क्या नकदी अनुपात पर झूठ बोल रहे हैं नरेंद्र मोदी?

अरुण माहेश्वरी 

प्रधानमंत्री ने कल एक और डींग हांकी है कि जीडीपी की तुलना में नगदी का अनुपात नोटबंदी के बाद 12 प्रतिशत से घट कर 9 प्रतिशत हो गया !

उनसे हमारा सवाल है कि क्या वे इस तथ्य का असली मायने जानते हैं ?

बाजार में जितनी भी नगदी होती है, वह एक प्रकार से आम लोगों के प्रति सरकार की देनदारी होती है । इसके घटने और इस पर जीडीपी की तुलना में विचार करने का मतलब है कि जीडीपी अर्थात देश के सकल उत्पादन के मूल्य की तुलना में आम लोगों के प्रति सरकार की देनदारी कम हो गई ।

इसमें सबसे बड़ा सवाल उठता है कि यह कैसे कम हुई है ? क्या उत्पादन को बढ़ा कर, अर्थात सकल घरेलू उत्पाद का मूल्य बढ़ा कर यह हासिल किया गया है ?

नहीं । इसे खुद उन्होंने स्वीकारा है कि जीडीपी में गिरावट आई है । तब जीडीपी/नगदी अनुपात में कमी का एक मात्र कारण यह है कि सरकार ने आम लोगों के पास की नगदी को जबर्दस्ती बैंकों में रखने के लिये मजबूर किया है, अर्थात जबर्दस्ती उनसे छीन कर अपने पास जमा कर लिया है ।

नोटबंदी के ऐन समय में तो यह अनुपात 7.5 प्रतिशत से नीचे चला गया था। अब बढ़ते-बढ़ते 9 प्रतिशत हुआ है । यह तब है जब बाजार में अब भी नगदी के प्रवाह को नाना उपायों से रोका जा रहा हैं । जैसे-जैसे ये बाधाएं कम होगी, यह अनुपात फिर पुराने स्तर, बल्कि उससे भी अधिक हो जाए तो इसमें कोई अचरज नहीं होगा । वैसे एक प्रकार से बैंकों में जमा लोगों के रुपये भी तो एक प्रकार की नगदी ही है । प्रधानमंत्री ने यह नहीं बताया है कि अपने आंकड़ों में उन्होंने बैंकों में जमा राशि को भी पकड़ा है या नहीं ।

इसीलिये जब प्रधानमंत्री आज मंदी की परिस्थिति में आम लोगों के सामने जीडीपी और नगदी के अनुपात में गिरावट के आंकड़े पर डींग हांकते हैं, तब वे सीधे तौर पर आम लोगों को अपमानित करते हुए यह कह रहे होते हैं कि देखो, हमने तुम्हें कैसा बुद्धू बनाया, हम कितनी आसानी से तुम्हारा रुपया मार कर बैठ गये हैं या कितनी आसानी से हमने तुम्हारी कमाई के एक हिस्से को जबर्दस्ती मिट्टी में बदल दिया है !

आम जनता को कंगाल बनाने के कर्तृत्व पर यह कैसा घमंड !

अरुण माहेश्वरी

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