झेल लेंगे और आपकी ही राजनीति गन्दी नहीं हैं जितने आये उतनों की ऐसी ही हैं आपसे तो बदलाव की उम्मीद थे सर पर आप और आपकी ईमानदारी भी औरों सी ही निकली. शर्मिंदा हैं पूरा हिंदुस्तान की आज तक उसे समझने वाला कोई नहीं मिला. जब आपने जनता से पूछा था की इस बार आज़ादी के दिन लाल किले पर किस बारे में बोले तब मैंने आपको एक ख़त लिखा था पर शायद आपने पढ़ा नहीं होगा क्योंकि अब आपके पास वक्त कहा हिन्दुस्तान को सुनने का. ढोंग करना बंद कर दीजिए अब आपके अंदर से वो चायवाले की मिठास ख़त्म हो गई होगी जो ज़मीं पे बैठे इंसान के अंदर होती है. अब तो आप प्रधान सेवक हैं सर. आप सेवा करिये. हम भी सेवा करेंगे. क्योंकि आपको इसकी ज़िम्मेदारी देश की जनता ने दी हैं और मुझे खुद इस देश ने. चैन से बैठने नहीं देंगे आपको. अब उठना पड़ेगा. राजनीति से अलग हटकर काम करना पडेगा. क्योंकि अब हिंदुस्तान में लोग सिर्फ मरने के लिए पैदा नहीं होते.

प्रशांत तिवारी इंडिया न्यूज में पत्रकार हैं.

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