क्या कैसिनी अभियान शनि के अपशकुन का भूत हमारे सर से उतार देगा?

न्यूज कैप्चर्ड डेस्क

हाल में अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के कैसिनी अंतरिक्षयान ने शनि के वायुमंडल में गोता लगाकर अपना लगभग 20 साल चला अभियान पूरा किया. अब से दो दशक पहले साल  1997 में   नासा, यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ईएसए) और इटली की अंतरिक्ष एजेंसी एजेंजिया स्पेजियेल इतालियाना (एएसआई) के संयुक्त प्रयास से शनि के अध्ययन के लिये प्रक्षेपित किये गये कैसिनी ने सौरमंडल में जीवन की संभावनाओं पर नये सिरे से रोशनी डाली है. आश्चर्य नहीं कि नासा ने कैसिनी को सबसे सफल अंतरिक्ष अभियानों में से एक माना है. नासा ने यह भी दावा किया है कि शनि के वायुमंडल में दाखिल होते ही और नष्ट होने से पहले कैसिनी ने अपने छल्लों के लिए मशहूर शनि और इसके की ऐसी तस्वीरें भेजी जिन्हें पहले कभी नहीं देखा गया.

वैज्ञानिकों ने शनि की कक्षा में स्थापित होने वाले पहले अंतरिक्ष यान कैसिनी को जानबूझकर गैसों के घेरे में गोता लगाने भेजा ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि शनि के चांद, खासकर एनसेलाडस, भविष्य के अन्वेषण के लिए मौलिक बने रहे. आखिर इस अभियान से वैज्ञानिकों को शनि और उसके उपग्रहों के बारे में  ऐसी कौन सी नयी जानकारियां हासिल हुयी हैं, जिन्हें अभूतपूर्व माना जा रहा है?

शनि के छल्लों की जटिल संरचना

साल 2004 में कैसिनी ने शनि के चक्कर लगाने आरम्भ किये थे. इसके भीतर लगे कैमरे और बाकी उपकरणों ने आंखों से दिखायी देने वाले सुदूर ग्रह के बारे में वैज्ञानिकों की समझ में काफी फेर बदल किया. इस अभियान से पहले वैज्ञानिक मानते थे कि शनि में हजारों की संख्या में छल्ले हैं, लेकिन वास्तव में इनकी संख्या लाखों में है. ये छल्ले स्नोबाल के आकार में एक दूसरे से गुथे हुये हैं और इनकी संरचना वैज्ञनिकों की समझ से कहीं ज्यादा जटिल है. इन छल्लों को कई छोटे उपग्रह अलग करते हैं, जिसके चलते इनमें हजारों किलोमीटर लम्बी प्रोपेलर नुमा जगह खाली रहती है. जहां ये छल्ले पतले होते हैं, वहां इनकी लम्बाई कुछ मीटर में है.

टाइटन की सतह

कैसिनी में शनि के उपग्रह टाइटन की सतह की प्रकृति का पता लगाने के लिये कृत्रिम रोबोट को भी उतारा गया. इसकी इंजीनयरिंग को इस तरह विकसित किया गया था कि यह ठोस और द्रव दोनों प्रकार की सतह का पता लगा सकता था.  जनवरी, 2005 में इसने टाइटन उपग्रह को सतह को छुआ. रोबोट द्वारा भेजी गयी जानकारियों से पत चला कि इस उपग्रह की सतह संरचना में आरंभिक अवस्था में धरती की संरचना की तरह ही है. वैज्ञानिक इस जानकारी को बेहद महत्वपूर्ण मान रहे हैं.

उपग्रह एनसेलाडस पर मिले जीवन के संकेत

हालांकि कैसिनी की सबसे बड़ी उपलब्धि शनि के उपग्रह एनसेलाडस के बारे में महत्वपूर्ण जानकरियां भेजना रही. टाइटन के अलावा कैसिनी को शनि के जिस उपग्रह ने सबसे ज्यादा जानकारियां प्रदान की, वह एनसेलाडस था. बर्फ के गोले जैसे इस उपग्रह की चौड़ाई 500 किलोमीटर के आस पास है. साल 2005 में  कैसिनी ने पता लगाया कि इस उपग्रह के दक्षिणी ध्रुव से अंतरिक्ष की ओर खारे पाने के कुछ कार्बनिक विस्फोट हो रहे हैं. बाद में इस बात के पक्के प्रमाण मिले कि इस उपग्रह की सतह के नीचे पानी का एक सागर है जिसकी सतह पर हाइड्रो थर्मल छिद्र हैं. वैज्ञानिकों ने इन्हीं छिद्रों को शनि पर पृथ्वी जैसे जीवन की सम्भावनाओं का स्त्रोत माना है. वे ये भी मानते हैं कि शनि के ऐसे बहुत से उपग्रह हो सकते हैं, जिनकी सतह के नीचे पानी जमा हो.

शनि की मौसमी परिघटनायें  

जाहिर है कि ऐसे में जुपिटर के अलावा शनि पर भी आने वाले समय में जीवन की संभावनायें तलाशी जा सकती हैं. कैसिनी ने शनि की मौसमी परिघटनाओं के बारे में भी महत्वपूर्ण जानकारियां जुटाईं. साल 2010 की शुरुआत में इसने शनि पर बिजली गरजने और तूफान को रिकार्ड किया. यह तूफ़ान कई महीनों तक चलता रहा. यह तूफ़ान लगभग एक साल तक जारी रहा और इसका फैलाव 3,00000 किलोमीटर तक था. वैज्ञानिकों ने निष्कर्ष निकाला कि धरती पर इतनी लम्बी अवधि का तूफ़ान आना संभव नहीं है.

शनि क एक साल धरती के तीस साल

शनि का फैलाव कितना ज्यादा है, इसका अंदाजा इस बात से लग जाता है कि वहां का एक साल धरती के तीस सालों के बराबर है. हालांकि वैज्ञानिक इस बात को लेकर किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचे है कि शनि किस गति से चक्कर लगाता है और इसके एक दिन की अवधि क्या है

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