..क्योंकि मरने को मजबूर हैं रोहिंग्या मुसलमान

In this June 13, 2012, file photo, a Rohingya Muslim man who fled Myanmar to Bangladesh to escape religious violence, cries as he pleads from a boat after he and others were intercepted by Bangladeshi border authorities in Taknaf, Bangladesh. Two recent shipwrecks in the Mediterranean Sea believed to have taken the lives of as many as 1,300 asylum seekers and migrants has highlighted the escalating flow of people fleeing persecution, war and economic difficulties in their homelands. (AP Photo/Anurup Titu, File)

अफाक़ अहमद

म्यांमार के रोहिंग्या मुसलमानों पर बर्मी हुकूमत के ज़ुल्म-ओ-तशद्दुद का सिलसिला कोई नया नहीं है लेकिन इस छोटी अक़लियती जमात पर पिछले महीने यानि अगस्त 2017 के आख़िरी हफ़्ते बर्मी सेना ने क्रैकडाउन का सिलसिला शुरू किया है जिसके तहत अब तक हज़ारों लोगों को मौत के घाट उतारा जा चुका है, जिसने म्यांमार की सेना द्वारा किये जाने वाले सितम के पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ डाले हैं!

रोहिंग्या मुसलमानों के हज़ारों घर जलाकर ख़ाक कर दिए गए और एक आंकड़े के मुताबिक़ एक लाख से ज़्यादा लोगों को मुल्क छोड़ने पर मजबूर कर दिया है. रोहिंग्या की नस्लकशी का ये सिलसिला तो हमेशा चलता रहता है लेकिन इसमें जब-जब हद दर्जे की बढ़ोत्तरी आ जाती है तो मीडिया की तवज्जो थोड़ी-बहुत मबज़ूल हो जाती है!

जीव-हत्या के कट्टर मुख़ालिफ़ बौद्ध धर्म के अलंबरदार मनुष्य की हत्याओं को क्यों अमल में ला रहे हैं ये सोचने वाली बात है. यही नहीं म्यांमार की लीडर आंग सान सू ची अमन के लिए नोबेल ईनाम पा चुकी हैं और अब ये अपने मुल्क में हो रहे बदअमनी के नंगे नाच पर ख़ामोश हैं. आख़िर रोहिंग्या मुसलमान भागकर जाएं तो जाएं कहां, जब इसी मुल्क में इनकी नस्लें रहती आईं हैं!

बांग्लादेश ख़ुद एक ग़रीब और परेशान मुल्क है तब भी यहां हज़ारों रोहिंग्या मुसलमान शरण लिए हुए हैं, बांग्लादेश और म्यांमार की सरहद पर नदी पड़ती है और जब-जब म्यांमार की सेना मारकाट मचाती है ये पानी के रास्ते बांग्लादेश की सरहद की तरफ़ भागते हैं क्योंकि तब इनके पास कोई रास्ता बचता नहीं है अपनी जान बचाने को लेकर.

ऐसी भयानक नस्लकशी और इतना बड़ा इंसानी बोहरान दुनिया के कम ही देशों में देखने को मिलता है फिर भी दुनिया महज़ अफ़सोस और तश्वीश का इज़हार कर चुप बैठ जाती है जबकि दुनिया की बड़ी-बड़ी हुकूमतों के पास ना ज़मीन की कमी है और ना वसायल का फ़िक़दान. अक़वाम-ए-मुत्तहिदा (यूएनओ) भी अपील और मज़म्मती क़रारदादें पास कर चुप बैठ जाती है.

ब्रितानिया के वज़ीर-ए-ख़ारजा बोरिस जॉन्सन ने म्यांमार की रहनुमा आंग सान सू ची से रोहिंग्या मुसलमानों के ख़िलाफ़ तशद्दुद को ख़त्म करने की अपील की है. इसी तरह 04 सितंबर 2017 को इंडोनेशियाई वज़ीर-ए-ख़ारजा ने सू ची से मुलाक़ात कर म्यांमार में जारी तशद्दुद को रोकने का मुतालबा किया है। तुर्की के सदर रज्जब तय्यब अर्दगान ने अपने बांग्लादेशी हम मनसब अब्दुल हमीद से फ़ोन पर राब्ता कर बांग्लादेश आने वाले रोहिंग्या मुसलमानों को मदद पहुंचाने  की ख़ातिर मुनासिब इक़दामात किये जाने पर बातचीत की है. उम्मीद है इनकी कोशिशें कारगर साबित होंगी.

ये कितनी हास्यास्पद बात है कि म्यांमार सरकार दावा कर रही है कि रोहिंग्या मुसलमानों पर क्रैकडाउन करके उन्हें हलाक या मुल्क-बदर करने का उसका मक़सद नहीं है, वो तो बस उन रोहिंग्या जंगजुओं को सबक़ सिखाना चाहती है, जिन्होंने बक़ौल हुकूमत, ‘अराकान रोहिंग्या साल्वेशन आर्मी’ के बैनर तले 25 अगस्त 2017 को म्यांमार के रख़ाइन रियासत में पुलिस थानों और फ़ौजी ठिकानों पर मुनज़्ज़म हमले किए थे! ये सबक़ कैसा था इसका अंदाज़ा इस दौरान होने वाली झड़पों से लगाया जा सकता है जिनमें 400 से ज़्यादा अफ़राद के मारे जाने और 2600 से ज़्यादा घरों और इमलाक जलाकर राख कर देने की ख़बरें हैं. ये क्रैकडाउन कितना जारहाना नवैय्यत का था कि इसे शुरू करने से पहले इलाक़े से क़रीब 4 हज़ार ग़ैर-रोहिंग्या यानि बौद्ध बाशिंदों को सरकारी तौर पर हटाया गया था.

वैसे रख़ाइन सूबे से मुसद्दक़ा इत्तलाआत हासिल कर पाना भी तक़रीबन नामुमकिन है क्योंकि वहां सिर्फ़ चंद एक सहाफ़ियों को ही जाने की इजाज़त है. इसके बावजूद जो हक़ायक़ छन-छनकर सामने आते हैं वो रोंगटें खड़े कर देते हैं और जिनका आज की इस मुहज़्ज़ब दुनिया में तसव्वुर भी नहीं किया जा सकता!

इंसानी हुक़ूक़ की तंज़ीम ह्यूमन राइट्स वाच के मुताबिक़ सैटेलाइट से ली गयी तस्वीरों में साफ़ देखा जा सकता है कि किस तरह म्यांमार की फ़ौज रोहिंग्या मुसलमानों की बस्तियों में आग लगा रही है और किस तरह जान बचाकर भागने वालों पर फ़ायरिंग की जा रही है. ऐसे में मग़रबी म्यांमार के रख़ाइन सूबे में हुक्काम और हुकूमत की जानिब से रोहिंग्या मुसलमानों से ये अपील करना कि वो सिक्योरिटी फ़ोर्सेज़ के साथ मुबय्यना इंतेहां पसंदों और दहशतगर्दों को पकड़ने में ताऊन करें, क्या इंतेहाई मज़हकाख़ेज़ और गुमराहकुन नहीं है??

इस तरह रोहिंग्या मुसलमानों को इज्तिमाई तौर पर जान से मारकर दुनिया की आंखों में धूल झोंकना कोई म्यांमार की बौद्ध हुकूमत से सीखे! इंसानी हुक़ूक़ के इदारे शुरू से कहते आ रहे हैं कि म्यांमार की सिक्युरिटी फ़ोर्सेज़ एक सोची-समझी इस्कीम के तहत रोहिंग्या अफ़राद को मुल्क से निकालने की कोशिश में हैं…कि जो मिले उसे जांबहक़ कर दो और जो बचें वो डर के मारे मुल्क छोड़कर भाग जाएं!

अगस्त 2017 से शुरू होने वाले तशद्दुद के नए सिलसिले ने इमदादी इदारों को भी शदीद मुश्किलात में डाल दिया है क्योंकि इतनी बड़ी आबादी के लिए खाने-पीने से लेकर इलाज, तन ढंकने के लिये  कपड़ा और सर पर सायबान का बैक वक़्त इन्तज़ाम करना बहुत मुश्किल काम होता है. यही नहीं कैम्पों में गोलियों से ज़ख़्मी अफ़राद का सही वक़्त रहते इलाज भी एक दुश्वार-गुज़ार अमल है!

यह पोस्ट अफाक़ अहमद के फेसबुक वाल से साभार

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