शहला जी! रिपब्लिक जैसे संस्थानों के खिलाफ लड़ाई को पत्रकार के साथ निपटाना सस्ता और आसान जरिया है !

5 सितंबर की रात पत्रकार गौरी लंकेश की गोली मारकर हत्या किए जाने के बाद देश में कई जगहों पर विरोध प्रदर्शन किए गए. बुधवार को दिल्ली में प्रेस क्लब में पत्रकार और बुद्धिजीवी वर्ग के लोगों ने इस पर दुख जताते हुए अपना गुस्सा जाहिर किया. प्रेस क्लब पर हुए विरोध प्रदर्शन जेएनयू की छात्र नेता शहला राशिद अंग्रेजी न्यूज चैनल रिपब्लिक टीवी के रिपोर्टर पर भड़क गई थीं. शहला ने रिपोर्टर पर भड़कते हुए कह दिया कि तुम लोग बीजेपी के हाथों बिक चुके हो और यहां से चले जाओ. निश्चय ही रिपब्लिक जैसे चैनल सवाल के घेरे में हैं, पर क्या रिपब्लिक के इतर दूसरे मुनाफा आधारित मीडिया का हाल बेहतर है, और इससे बढ़कर यह की क्या सारा हिसाब किताब पत्रकारों को निबटा कर किया जाना चाहिए. एक सामान्य औसत समझदारी वाले व्यक्ति को भी पता है कि तमाम पत्रकारों की स्वायत्तता उनके संस्थानों में आजीविका की शहादत से बचते हुए महज मुनाफा सुनिश्चित करने वाले एक कंटेंट उत्पादक के तौर पर रह गई है. शहला राशिद द्वारा रिपोर्टर को डांटने और उसे वहां से भगाने का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था. इस वीडियो पर अलग अलग प्रतिक्रिया आ रही है. कुछ लोग शहला के साथ हैं तो कुछ पत्रकार साथी शहला राशिद की आलोचना भी कर रहें हैं. हम यहां फेसबुक पर व्यक्त किए गए कुछ प्रतिनिधि प्रतिक्रियाएं साझा कर रहें हैं. मॉडरेटर


 

सहला राशिद जिस तरह से उंगलियां नचा-नचा कर पत्रकार को लताड़ रही हैं वह माथे पर चढ़ चुका सेलीब्रेटी नशा भी हो सकता है. संस्थानों की लड़ाई व्यक्तियों से नहीं लड़ी जाती है, यह बात शायद उन्हें समझ नहीं आ रही है. रिपब्लिक की लड़ाई को पत्रकार के साथ निपटाना शायद उन्हें सस्ता और आसान जरिया लगा हो. पर मुगालते से जितना जल्दी बाहर निकल जाएं उतना बेहतर. उन्हें यह भी समझ लेना चाहिए कि मीडिया के जिस हिस्से को वह अपने समर्थन में समझ रही है वह जेएनयू रूपी एक संस्थान का समर्थक है किसी सहला या कन्हैया का नहीं. जिस दिन रण में उतरेंगी उस दिन समझ आ जाएगा…

वरिष्ठ पत्रकार अतुल चौरसिया के वाल से


दो दिनों से कई पोस्ट पढ़ चुका हूं जिसमें Shehla Rashid की इस बात पर आलोचना की जा रही है कि उसने Republic के पत्रकार को क्यों हड़काया। कुछ बातें कहने को हैं:

1. ये जो ताज़ा रिपब्लिक है और जिसका डॉन पहले TIMES NOW में था, उसने कैसी रिपोर्टिंग और कैसी डिबेट की JNU को लेकर? ज़्यादा नहीं, बस डेढ़ साल पहले की बात है। पूरे देश में जेएनयू की जो ख़ास तरह की छवि बनाई गई, उसमें अर्नब गोस्वामी का बड़ा रोल है।

2. टाइम्स नाऊ जब जेएनयू, शेहला, UmarKanhaiyaAnirban इन सबको देशद्रोही बता रहा था तो वो कौन सी Neutrality और Objectivity दिखा रहा था? Objectivity नाम के शब्द को पत्रकारिता में बार-बार रटाया जाता है। पहले मीडिया इसे फॉलो करे। शेहला एक्टिविस्ट है। उसे पक्ष-विपक्ष चुनने की आज़ादी है। उसे आज़ादी है कि वो किसी चैनल को बाइट दे और किसी की माइक सामने से हटा दे। आप ज़बर्दस्ती मुंह पे माइक टांग देंगे क्या?

3. ये भी हो सकता है कि वो रिपोर्टर अपने चैनल की आइडियोलॉजिकल फ्रेम से अलग हो। ऐसा होता भी है। लेकिन माइक जिस संस्था की थी उसका एजेंडा बिल्कुल क्लीयर है। पहले दिन से साफ़ है। उस एजेंडे को शेहला अपने विरोध में पाती है। इसलिए उसकी मर्जी है कि वो माइक हटाने को कह दें।

4. जिस प्रोटेस्ट में शेहला ने ऐसा किया वो 3 बजे प्रेस क्लब के भीतर वाला प्रोटेस्ट नहीं था, जिसे “सिर्फ़ पत्रकारों” का कहकर प्रचारित किया जा रहा है। शेहला वाला मामला उससे पहले का है, जो पत्रकारों के अलावा एक्टिविस्टों की साझे कॉल पर हो रहे प्रोटेस्ट में घटित हुआ।

5. मान लीजिए किसी मीडिया हाउस ने किसी संस्था के ख़िलाफ़ रिपोर्टिंग की। हफ़्ते भर बाद उस संस्था का कोई आदमी न्यूज़रूम पहुंच जाए और ज्ञान देने लगे तो चैनल वाले क्या करेंगे?

6. गौरी लंकेश की हत्या पर जो खेमा जश्न मना रहा है, रिपब्लिक उस खेमे को आइडियोलॉजिकल खुराक देता है। ऐसे में Gauri Lankesh की हत्या के ख़िलाफ़ प्रदर्शन में अगर रिपब्लिक की माइक कोई मुंह पर तान दे तो स्वाभाविक ग़ुस्सा निकलेगा।

7. पत्रकारिता में या कहीं भी objectivity सबसे बेकार चीज़ है। इसपर किसी को कोई डाउट हो तो अलग से बात कर लेंगे। ऑब्जेक्टिविटी की जो वैचारिक hegemony है वो बहुत ख़तरनाक है। तराजू से तौल कर निष्पक्षता नहीं आती। आप टास्क के तौर पर मुझे कोई बढ़िया डिबेट/लेख दे दीजिए मैं बता दूंगा कि कहां कहां ऑब्जेकेटिविटी नहीं है। लेख अगर ऑब्जेक्टिविटीवादी का हो तो और बढ़िया

पत्रकार दिलीप खान के फेसबुक वाल से


शेहला राशिद द्वारा रिपब्लिक टीवी के पत्रकार को भगाने को सही कैसे कहा जा सकता है? यही काम तो भगवा ब्रिगेड भी कर रही है, कभी रविश को गाली देती है कभी राजदीप को ,यही काम आप कर रहे हैं . इस देश में घोर से घोर विरोधी विचार को सुनने कहने का वातावरण विकसित करना जरुरी है , मौजूदा सरकार ऐसा वातावारण बनाने से डर रही है. गर गौरी की हत्या केवल उनकी विचारधारा की वजह से हुई है जैसी कि संभावना व्यक्त की जा रही है तो फिर वही काम तो हम भी कर रहे हैं. रिपब्लिक टीवी, जी न्यूज जैसे चैनलों का होना जरुरी है, कोई तो बहाना हो जिससे हम पत्रकारिता के पतनकाल को देख सके.

आवेश तिवारी जी के फेसबुक वाल से

 

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here