नफरतों का नेटवर्क और दम तोड़ता प्रतिरोध : एक पत्रकार की डायरी से

आदिल रज़ा ख़ान

साल 2002 की बात है जब एक दिन सुबह उठते ही मैंने ये ख़बर पढ़ी कि वॉल स्ट्रीट जर्नल के पत्रकार डेनियल पर्ल की नृशंस हत्या कर दी गई. आतंकियों ने उन्हें बंधक बनाया और फिर बेरहमी से उनका गला रेत दिया. 2001 में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के ट्विन टावर पर अलक़ायदा ने हमला किया था. अल-क़ायदा उस हमले के तक़रीबन 1 दशक तक अफगानिस्तान-पाकिस्तान की सरज़मीं पर सक्रिय रहा. अलक़ायदा ने अलग-अलग जगहों से वीडियो जारी किया और इसका प्रसारण टीवी पर किया जाता था. कुछ रिपोर्टर्स अपनी जान पर खेल के वॉर ज़ोन में जाने से नहीं हिचकते थे और लोगों की जान-माल की जानकारी दुनिया तक पहुंचाते थे. मेरी नज़र में डेनियल पर्ल और वॉर ज़ोन से रिपोर्टिंग करने वाले वो लोग बहादुर थे.

मैं हाईस्कूल में था और ये नहीं जानता था कि मैं एक दिन इसी प्रोफेशन में जाऊंगा. न मुझे प्रेस की हिस्ट्री पता थी न ही समाज को बदलने का कोई हौसला लेकिन मुझे बस एक चीज़ समझ आती थी कि ये एक बहुत ही बहादुरी और जोखिम भरा पेशा है सो मुझे यही करना है. तब मैं ये सोचता था कि कई परतों में बटे इस समाज में सब अपने से ऊपर वाले तबके की जी हुजूरी में लगे होते हैं वहां सिर्फ पत्रकार ही एक ऐसा वर्ग है जो सबसे अलग दिखाई पड़ता है. सबसे सवाल करता हुआ. न किसी के ओहदे की परवाह न ही सवाल पूछने की हिचक. जब किसी निचले दर्जे के अधिकारी के सामने पूरा समाज चुप रह जाता है, ऐसे में कोई अकेला आदमी हाथ में कलम और रिकॉर्डर लिए और बस्ता टांगे उच्च अधिकारी और मंत्री-संतरी से पसीने पोछने वाले सवाल दाग रहा होता है. ये इमेज थी मेरी ज़ेहन में पत्रकार और पत्रकारिता की.

बहरहाल मैंने अपनी आगे की पढ़ाई पूरी की और दिल्ली के सबसे प्रतिष्ठित पत्रकारिता संस्थान में दाखिला लिया. मैंने 2001-02 में छपे अख़बार के उन पुराने पन्नों को ज़ेहननशीं किया और एक माइंडसेट लेकर चला कि सवाल करना, क्रिटिकल होना इस पेशे की सबसे अहम और बुनियादी बात है. कुछ रोज़ गुज़रे क्लास में, तब पहली बार मुझे ये भी पता चला कि ये भी एक बिज़नेस है जैसे बाकी सब. बताया गया कि अख़बार में काम करना है तो खबरें लिखनी आनी चाहिए. साथ ही खबरों को पेज पर सेट करना भी आना चाहिए. सवाल और क्रिटिकल होना बहुत ही बेमानी बात है ये मुझे 10 साल बाद पता चला. सूचनाओं के इस युग में मीडिया भी आईटी का एक टूल है ये बात वाज़े हो चुकी थी. क्लास में पढ़ते-पढ़ते ही पता चला कि हिन्दी अख़बारों में रिपोर्टर कम अनुवादक ज़्यादा काम करते हैं. पेज सेट करते हैं और समय पर पेज प्रिंटिंग को चला जाता है. हाईस्कूल के वक़्त से ही मेरे पापा ने अंग्रेज़ी अख़बार हाथ में थमा दिया था सो हिंदी पत्रकारिता करने के बाद भी मुझे अंग्रेज़ी अख़बार पढ़ना अटपटा नहीं लगा. और अंग्रेज़ी अख़बार का आलम ये था कि जब मैंने एक रिपोर्टर/पत्रकार की हैसियत से अंग्रेज़ी अख़बार पढ़ना शुरू किया तब ही भारत में पेड न्यूज़ को लेकर ख़ुलासे होने शुरू हो गए. 100 पेज का चमकदार इंग्लिश डेली, 3 रुपये में मिलने और कभी-कभी उसपर अलग से चिपकाए गए गिफ्ट का गणित मैं धीरे-धीरे समझने लगा.

बहरहाल पढ़ाई पूरी की तो एक छोटे से पब्लिशिंग में काम मिला फिर थोड़े वक़्त बाद एक बड़ी जगह काम करने का मौक़ा मिला. इन सब के बीच मैं अपने साथ पढ़ने वाले साथियों से मिलता रहा. ज़्यादातर को बेहद कम तनख्वाह मिलती थी. ऊपर से ये अनुवादक वाला काम. नए पत्रकार की हर रोज़ उसके दफ़्तर में ही हत्या हो रही थी, कभी किसी नए रिपोर्टर की ख़बर को संपादक गिरा देता तो कभी देर से आने की वजह से आधी सैलरी कट जाती तो कभी बात-बात पर फायर कर देने की धमकी. एक बार एक दोस्त की रिक्वेस्ट पर सॉलिडेरिटी दिखाते हुए नोएडा फिल्मसिटी में मैंने खुद प्रोटेस्ट में हिस्सा लिया था जब किसी बड़ी कंपनी के कई पत्रकारों को थोक के भाव नौकरी से निकाल दिया गया था. ख़ुशकिस्मती से मैं सरकारी सेटअप में काम करता था. वैसे तो सरकारी टाइप की ख़बरों का ही बोलबाला था लेकिन उस सबके बीच कुछ वरिष्ठ सहयोगियों के कलम में स्याही अभी बाकी थी, वहां काम करते हुए एक स्पेस था जहाँ मुझे उतनी घुटन महसूस नहीं हुई जितनी मेरे जान-पहचान के दोस्तों को अलग-अलग जगहों पर हो रही थी. हालांकि उनमें से कुछ का उत्साह ठीक-ठाक था, पेज सेट करते-करते कुछ तो पूरी तरह सेट हो चुके थे. वो प्रेस कार्ड लटका के घूमते और ट्रैफिक पुलिस पर रौब दिखाते थे. 200 रुपये के चालान से बच जाना उनके पत्रकारिता जीवन की बड़ी उपलब्धि थी और उनके लिए वो एक सुखद यात्रा वृतांत होता जिसे वे बहुत सीना फुला के लोगों को सुनाते. एक बात मुझे समझ आ चुकी थी कि नैतिकता का पाठ मुझे मीडिया नहीं सिखा सकता.

आज से पांच साल पहले सोशल मीडिया का उतना चलन नहीं था. फेसबुक ज़्यादा फेस पर केंद्रित था यानी फोटो चिपकाना, लाइक्स, कमेंट्स, “यू अर लुकिंग गॉर्जियस” “ओएमजी थैंक्यू” तक ही सबकुछ सीमित था. फिर फेसबुक पर विचार अवतरित हुए. कॉर्पोरेट की बदहज़मी सोशल साइट पर कुछ पत्रकारों को उल्टी करने में मदद करने लगी. माओवादी संगठन का भी अपना मानवीय पक्ष है, ये बहस अच्छी लगती। कुछ लोग जो बिना किसी स्टाइपेंड और वज़ीफ़े के सरकारी प्रवक्ता बनते थे, भारतीयता का पेटेंट रखते थे, वो माओवादियों के मानवीय पक्ष और जल-जंगल-ज़मीन की वक़ालत करने वालों से बहस करते. दोनों विचारधाराएं अपने-अपने तर्क गढ़ती और काउंटर सवाल-जवाब, लिंक चिपका के दिया जाता था. सबकुछ तक़रीबन ठीक चल रहा था.

फिर कुछ समय बाद भारत में एक नए युग का सूत्रपात हुआ. विचारधाराओं का अस्तित्व और उनके बीच टकराव तो बेहद सामान्य परिघटना है और लंबे समय से समाज का हिस्सा है लेकिन अब जो कुछ हो रहा था वो अप्रत्याशित था. विचारधारा की मुख़ालिफत गाली-गलौच से शुरू हो गई. माँ-बहन की गाली, लड़कियों को खुले आम रेप कर देने की धमकी सोशल मीडिया पर बहुत मुखर हो गई. मुख्यधारा की मीडिया ने लोगों में अपना विश्वास खोया और सोशल मीडिया ने लोगों का परसेप्शन बनाया. इसके बाद सोशल मीडिया ने मुख्यधारा की मीडिया को ही प्रभावित कर डाला. सोशल मीडिया अब राजनीतिक दल के लिए प्रोपगैंडा टूल बन चुका था. हालांकि प्रोपगैंडा तक बात रुकी नहीं. नफ़रतों का नेटवर्क शुरू हो चुका था. किसी समाज, मआशरे के छोटे से हिस्से में हुई कोई अप्रिय घटना कब मज़हबी रंग लेकर देश के कई हिस्सों को प्रभावित कर जाएगी कहना मुश्किल हो गया. सामाजिक बुराइयों से लड़ने वाले क्रूसेडर की अब इंडिया को ज़रूरत नहीं रह गई.

इस नए दौर को कुछ चिंतनशील बुद्धिजीवियों ने पोस्ट ट्रुथ एज कहा. इस दौर में राजा राम मोहन रॉय, ईश्वरचंद विद्यासागर, पेरियार रामास्वामी नाइकर, ज्योतिबा फुले, सावित्रीबाई फुले, डी के कर्वे जैसे लोगों की परंपरा वाले देश में आधुनिक समाजवादी और राजनीतिक विचारों की चमक फीकी पड़ने लगी. आज़ाद भारत में शिक्षा का स्तर 19वीं शताब्दी की तुलना में बहुत ऊपर आ गया लेकिन प्रतिरोध के स्वर प्रतिशोध की गूंज के आगे बेहद कमज़ोर साबित हुए. यहां तक कि सामाजिक शब्दावली भी बदल चुकी थी. समाज के कुछ बेहतर नागरिक हमें दूसरों के विचारों को सम्मान देने के बजाय सहिष्णु बनने की सलाह देने लगे. नीतिशास्त्र में “सम्मान देना”, “सहिष्णु बनने” से बड़ा नैतिक आचरण माना जाता है. ख़ैर कौन सुनता है इन बातों को, सम्मान देना तो दूर सहिष्णु बनना भी गवारा न था. नतीजतन एक दिन दाभोलकर, पंसारे, कलबुर्गी की आवाज़ थम गई. पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या को भी इसी पैटर्न का हिस्सा मानने में मुझे कोई हर्ज़ महसूस नहीं होता.

मेरी सामाजिक दृष्टि से मैं ये यक़ीन के साथ कह सकता हूँ कि सवा सौ करोड़ वाली आबादी में असहमति की हत्या करने वाले लोग बेहद कम हैं और उनके समर्थन वाले लोग भी बहुत कम लेकिन फिर भी उनका मनोबल बहुत ऊंचा है. आख़िर ये मनोबल कितना ख़तरनाक होगा आनेवाले समय में ये कहना मुश्किल है. भारत को एक राष्ट्र-राज्य बनाना कोई पंचवर्षीय योजना नहीं है जो आप इस बात को ज़रा सी बात कहकर नज़रंदाज़ कर जाएंगे. ये कतई ज़रूरी नहीं कि आप जिस चीज़ के लिए सहमत हैं, आपकी फ्यूचर जनरेशन भी उतनी ही सहमत हो. हो सकता है वो राज-समाज के बारे में आपके बिल्कुल विपरीत सोचती हो. कल्पना करें आने वाले उन दिनों का आज के इसी पैटर्न को सामने रखकर. तस्वीर एकदम साफ हो जाएगी. राजनीतिक लोकतंत्र की आज जैसी बुनियाद आप रखेंगे कल उसी इमारत के मलबे की नीचे आप दबे पड़े मिलेंगे. ज़रा सी बात है, “अफवाहों को हक़ीक़त न मानना” अब आपको ये मीडिया से सीखने की ज़रूरत नहीं. बल्कि आपको मीडिया को ये सीखाने का वक़्त है. सवाल आपकी आने वाली नस्लों के बेहतर भविष्य का है तो ज़ाहिर है फैसला भी आपका ही होगा. समाज पर नियंत्रण नहीं, न सही, अपने बच्चों पर तो है. उन्हें नफ़रतों से बचाने के तरीक़े खुद ही ईजाद करें ताकि आपका बच्चा दूसरों की नफ़रत के हत्थे ना चढ़े.

आदिल रज़ा ख़ान पूर्व में राज्य सभा टीवी से जुड़े रहें हैं और वर्तमान में स्वतंत्र पत्रकार हैं. सामाजिक -आर्थिक विषयों पर निरंतर स्वतंत्र लेखन.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here