द गोट ट्रस्ट : सबसे निचले पायदान पर खड़े लोगों के लिए चलाया जा रहा आजीविका प्रयोग !

प्रीति गुरुंग 

लखनऊ।  ये कहानी एक ऐसे प्रयोग की है जिसे समाज के सबसे हाशिए पर खड़े लोगों के चेहरे पर मुस्कान लाने के लिए चलाया जा रहा है. मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंजिल, लोग जुडते गए कारवां बनता गया, के कड़ी में आज संस्था ‘द गोट ट्रस्ट ‘ देश के 13 से अधिक राज्यों में काम कर रहा है.  महिलाओं व बच्चों के स्वास्थ्य के साथ साथ रोज़गार को बढ़ावा देने के उद्देश्य को लेकर द गोट ट्रस्ट अब तक देश के 16 राज्यों में 2.5 लाख के अधिक लोगों के साथ काम करते हुए, उनकी आजीविका को बढ़ावा दे रहा है. ट्रस्ट बकरी दूध का संवर्धन करके कई उत्पाद बना चुका है, इन उत्पादों को बनाने के लिए समय समय पर महिला बकरी पालकों को ट्रेनिंग भी दी जाती है. कम खर्च और ज्यादा मुनाफे के चलते पशुपालकों का रुझान छोटे पशुओं की ओर बढ़ता जा रहा है और सिकुड़ते चारागाह और चरने के लिए कम होती जमीन के चलते पशुपालक अब बड़े पशुओं को पालने में असमर्थ होते जा रहे हैं.

लखनऊ के गोट ट्रस्ट के प्रबंध निदेशक संजीव कुमार बताते हैं, “जब गरीबों की आजीविका की बात आती है तो स्पष्ट दिखता है कि ग्रामीण समुदाय की आजीविका मुख्यतः कृषि, पशुुपालन, वन उपज व मजदूरी पर आधारित है. मजदूरी के बाद कृषि आजीविका (एक हद तक खाद्य सुरक्षा) का सबसे बड़ा स्त्रोत है लेकिन कृषि मानसून पर आधारित है तथा शुष्क प्रदेश  व वर्षा आधारित क्षेत्र में ये ‘मौसम के साथ जुआ’ के रूप में प्रभावित होता है. कृषि भूमि या जोत भूमि का लगातार घटता आकार व मानसून की बदलती स्थिति गरीबी की आजीविका को विपरीत रूप से प्रभावित कर रहा है. पशुुपालन भी एक हद तक कृषि पर आधारित व्यवसाय है लेकिन लघु पशुु जैसे बकरी की निर्भरता बड़े पशुु जैसे गाय-भैस से अपेक्षाकृत कम है. अगर हम अपने क्षेत्र में पाले जाने वाले पशुु पर सामाजिक व आर्थिक संपन्नता के हिसाब से गौर करें, तो हम पाएंगे कि समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े लोग लघु पशुपालन पर निर्भर हैं.

बकरियों को सही इलाज मिले और समय पर टीकाकरण हो इसके लिए संस्था ने गाँव-गाँव में पशु सखी बनाई है. लखनऊ जिले के रसूलपुर सादात गाँव में स्थित यह संस्था पिछले पांच वर्षों से बकरियों पर काम कर रहा है. इस संस्था से अब तक 15 राज्यों की लगभग तीन हजार से ज्यादा महिलाएं पशु सखी के रुप में जुड़ी हुई है. 19 वीं पशुगणना के अनुसार पूरे भारत में बकरियों की कुल संख्या 135.17 मिलियन है, उत्तर प्रदेश में इनकी संख्या 42 लाख 42 हजार 904 है. गोट ट्रस्ट के परियोजना निदेशक उज्जवल सरकार बताते हैं, “पशुपालक की थोड़ी सी लापरवाही के कारण कई बार झुंड की झुंड बकरियां मर जाती हैं और प्रदेश के पशुचिकित्सालयों की स्थिति इतनी खराब है कि उनका इलाज हो पाना संभव नहीं होता है. इसलिए हम लोगों ने पशु सखी को तैयार किया. इनको हम 15 दिन की ट्रेनिंग देते हैं और ट्रेनिंग खत्म होने के बाद एक किट देते हैं, जिसमें दवाई भी रहती है”.

उज्जवल सरकार आगे बताते हैं, “ट्रेनिंग में पशु सखी को बताया जाता है कि कैसे उन्हें पशुपालक को जागरुक करना है साथ उन्हें आय का जरिया कैसे बनाया जाए इसका भी प्रशिक्षण देते हैं जिससे वो इलाज के साथ पशु आहार बनाकर रुपए भी कमा सकें.”   संस्था के माध्यम से ये महिलाएं पहले घरों में चूल्हे-चौके तक ही सीमित थीं पर अब सशक्त बन रही हैं.

 

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