गौरी लंकेश का वह साक्षात्कार जो गौरी ने ‘लंकेश पत्रिके’ के संपादन की जिम्मेदारी संभालते वक्त दिया था !

हमारे दौर में होने वाली वैचारिक और राजनीतिक हत्याओं की कड़ी में बीते दिनों कन्नड़ साप्ताहिक ‘लंकेश पत्रिके’ की संपादक गौरी लंकेश का नाम भी जुड़ गया. गौरी देश में दिनों दिन गहरा रहे जिस राजनीतिक माहौल के खिलाफ लड़ रही थीं, अंततः उस माहौल ने ही उनकी जान ले ली. हम लगभग डेढ़ दशक पहले रेडिफ.कॉम को दिये गये गौरी के इंटरव्यू का अनुदित अंश साझा कर रहे हैं. उस समय गौरी ने अपने पिता की मौत के बाद बतौर संपादक ‘लंकेश पत्रिके ‘ की कमान संभाली थी .

इन डेढ़ दशकों में देश कहां आकर खड़ा हो गया है, यह इंटरव्यू में गौरी की उस टिप्पणी से समझा आ सकता है, जिसमें उन्होंने अपने महिला होने को अपनी सुरक्षा की वजह बताया था. गौरी को अंदाजा नहीं रहा होगा कि डेढ़ दशक बाद कमजोर, वंचित तबकों और लेखकों तथा पत्रकारों की हत्या ही हमारे समाज की पहचान बन जायेगी. माडरेटर 

इस इंटरव्यू का अनुवाद अभिनव श्रीवास्तव ने किया है.     

क्या आपको उम्मीद थी कि आप अपने पिता की विरासत को संभालते हुये किसी दिन लंकेश पत्रिके की संपादक बनेंगी?

नहीं, मैंने ऐसा कभी नहीं सोचा था. मुझे अब भी नहीं लगता कि कोई मेरे पिता की विरासत को कभी भी संभाल पायेगा. कन्नड़ पत्रकारिता और साहित्य जगत में उनका कद बहुत ऊंचा था. जब वे इस दुनिया से गुजरे तो मेरे दोस्तों ने  दिल्ली एयरपोर्ट पर इंतज़ार करते हुये मुझसे पूछा कि अब लंकेश पत्रिके का क्या होगा. मैंने जवाब दिया था कि अब इसे बंद करने के अलावा कोई चारा नहीं. मेरे पिता के जाने से जगह खाली हुयी थी, उसे भरना बहुत मुश्किल काम था.

वो कौन से हालात थे जब आपने लंकेश पत्रिके के संपादन की जिम्मेदारी संभालने के बारे में सोचा?

पहले पहल मुझे ये सम्भव नहीं लगा कि मेरे या किसी अन्य के प्रबंधन के तहत लंकेश पत्रिके को चलाया जाये क्योंकि हर व्यक्ति एक दूसरे लंकेश के इंतज़ार में होगा जो कि एक असंभव काम था. लेकिन बहुत से लोगों ने हमसे इस अखबार को बंद नहीं करने की गुजारिश की, क्योंकि यह सेकुलरवाद, दलितों, औरतों और वंचितों के मुद्दों के साथ खड़ा रहता था. पत्रिके में उन सभी मुद्दों के लिये जगह थी जिनके लिये मुख्य धारा मीडिया में कोई जगह नहीं थी.

मेरी बहन, भाई और खुद मैं अपने पिता के प्यारे दोस्त और कन्नड़ के सांध्य दैनिक ‘सांजे वानी’ और तमिल दैनिक ‘दिना सुदर’ के संपादक और प्रकाशक मणि के पास गये. मणि हमारी पत्रिका का प्रकाशन बरसों से कर रहे थे. हमनें उन्हें बताया कि हम अखबार को बंद करना चाहते हैं. इस बात से मणि बहुत नाराज हुये. उन्होंने कहा कि एक तरफ तुम्हारे पिता थे जिन्होंने अपनी नौकरी और अपनी बची खुची संपत्ति प्रकाशन को खड़ा करने और अखबार के जरिये संघर्ष करने में लगायी और तुम लोग इसे कोई भी संघर्ष किये बिना बंद कर देना चाहते हो. तुम्हें एक बार कोशिश करके देखनी चाहिये और अगर तुमसे अखबार नहीं चल पाये तो इसे बेशक बंद कर देना.

फिर, मेरे पिता जिन स्थितियों और दौर में इस दुनिया से विदा हुये, वह भी हमारे लिये किसी चेतावनी की तरह ही था. वह सोमवार का दिन था, जव वह अपने सारे लेख और अखबार का अगला संस्करण बिस्तर पर रख गये थे. पत्रिका को एकदम से बंद कर देना उनकी यादों का भी अपमान करना था, खासकर तब जब वह अपने हिस्से का काम और अपनी जिम्मेदारी को पूरी तरह निभा गये थे. एक सवाल हमें लगातार परेशान कर रहा था कि क्या मेरे पिता, इस अखबार को अपने गुजर जाने के बाद भी जारी रखना चाहते थे. हम अब भी इस सवाल का जवाब नहीं जानते. उन्होंने हमें कभी नहीं बताया.

क्या आप पत्रकारिता में ये सोचकर कभी आयी थीं कि किसी दिन आप साप्ताहिक पत्रिका से जुड़ेंगी?

मैं इस तरह के काम के लिये नहीं बनी थी.मेरे पिता ने यह अखबार तब आरम्भ किया था जब मैंने पत्रकारिता की पढ़ाई शुरू की थी. तब मेरे पास ‘प्रकाशन’ जैसा कुछ संभालने के लिये नहीं था. वास्तव में मैं पहले डॉक्टर बनना चाहती थी, लेकिन बाद मैंने पत्रकारिता की राह चुनी. इन बीस सालों में मैंने पत्रिके के लिये सिर्फ एक बार लिखा. मैंने जान बूझकर पत्रिके से दूरी बनाये रखी क्योंकि यह काफी तेज तर्रार किस्म की पत्रकारिता के लिये जाना जाता था और मैं पेशेवर अंग्रेजी पत्रकारिता कर रही थी.

पत्रिके के लिये आपकी आगामी योजनायें क्या हैं?

मेरे पिता ने अपनी आख़िरी सांस तक इस अखबार को राह दिखायी , लेकिन पिछले कुछ सालों से, जबसे  उनका स्वास्थ्य बहुत खराब हुआ, अखबार की पाठक संख्या गिरने लगी थी. मैं उन पाठकों तक फिर पहुंचने की कोशिश कर रही हूं.

आपके पिता को अक्सर जान से मारने की धमकियां मिलती रहती हैं. उनके खिलाफ कई तरह के मुक़दमे भी चल रहे हैं. उन्होंने कभी इसी परवाह नहीं की. आप युवा महिला हैं और बंगलौर में अकेली रहती हैं, क्या आप इस तरह के दबाव को सहने के लिये तैयार हैं?

जितने लोगों ने मेरे पिता के खिलाफ मुक़दमे किये, उससे कहीं ज्यादा लोग उनके साथ खड़े रहे, क्योंकि उन लोगों को पता है कि वह सही हैं. मैं इस साप्ताहिक को इसका तेवर बरक़रार रखते हुये ज्यादा पेशेवर होकर चलाना चाहती हूं. मुझे लगता है कि ऐसे हालात में औरत होने के अपने फायदे हैं, क्योंकि अगर हमारा कोई भी रिपोर्टर ऐसे राजनेता से मिलता है जो मेरे पिता से नाराज है, तो वह मेरे पिता को तो अपशब्द बोल सकता है, लेकिन एक महिला को अपशब्द बोलने से वह समाज में अपनी गरिमा और सम्मान ही खोयेगा. इसलिये मेरा महिला होना ही इस समय मेरी सुरक्षा है.

बेशक, औरत होने के चलते लोग आपको अपशब्द नहीं बोल सकते, लेकिन औरत होने के चलते वे आप पर बहुत आसानी से शारीरिक हमला कर सकते हैं., जैसा कि  उन्होंने आपके पिता के साथ भी समय समय  पर किया है. उन्हें आप पर हमला करने में कोई मुश्किल नहीं होगी क्योंकि आप अकेले रहती हैं.

मैं शारीरिक हमलों से बिलकुल नहीं डरती. मैं कुछ दिन पहले भी अक्सर रात को तीन बजे घर अकेली ही आया करती थी. मैं एक मौके पर तब रुकी थी जब मैंने साड़ी में लिपटे हुये एक आदमी को सड़क के बीचों बीच लेटा हुआ देखा था. अब मैं अपने घर पहुंचने तक अपने ड्राइवर को साथ रखती हूं. इसके अलावा मुझे आज तक कोई धमकी भरे फोन काल नहीं आये हैं. हां, मेरे निजी जीवन से जुड़ी बातों पर मुझे ब्लैकमेल करने वाले कुछ स्थानीय अखबारों से फोन जरूर आते हैं. वे भी आना बंद हो गये, क्योंकि मैंने उनसे कहा जो लिखना है लिख दो मेरे बारे में. मैंने ऐसा कुछ भी नहीं किया जिसका मुझे डर हो.

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