लड़कियों की हड्डियां तोड़कर अपना ‘राष्ट्रवाद’ बचायेंगे बीएचयू के वीसी

अफाक़ अहमद

बीएचयू में 1992 से स्टूडेंट्स यूनियन नहीं है.यहां वीसी कभी-कभार प्रशासन के दलाल के तौर पर स्टूडेंट्स कौंसिल का गठन करते आए हैं. बीएचयू की लड़कियों पर हुआ दमन ये साबित करता है कि यहां स्टूडेंट्स को किस हद तक दबा-कुचलकर रखा जा रहा है.बीएचयू प्रशासन की इतनी सख़्ती के बीच लड़कियों का सड़क पर निकल धरने पर बैठना साबित करता है कि जब इनके जिन्सी इस्तेहसाल की इंतहां पार हो गयी तब ही इन्हें सड़क पर निकलने के लिए मजबूर होना पड़ा.स्टूडेंट्स यूनियन से सियासत की शुरूआत करने वाले नायब सदर-ए-जम्हूरिया-ए-हिन्द आली जनाब वेंकैय्या नायडू को बीएचयू में स्टूडेंट्स यूनियन की बहाली की पहल करनी चाहिए जिससे यहां वीसी और ज़िला इंतज़ामिया की दमनकारी कार्रवाई पर हथौड़ा चलाया जा सके!

भाजपा की हुकूमत में लग रहा है कि वाइस-चांसलर अपनी आत्मा को पूरी तरह भगवा रंग से रंग चुके हैं क्योंकि बीएचयू वीसी प्रोफ़ेसर गिरीश चंद्र त्रिपाठी का कहना है कि वो बीएचयू से ‘राष्ट्रवाद’ को ख़त्म नहीं होने देंगे.हैरत की बात है कि ये-सब कहने की ज़रुरत एक वीसी को क्यों पड़ गयी? जिस तरह अक्सर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में मुद्दे से पल्ला झाड़ने के लिए इंतज़ामिया सर सैय्यद के मिशन का ढोल पीटने लगती है.ठीक इसी तरह से बीएचयू वीसी का कहना है कि स्टूडेंट्स महामना पंडित दीनदयाल उपाध्याय के मिशन पर पानी ना फेरें!

अब आज इतवार की शाम तक बीएचयू के छात्रावास ख़ाली करा लिए गए हैं और यूनिवर्सिटी को 02 अक्टूबर तक के लिए बंद कर दिया गया है, जबकि वीसी ने यूनिवर्सिटी के बंदीकरण के किसी भी ऐसे फ़रमान से साफ़ इंकार किया है.लड़कियों पर हुए बर्बर लाठीचार्ज पर वाराणसी के एसएसपी रामकृष्ण भारद्वाज का कहना है कि वो इसकी जांच कराएंगे.वहीं वीसी ने भी छात्रावासों में पुलिस के तलाशी अभियान पर जांच बिठा दी है.इस तरह के लॉलीपॉप इंतज़ामिया के पुराने चोंचले रहे हैं,अरे लड़कियों की जायज़ मांग आप मान लिए होते तो लाठीचार्ज की नौबत ही क्यों आती और जांच-वांच का स्वांग भी आपको ना रचना पड़ता!

सौ की सीधी बात ये थी कि लड़कियों के साथ हो रही छेड़खानी पर रोकथाम का प्रशासन जुगत भिड़ाता; पर उसने तो लाठियों से लड़कियों की हड्डियां तोड़ डालीं, सर फोड़ डालें.होना तो ये था कि वीसी आगे बढ़कर लड़कियों की तकलीफ़ों को सड़क पर निकलकर सुनते और इसका हल निकल पाता.लेकिन हर यूनिवर्सिटी की इंतज़ामिया के ख़ून में लगता है अकड़ का जरासीम घुला रहता है; वरना मामला संगीन होने से पहले कब का सुलट गया होता.

अफाक़ अहमद अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं.

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