क्योंकि लड़कियों के मुद्दों पर मोदी को रास्ता बदलने का हुनर खूब आता है…

अभिनव श्रीवास्तव

बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में कुछ रोज पहले एक छात्रा से हुयी छेड़छाड़ की घटना उतनी सामान्य साबित नहीं हुयी, जिसकी उम्मीद विश्वविद्यालय प्रशासन को अक्सर रहती है. इस दफा छात्राओं ने लगभग  रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा बन गयी छेड़छाड़ की घटनाओं को अपनी नियति मानने से इंकार कर दिया. नतीजा ये है कि महज कुछ रोज पहले घटी इस घटना से न सिर्फ परिसर में बल्कि देश के कुछ हिस्सों में बेचैनी फ़ैल गयी है.

वहीं हमेशा की तरह सरकार और प्रशासन ने इस घटना से अपने कुछ जाने पहचाने तरीकों से निपटा. खबर है कि पहले प्रशासन ने छेड़खानी का शिकार छात्रा को उसके पहनावे की नैतिक सीमायें समझायीं. फिर उसे बताया कि अगर वह जींस और टीशर्ट जैसे कपड़े पहनकर परिसर में चलेगी तो उसे बार बार ‘शिकार’ होना ही पड़ेगा. संभवतः तब उस छात्रा को ये समझ आया कि पितृसत्ता महज मोटरसाइकिल पर सवार चंद लड़कों का नाम भर नहीं है, बल्कि वह तो अपने अपने कमरों में पूरी नफ़ासत और अहमन्यता में बैठे उन लोगों का भी नाम है, जिन्हें हम प्राक्टर, वीसी और न जाने किन किन नामों से जानते हैं.

आश्चर्य नहीं है कि पितृसत्ता के इन प्रतिनिधियों को छात्राओं पर बर्बर ढंग से लाठी चार्ज करवाने में कोई हिचक नहीं हुयी. मुमकिन है कि यही पितृसत्ता आंदोलनकारी छात्राओं को बदचलन साबित करने में पूरे श्रम से जुटी हुयी हो. जाहिर है कि ये सभी तरीके अब धीरे धीरे आज के सत्ता संस्थानों की पहचान बन गये हैं.

देश के लगभग हर शीर्ष विश्वविद्यालय के पास ऐसा ही प्रशासन है, जो अपने अधिकारों के लिये आंदोलनरत छात्र छात्राओं के खिलाफ बहुत आसानी से कुतर्क और मनचाहे आरोप गढ़ सकता है, उन्हें वामपंथी साबित कर सकता है और फिर अंततः अपने कुत्सित प्रचार तंत्र के जरिये उन्हें देशद्रोही भी साबित कर सकता है. इन मायनों में बीएचयू में चल रहा घटनाक्रम कुछ अलग नहीं है.

फर्क बस इतना है कि ये पूरी घटना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र और उस बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में घटित हुयी है, जो साल 2014 से लेकर अब तक केंद्र सरकार और खुद नरेंद्र मोदी की सांस्कृतिक और राजनीतिक वैचारिकी को खुराक देता रहा है. उन्होंने इसे पहले अपने संसदीय क्षेत्र के रूप में चुना, यहां के तमाम सांस्कृतिक प्रतीकों का इस्तेमाल अपनी राजनीतिक जरूरतें पूरा करने के लिये किया और फिर यहीं से देश से लेकर गंगा को बचाने की कसमें भी खायीं.

बनारस उनकी इस सांस्कृतिक और राजनीतिक परियोजना की प्रयोग भूमि रहा, इसलिये  इस महामना की बगिया में उन्होंने कुछ खास किस्म के पहरेदार भी बैठाये.  राजनीति से लेकर मीडिया में बैठे इन पहरेदारों ने पूरी वफादारी से माननीय प्रधानमंत्री की परियोजना के सुराखों को ढका. अपने आक्रामक प्रचार और मैनेजमेंट तंत्र से उन्होंने देश को बताया कि कम से कम बनारस में तो रामराज आ ही गया है.

कहने की जरुरत नहीं कि बीएचयू में छात्राओं के आन्दोलन ने इस रामराज को चुनौती दे डाली है. बकौल बीएचयू प्रशासन, कुलपति छात्राओं के साथ छेड़छाड़ जैसे छोटे मोटे  मामलों पर उनसे सीधे मिलने नहीं आ सकते. अगर विश्वविद्यालय प्रशासन का यह तर्क है तो फिर प्रधानमंत्री का अपनी दो दिवसीय बनारस  यात्रा के दौरान धरने पर बैठी छात्राओं से मिलने के बजाय रास्ता बदलने का निर्णय तो सहज ही समझ आता है, क्योंकि हमारे प्रधानमंत्री तो और ज्यादा बड़े आदमी हैं. वे विश्व नेता हो गये हैं. और उन्हें रास्ता बदलने का  हुनर खूब आता है.

बहरहाल, बीएचयू में छात्राओं का साहसिक प्रतिरोध नरेंद्र मोदी की राजनीतिक और सांस्कृतिक परियोजना में कुछ दरारें अवश्य डाल रहा है.

अभिनव श्रीवास्तव

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