‘डेरा सच्चा सौदा’ जैसी संस्थाओं का पनपना राज्य के इकबाल का मर जाना है !

अभिनव श्रीवास्तव

बीते 25 अगस्त को यह तय हो गया था कि खुद को राम रहीम कहने वाले डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत सिंह का अगला ‘डेरा’ जेल होगा. उनको सजा सुनाने का काम बाकी था और यह काम सीबीआई की विशेष अदालत ने कल दो ‘साध्वियों’ के बलात्कार के अपराध में कुल बीस वर्ष की सजा सुनाकर पूरा कर दिया.

वैसे उन पर ये आरोप बहुत पहले साबित हो जाने चाहिये थे. आखिर जिन दो महिलाओं ने गुरमीत सिंह के बार बार बलात्कारी होने की बात कही, उन्होंने इस देश की व्यवस्था से न्याय की आस करीब पंद्रह बरसों तक बांधे रखी. हम जिस समाज में रहते हैं, वहां अपनी देह और मन पर बलात्कार जैसा आघात झेलने के बाद इतने समय तक न्याय की लड़ाई लड़ना कितना मुश्किल होता है, यह बताने की आवश्यकता नहीं है.

लेकिन इसे कुछ हमारी न्याय व्यवस्था की लेट लतीफी कहें और कुछ गुरमीत सिंह जैसे अपराधियों की ताकत, जिसके चलते अक्सर समाज के कमजोर और पिछड़े तबकों की किस्मत में हर तरह से तोड़ देने वाला इंतजार आता है. बहुत बार तो इस इंतज़ार के बाद भी न्याय नहीं मिल पाता. निश्चय ही, इस लिहाज से गुरमीत सिंह के खिलाफ आये पंचकुला कोर्ट के फैसले ने न्याय व्यवस्था में कुछ भरोसा बहाल किया है.

लेकिन न्याय के इस भरोसे को जल्द ही उस भयावह हिंसा, आगजनी और उत्पात ने ठेंगा दिखाया जिसकी आशंका अदालत मामले की सुनवाई से एक दिन पहले ही जता रही थी. यह सब इतने खुल्लम खुल्ला अंदाज में हुआ कि एक बारगी ये समझना मुश्किल हो गया कि आखिर सरकार इस हिंसा और क्षति को रोकने के लिये खड़ी थी या उसके सामने अपनी लाचारी दिखाने और आत्मसमर्पण करने के लिये.

दरअसल सरकार और राज्य की यह भूमिका ही इस पूरे प्रकरण की दुखती नस है, जिस पर अगर हाथ रख दिया जाये तो गुरमीत सिंह के खिलाफ सजा से जगा भरोसा तार तार हो जाता है.

जाहिर है कि तब बात सिर्फ क़ानून और व्यवस्था जैसे मसलों पर नाकामी की नहीं रह जाती, वह बहुत दूर तलक जाकर राज्य, हमारी सरकारों और उनकी गिरती हुयी वैधता की एक बेहद स्याह सच्चाई को छूने लगती है. आश्चर्य नहीं कि इस सच्चाई को छिपाने में प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से हमारे लोकतंत्र की हर संस्था शामिल रही है.

निश्चय ही, पंजाब में डेरों के फलने फूलने का अपना एक अलग समाजशास्त्र रहा है. निम्न मध्यम वर्ग, दलित और पिछड़ी समुदायों को ऐसी संस्थाओं ने अपनी तरह से इंगेज किया है. निस्संदेह, भारत के कुछ हिस्सों में आज भी आधुनिक राजनीति और लोकतंत्र देसी समाजों के यथार्थ और उनकी जटिलताओं को समझ नहीं पायी है. इस चलते ये समाज एक खालीपन का शिकार होते हैं और कई बार इस खालीपन का विकल्प उन्हें इन डेरों में दिखायी पड़ता है.

ये भी सच है कि ऐसी संस्थायें अपने लिये एक से ज्यादा चेहरे और पहचानें गढ़ती हैं. मसलन, गुरमीत सिंह कभी स्वयं को शराब छुड़ाने से लेकर आपदाओं में लोगों की मदद करने वाला ‘इंसान’ बताते हैं, तो कभी फिल्मों में जाकर एक बेहद लोकप्रिय पहचान भी ओढ़ लेते हैं. इस तरह से उनकी स्वीकार्यता का आधार कुछ फ़ैल जाता है. इस पूरे मामले में कुछ और नहीं हुआ, बल्कि उनकी एक ‘छिपी’ हुयी पहचान अदालत के दरवाजे तक पहुंच गयी.

लेकिन इस पहचान को अदालत तक पहुंचाने का काम राज्य और सरकारों ने नहीं किया. उन्होंने तो इस मामले को भरसक छिपाने की ही कोशिश की. भाजपा सरकार के कई वरिष्ठ नेताओं और खुद हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर की गुरमीत सिंह के साथ सामने आई तस्वीरें हमें याद दिलाती हैं कि गुरमीत सिंह की कारगुजारियों को संस्थागत करने का काम बरसों तक बेहद नियोजित ढंग से चला. अपनी राजनीतिक वैधता अर्जित करने के लिये तमाम नेता गुरमीत सिंह और डेरे की शरण लेते रहे. पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने भी लगभग इसी बात को अपनी सुनवाई में दोहराया.

वास्तव में गुरमीत सिंह और उनकी संस्थायें राज्य की अपनी वैधता में आने वाली गिरावट का ही नतीजा हैं. इस गिरावट के कई पहलू हैं, लेकिन गुरमीत सिंह जैसों का डेरा प्रमुख से बढ़कर क्षेत्रीय बुर्जुआ बन जाना इसका सबसे बड़ा नतीजा है. इस लिहाज से देखें तब ये पता चलता है कि गुरमीत सिंह को खड़ा करने की जमीन खुद राज्य ने ही धीरे धीरे तैयार की, उसे समय समय पर सींचा और संरक्षण दिया. ऐसा दुबारा नहीं होगा, इसकी गारंटी नहीं ली जा सकती.

अभिनव श्रीवास्तव

 

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