कितनी जायज है अलग कुर्दिस्तान की मांग?

इराक में कुर्दों ने कुछ दस दिन पहले कुर्दिस्तान बनाने को लेकर जनमत संग्रह पर वोट किया था. इराक की सरकार द्वारा असंवैधानिक माने जाने के बावजूद इस जनमत संग्रह का विशेष महत्त्व है. इराक में कुर्द समुदाय के इतिहास और उसकी वर्तमान सामाजिक, राजनीतिक स्थिति से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं को समेटता हुआ यह आलेख.

शुभम गुप्ता 

पश्चिम एशिया में कुर्द समुदाय प्रथम विश्व युद्ध के समय से अपने लिए एक अलग देश की मांग कर रहा है. हाल ही में, इराक में कुर्द समुदाय ने इराक से अलग होने के लिए जनमत संग्रह कराया था. इस जनमत संग्रह का परिणाम बहुत चौंकाने वाला नहीं था. जनमत संग्रह के नतीज़ों में सामने आया कि मतदान करने वाले करीब 33 लाख लोगों में से 92 फीसदी लोगों ने इराक से अलग होने का समर्थन किया. इस मतदान में कुर्द और गैर कुर्द दोनों शामिल थे. बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, “यह जनमत संग्रह इराक के कुर्दिस्तान क्षेत्र के तीन राज्यों और ‘क्षेत्र के अधिकार से बाहर के कुर्दिस्तान वाले इलाके में’ कराया गया था.”

 

इराक ने जनमत संग्रह को बताया है गैर-कानूनी

इराक के प्रधानमंत्री हैदर अल आब्दी ने अल-अबादी ने इस जनमत संग्रह को संविधान के खिलाफ और गैर-कानूनी बताया है. वहीं, कुर्दिश नेता मसूद बारज़ानी ने बताया है कि कुर्द लोगों ने आज़ादी के पक्ष में समर्थन किया है. आब्दी ने कहा कि जनमत संग्रह के बाद उपजे तनाव को समाप्त करने के लिए उनकी सरकार संविधान और कानून के मुताबिक काम करेगी. हालांकि, आब्दी ने कुर्दों से अपील की है कि वे “संविधान के ढांचे के तहत” इराक़ सरकार से बातचीत करें.” आब्दी का यह बयान ऐसे समय में आया है, जब इराक की संसद ने  प्रधानमंत्री से कहा है कि वह कुर्द वाले इलाकों जैसे  तेल बहुल किरकुक क्षेत्र और अन्य दूसरे विवादित क्षेत्रों में इराकी सेना तैनात करें.

 

कुर्द जनमत संग्रह के खिलाफ है अंतर्राष्ट्रीय समुदाय 

अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम (यूके), तुर्की, और ईरान के साथ-साथ संयुक्त राष्ट्र (यूएन) ने भी इस जनमत संग्रह के खिलाफ चेतावनी दी है.  यूके का इस मामले में कहना है, “यह जनमत संग्रह एक गलती है और आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट (आई.एस.) के खिलाफ चल रहे युद्ध को भटका सकता है.” अमेरिका का भी यही कहना है कि इसकी वजह से आई.एस. के खिलाफ युद्ध कमज़ोर पड़ सकता है.

 

इराक में कुर्द समुदाय की क्या स्थिति है?

इराकी कुर्द संविधान के तहत इराक के नागरिक हैं लेकिन उन्हें काफी मामलों में स्वायत्ता मिली हुई है. कुर्द समुदाय की स्वयं की संसद है और उनके पास खुद की सेना “पशमर्गा” भी है, जो इराक में आई.एस. के खिलाफ इराकी सेना से बेहतर ढंग से लड़ी है. आंकड़ों के मुताबिक, पशमर्गा में लड़ाकों की संख्या 2 लाख से भी अधिक है. इराक में कुर्द लोगों के पास ऐसे क्षेत्र हैं, जहां तेल और गैस के कुओं की भरमार है. ये इन उत्पादों को दूसरे देशों और इराक को बेचते हैं. इस क्षेत्र में कुर्दिस्तान रीजनल सरकार का शासन है. इराक में कुर्द समुदाय के शासन को अगर “State with in State” कहा जाए, तो यह गलत नहीं होगा.
इराक़ की आबादी में कुर्द समुदाय की संख्या करीब 60 लाख है. हालांकि, अगर कुर्द समुदाय की स्थिति की तुर्की, ईरान, सीरिया और अर्मेनिया से तुलना की जाए, तो उस हिसाब से इराक में इनकी स्थिति काफी अच्छी है.

अब सवाल यह उठता है कि इराक में इतनी अच्छी स्थिति होने के बावजूद ये क्यों इराक से अलग होने की मांग कर रहे हैं? इसके उत्तर के लिए मिडिल ईस्ट के पांच देशों (तुर्की, ईरान, इराक, सीरिया और अर्मेनिया) में कुर्द समुदाय के इतिहास को जानना होगा.

 

पांच देशों में कुर्द समुदाय के कितने लोग हैं

कुर्द समुदाय तुर्की, इराक और ईरान समेत पांच देशों में फैले हुए हैं, जो अपने आप को एक अलग जातीय समूह मानते हैं. अगर संख्या की बात करें तो अलग-अलग देशों में कुर्दों की संख्या इस प्रकार है:

तुर्की-1.4 करोड़

इराक-60 लाख

ईरान-60 लाख

सीरिया-20 लाख

अर्मेनिया- 38 हज़ार

 

कौन है कुर्द समुदाय और क्यों कर रहा है अलग देश ‘कुर्दिस्तान’ की मांग

मिडिल ईस्ट में चौथे सबसे बड़े जातीय समुदाय कुर्द खुद को अरब मूल का नहीं मानते हैं. दरअसल, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ऑटोमन साम्राज्य के पतन के बाद कुर्दों ने अपने लिए अलग देश बनाने की मांग शुरू कर दी थी. ऑटोमन साम्राज्य के दौरान और प्रथम विश्व युद्ध से पहले तक वे मेसोपोटामिया के मैदानों में मुक्त होकर व्यापार करते थे. ऑटोमन साम्राज्य के विघटन के बाद लुसान संधि के तहत कुर्द समुदाय को एक अलग देश देने की बात कही गई थी. इसके बाद,  जब तुर्की, ईरान और इराक की सीमा का निर्धारण किया गया, तो कुर्दिस्तान की बात एक दम से गायब हो गई. और तब से, कुर्द समुदाय ईरान, इराक, तुर्की समेत पांच देशों में अल्पसंख्यक समुदाय के रूप में रहने लगे.  साधारण शब्दों में कहें, तो  कुर्द वे पीड़ित समुदाय हैं जिनके पास अपनी आधिकारिक ज़मीन नहीं है. इसलिए वे अपने अस्तित्व, संस्कृति और भाषा के लिए एक अलग देश चाहते हैं और ये तुर्की, ईरान, इराक और सीरिया में अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं.

हालांकि, कुर्द लोगों में अधिकतर सुन्नी मुसलमान ही हैं. पिछले 97 वर्षों में जब-जब कुर्दों ने अलग देश की मांग के लिए आंदोलन छेड़ा तो बर्बरता से कुचल दिया गया.

 

हाल ही में, कुर्दों का प्रभाव बढ़ा है

हाल ही के दशकों में, इन सभी देशों में कुर्दों का प्रभाव बढ़ा है. तुर्की में इनकी स्थिति सबसे खराब है, जहां इनके एक संगठन को आतंकवादी समूह घोषित किया गया है. ईरान में आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट (आई.एस.) के खिलाफ लड़ाई में इनकी प्रमुख भूमिका रही है. इस बात को अमेरिका, यूरोपीय संघ, इराक समेत कई देशों ने स्वीकारा है.

शुभम गुप्ता 

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