‘सौभाग्य’ किसका ? ग़रीबों का या पश्चिमी साम्राज्यवादियों का !

अरुण माहेश्वरी

मोदी ने ग़रीबों को मुफ्त बिजली देने का एक नया धोखा रचा है. ‘सौभाग्य’ नाम की इस योजना को रखते वक़्त उन्होंने अपनी सरकार के ग़रीब-प्रेम की लफ्फाजी में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी. भारत में बिजली की अवस्था का जानकार हर व्यक्ति जानता है कि यह सरासर एक धोखा है. इसमें धोखे की इंतिहा तो तब और साफ हो गई जब मोदी ने बिजली न होने पर सबको सोलर पावर की सुविधा उपलब्ध कराने की बात कही.

मोदी-जेटली के ग़रीब-प्रेम के धोखे की सचाई को आज अंधा आदमी भी देख सकता है. बिजली को छोड़िये, यह तो एक चुनावी शोशा है, इनकी असलियत जाननी है तो जरा गहराई से देखिये, इन्होंने जीएसटी में सबसे ज्यादा निशाना किन चीज़ों को बनाया है ?

रोटी, कपड़ा और मकान को. उन चीज़ों को जिनके बिना आदमी जी नहीं सकता है.

भारत के इतिहास में पहली बार अनाज पर कर लगाया गया है. अंग्रेज़ों ने नमक पर कर लगाया था, उसके प्रतिवाद में पूरा देश उठ खड़ा हुआ था. गांधी जी ने दांडी मार्च और प्रतीकी तौर पर नमक का उत्पादन करके अंग्रेज़ों के उस कर को खुली चुनौती दी थी. मोदी-जेटली ने खाने-पीने की तमाम चीजों पर कर लगा कर उससे कम बड़ा अपराध नहीं किया है. इस मामले में ये अंग्रेज़ों के भी बाप निकले हैं.

इसी प्रकार, कपड़े के व्यापार पर भी जीएसटी के रूप में पहली बार कोई कर लगा है. बीच में एक बार तैयारशुदा कपड़ों पर पिछली एनडीए सरकार ने उत्पाद-शुल्क लगाया था जिसे उसे बाद में वापस लेना पड़ा था.

इन्हीं कारणों से जीएसटी के खिलाफ देश भर के अनाज और कपड़ा व्यापारी लगातार आवाज उठा रहे हैं. यह कर भारत के प्रत्येक आदमी से वसूला जायेगा, भले वह अमीर हो या ग़रीब.

इसी प्रकार मकान का भी विषय है. रीयल इस्टेट के नाम से बदनाम इस क्षेत्र का बोझ भी हर आदमी पर पड़ेगा.

और सर्वोपरि, तेल और रसोई गैस के दामों में मनमानी वृद्धि. इसके बारे में अलग से कुछ बताने की ज़रूरत नहीं है.

ये वे बुनियादी कारण है जिनके कारण भारी मंदी में फँस चुकी अर्थ-व्यवस्था में भी महँगाई अर्थात मुद्रा-स्फीति की बीमारी भी दिखाई दे रही है.

इनके विपरीत, इस सरकार ने लग्ज़री की चीज़ों पर कर कम किया है.

जीवन की मूलभूत ज़रूरतों की चीज़ों से अधिकतम कर वसूली की नीति पर चलने वाली एक सरकार अपने को ग़रीब-हितैषी बताए, इससे बड़ा ढकोसला और क्या हो सकता है !

इन करों से ही यह भी पता चलता है कि मोदी सरकार ने अर्थ-व्यवस्था का जो भट्टा बैठाया है, उसके सारे बोझ को वह भारत के ग़रीबों पर लाद दे रही है.

मोदी की नोटबंदी के कारण जीडीपी में लगातार गिरावट से सामान्य अार्थिक गतिविधियों से कर वसूलने की इनकी क्षमता बुरी तरह से कम होती जा रही है. अब वे सीधे ग़रीबों पर डाका डाल कर इसकी कमी को पूरा कर रहे हैं.

और, सबसे मजे की बात यह है कि इनके सारे भक्त इस प्रकार ग़रीब जनता से वसूले गये राजस्व को मोदी-जेटली जुगल जोड़ी की आर्थिक नीतियों की सफलता बता रहे हैं !

जिस बिबेक देबराय ने नोटबंदी के समय कहा था कि इससे 2 लाख करोड़ रुपये वापस नहीं आयेंगे और कालाधन पर कर से अतिरिक्त 50 हज़ार करोड़ का आयकर वसूला जा सकेगा, ऐसा गप्पबाज अर्थशास्त्री अब प्रधानमंत्री का प्रमुख आर्थिक सलाहकार बन गया है.

कोई भी अनुमान लगा सकता है, आगे और क्या-क्या होने वाला है.

अभी विश्व अर्थ-व्यवस्था का वह काल चल रहा है जब ‘पहले अमेरिका’ का नारा दे रहा डोनाल्ड ट्रंप हर संभव कोशिश करेगा कि वह अमेरिकी अर्थ-व्यवस्था में निवेश को बढ़वाये. इसके लिये वह अपने यहाँ ब्याज की दरों को बढ़ायेगा जो वहाँ अभी लगभग शून्य के स्तर पर चल रही है. अमेरिका में ब्याज की दरों में वृद्धि भारत से विदेशी पूँजी के पलायन का रास्ता खोलेगी, जिसके बल पर मोदी सरकार अभी तक किसी तरह अपना काम चला पा रही है.

देबराय घोषित रूप से विदेशी पूँजी का भक्त अर्थशास्त्री होने के नाते वह मोदी को ऐसी हर सलाह देगा जिससे भारत की तमाम संपत्तियाँ, इसके कल-कारख़ाने, खदान और कच्चा माल विदेशियों के हाथों बिक जाए. भारत के तेज़ी से गिर रहे जीडीपी को अब बढ़ाना किसी के वश का नहीं रह गया है, जब तक नोटबंदी के कुप्रभावों के साथ ही जीएसटी की अराजकता और तेल पर ज्यादा से ज्यादा कर के जरिये सरकार के चालू वित्तीय घाटे को पूरा करने की परिस्थिति ख़त्म नहीं होती है.

इसीलिये देबराय हो या दूसरा कोई आर्थिक सलाहकार, मोदी ने जो अराजकता पैदा कर रखी है, उसे बिना विदेशी पूँजी की सहायता के सम्हालना किसी के लिये मुमकिन नहीं होगा.

और, सबसे अधिक दुर्भाग्य की बात यह है कि मोदी के राजनीतिक डीएनए में विदेशियों को अपना सब कुछ लुटा देने की नीति के प्रतिरोध की कोई क्षमता नहीं है. वे भले सभी पर राष्ट्र-विरोधी होने का तक्मा लगाते रहे, लेकिन सचाई यही है कि आरएसएस और उनकी राजनीति का जन्म ही विदेशी शासकों की दलाली के बीच से हुआ है.

और, इस प्रकार आने वाला समय अर्थ-व्यवस्था में ऐसे असंतुलन का समय होगा जब भारत की आर्थिक सार्वभौमिकता पूरी तरह से दाव पर लगी हुई दिखाई देगी. मोदी जी अचकन पहन कर पश्चिम के नेताओं से जितनी ज्यादा गलबहिया करते दिखाई देंगे, भारत पर उतनी ही ज्यादा उनकी जकड़बंदी बढ़ती जायेगी. देबराय इस काम में जरूर मोदी के सहयोगी बनेंगे.

सच कहा जाए तो मोदी आज भारत में पश्चिमी साम्राज्यवादियों के दूत का काम कर रहे हैं. और ये अपने को ग़रीब-हितैषी बता रहे है !

यह पोस्ट अरुण माहेश्वरी के ब्लॉग चतुर्दिक से साभार लिया गया है.

 

 

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