बैंडवालों की ज़िन्दगी के बारे में बताती ‘कलाकार’

असद उल्लाह 

हमारा समाज अपने आस पास बहुत सारी विडम्बनाओं और अंर्तविरोधों को सहेज कर रखता है. उस पर नज़र पड़ना या नहीं पड़ना, बेशक हमारी अपनी संवेदनाओं का मामला है. मसलन, मध्य वर्गीय परिवारों में होने वाली शादियों में बजने वाले बैंड और उन्हें बजाने वालों से हमारा सामना अक्सर होता है, लेकिन हम शायद ही कभी रूककर उनकी ज़िन्दगी के बारे में जानने की कोशिश करते हैं. ‘कलाकार’ डाक्यूमेंट्री चौदह मिनट की छोटी सी अवधि में ऐसे ‘कलाकारों’ के जीवन के संघर्षों और विडम्बनाओं को छूने की कोशिश करती है. यह मुख्य तौर पर शामली में रहने वाले ऐसे ही एक बैंडमास्टर वकीलू खान की ज़िन्दगी के बारे में हमें बताती है. वकीलू ने बैंडमास्टर के रूप में ये पेशा मजबूरी में चुना है, लेकिन वे बताते हैं कि उन्हें यह कला विरासत में अपने बड़े भाई से मिली है.

बड़े भाई शहनाई बजाते थे और उनकी मौत फेफड़े ख़राब होने की वजह से हुयी, वे जोड़ते हैं. पिछले 35 सालों से बैंड बजाकर वकीलू आठ लोगों के परिवार को पाल पोस रहे हैं. क्रान्ति फिल्म के मशहूर गाने ‘चना जोर गरम’ से लेकर ग़दर फिल्म के गाने ‘मैं निकला’ के लम्बे अंतराल में फैले उनके इस ‘करियर’ से आप वकीलू  के चेहरे की झुर्रियों की उम्र का पता लगा सकते हैं. जाहिर है कि फिल्म उनको केंद्र में रखकर इन बैंडवालों के जीवन की परतों को समझने की कोशिश करती है. ये पूछने पर कि क्या उनकी आने वाली पीढ़ी इस काम को सीखेंगी, वे बताते हैं कि उनके साथ ही इस काम का ‘एंड’ हो रहा है. हालांकि इसके पीछे जो वजह वो बताते हैं, वह कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है. बैंड बजाते हुये उन्हें कई बार पिटना पड़ा है.कई बार लोगों के आक्रामक व्यवहार ने भी उन्हें परेशान किया है. उनके बच्चे ये अपमान झेलना नहीं चाहते.

अपने में बहुत महत्वपूर्ण बात होने के बावजूद ये संवाद फिल्म में बहुत सशक्त होकर सामने नहीं आ पाया है. जबकि यह इस डाक्यूमेंट्री की ताकत हो सकता था. इस बात को थोड़ा और उकेरा जाता, तो शायद फिल्म अपने विषय के साथ अधिक न्याय करती. आखिर मजबूरी में चुने गये पेशे की ऐसे कीमतें हमारे समाज का बहुत बड़ा हिस्सा चुकाता है.फिर मध्य वर्गीय शादियों की संस्कृति का खोखलापन भी यहीं से जाहिर होता है. ठीक इसी तरह वकीलू खान जहां ये कहते हैं कि उन्होंने यह काम अपने विकलांग बेटे की वजह से चुना, वहां भी फिल्म थोड़ी अधिक रचनात्मक हो सकती थी. फिल्म की सिनेमेटोग्राफी काफी अच्छी है, लेकिन सम्पादन कहीं कहीं कमजोर हो गया है. सबसे बड़ी बात ये कि फिल्म बतौर व्यक्ति कफीलू खान की ज़िन्दगी के पहलुओं को तो संजीदगी से छूने की कोशिश करती है, लेकिन किस तरह ये विडंबनायें ‘कलाकार’ कफीलू खान को प्रभावित कर रही हैं, ये स्थापित नहीं कर पाती.

दरअसल, इन मायनों में फिल्म वकीलू खान जैसे लोगों की ज़िन्दगी का एक समाजशास्त्रीय चित्र हमारे सामने ज्यादा रखती है. वैकल्पिक कलाकारों जैसी थीम बहुत विस्तृत है और संभवतः इस पर काफी डाक्यूमेंट्री फ़िल्में भी बनी हैं. चौदह मिनट की अवधि इस लिहाज से बहुत छोटी भी है. बावजूद इसके पूरी फिल्म वकीलू खान जैसे भूले बिसरे और कलाकारों के जीवन की विडम्बनाओं का एहसास हमें कराती है.

असद उल्लाह

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