नोटबंदी को लेकर सामने आया मोदी सरकार का सबसे बड़ा झूठ

गिरीश मालवीय

पूर्व रिजर्व बैंक गवर्नर रघुराम राजन ने कल एक एक नया खुलासा किया जिससे नोटबन्दी को लेकर मोदी सरकार का सबसे बड़ा झूठ सामने आ गया है. अपनी किताब में राजन ने लिखा है कि उनके कार्यकाल के दौरान कभी भी आरबीआई ने नोटबंदी पर फैसला नहीं लिया था.
 

अब आप को याद होगा कि 8 नवम्बर 2016 को मोदी जी ने नोटबन्दी का निर्णय लिया और उस वक्त सरकार ने यह भी कहा था कि लगभग छ महीनो से इस निर्णय पर काम चल रहा है यानी 2000 के नए नोट छापे जा रहे है.
 

अब सबसे मजे की बात देखिए कि 4 सितम्बर को राजन के कार्यकाल का आखिरी दिन था यानी नोटबन्दी के निर्णय से ठीक 2 महीने ओर मात्र 4 दिन पहले, यानी या तो ये बात झूठी हैं कि तैयारी 6 महीने से चल रही थी या ये कि राजन झूठ बोल रहे हैं क्योंकि राजन ने अब यह साफ साफ बोल दिया है कि “मैंने कभी भी नोटबंदी का समर्थन नहीं किया बल्कि नरेंद्र मोदी सरकार को नोटबंदी के खतरों के बारे में चेतावनी दी थी.”
 

यानी नोटबन्दी की बात उनके सामने जरूर आयी थी और उन्होंने इस पर सख्ती से मना कर दिया था, चूंकि जितने भी नए नोट आये है उन पर उर्जित पटेल के हस्ताक्षर है जो 5 सितम्बर को गवर्नर बने. इससे भी यह बात साफ हो जाती है कि यह नोट 2 महीने पहले ही छपना शुरू हुए होंगे. क्योंकि 2000 के नोट में उनके नाम व हस्ताक्षर के ही ब्लॉक मुद्रित हैं.

 

और अगर ऐसा नही है और यह नोट वाकई में पहले से छप रहे है तो यह रिजर्व बैंक के गवर्नर की अनुमति के बिना कैसे छप रहे थे? इन नोट पर उर्जित पटेल के हस्ताक्षर वाले ब्लॉक कैसे आ गए? क्या यह विषय रिजर्व बैंक की नोट छापने की अधिकारिता में सीधे सीधे मोदी जी के हस्तक्षेप का नही है?

 

वैसे आपको बता दूं कि हिंदुस्तान टाइम्स ने अपनी पड़ताल में सबूत जुटाए कि रघुराम राजन के गवर्नर रहते उर्जित पटेल के हस्ताक्षर नए नोटों पर छपाई के लिए भेजे गए. दिसंबर में आरबीआई ने संसदीय समिति को बताया कि 2000 रुपये के नोट छापने के लिए उन्हें 7 जून 2016 को अनुमति मिली थी.
 

खुद राजन ने सरकार को नोटबन्दी के लिए साफ साफ मना कर दिया था और इस से संबंधित रिपोर्ट भी उन्होंने सरकार को दी थी जिसमे कि आरबीआई ने नोट में नोटबंदी के पड़ने वाले प्रभावों, ओर नुकसान के बारे में बताया. साथ ही सरकार जिन उद्देश्यों को पूरा करना चाहती थी कि उनके वैकल्पिक रास्ते भी बताए गए थे.

 

इसमें कहा गया कि अगर सरकार नफा-नुकसान पर गौर करने के बाद भी नोटबंदी पर आगे बढ़ना चाहती है तो उसके लिए समय और तैयारियों की जरूरत होगी. यह भी बताया कि बिना तैयारी के खराब नतीजा ही निकलेंगे.

 

सरकार ने इस रिपोर्ट की सिफारिशों को नही माना. नए गवर्नर उर्जित पटेल पर दबाव डाल कर पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया को दरकिनार करते हुए नोटबन्दी का निर्णय लिया, जिसके परिणाम वैसे ही निकले जैसे रघुराम राजन ने कहे थे.
उर्जित पटेल भी इस मामले में उतने ही जिम्मेदार है क्योंकि उन्होंने रिजर्व बैंक की स्वायत्तता को गिरवी रख दिया.

 

यह पोस्ट गिरीश मालवीय के फेसबुक वाल से साभार

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here