संगीत सोम जैसे नेता धूल में मिल जाएंगे, ताजमहल बना रहेगा..

(यह लेख बीबीसी हिंदी से साभार)

प्रियदर्शन

कुछ देर के लिए संगीत सोम का तर्क मान लें और ताजमहल को अपने इतिहास से ख़ारिज करने को तैयार हो जाएं. लेकिन उसके पहले या बाद उन्हें कितनी चीज़ों को ख़ारिज करना होगा?

संगीत सोम को कुर्ता-पायजामा पहनना छोड़ना होगा, क्योंकि ये सिले हुए कपड़े भी गद्दारों की देन है- धोती और उत्तरीय में रहना होगा.

इतना ही नहीं, चाय का भी त्याग करना होगा. चाय उन चीनियों की दी हुई है जो देश के ज़्यादा बड़े दुश्मन हैं. उन्होंने हमारा एक हिस्सा हड़प रखा है, दूसरे हिस्से पर दावा करते हैं और पाकिस्तान के मददगार हैं. उनकी वजह से हम मौलाना मसूद अज़हर को आतंकी घोषित नहीं करवा पा रहे.

अच्छा हो, वे समोसा और गुलाब जामुन खाना भी छोड़ दें- ये सब उन्हीं इलाकों से आए हैं जहां से भारत में पहली बार मुसलमान आए हैं. ऐसे बहुत सारे व्यंजन है जो ईरान-फ़ारस और पश्चिम एशिया के रास्ते भारत आए. बहुत सारे फूलों, फलों और शाक-सब्ज़ियों की दास्तान भी यही है.

लेकिन अगर दुश्मन ही चुनने हों तो चीन और पाकिस्तान क्यों, अंग्रेज़ क्यों नहीं, जिन्होंने 200 साल हम पर शासन किया और हमें ऐसा गुलाम बनाया कि हमारा सारा रहन-सहन बदल गया? और अंग्रेजी सामान का बहिष्कार तो गांधी जी ने भी किया था.

हालांकि यह कुछ मुश्किल है, लेकिन ठेठ और पक्की भारतीयता के लिए इतनी तो शर्त माननी होगी. पूरी आधुनिक तकनीक को विदा करना होगा.

ब्रश और पेस्ट जैसे पश्चिमी सामान छोड़कर नीम या करंज के दतवन का सहारा लें, तरह-तरह के साबुन छोड़ बदन पर मिट्टी लगाएं, और चाय की जगह दूध पिएं- और ख़याल रखें कि यह देसी गाय का हो, जर्सी गाय का नहीं. भोजन का विशेष खयाल रखें. बाहर निकलें तो बैलगाड़ी से.

और निकल कर कहां जाएंगे? जिस संसद भवन में उनके साथी बैठते हैं वह भी अत्याचारी अंग्रेज़ों का बनवाया हुआ है. सरधाना से दिल्ली तक जिस रास्ते वे आते हैं, वह रास्ता किसका बनवाया हुआ है, कभी सोचा है?

कहते हैं, देश को जोड़ने वाली सबसे बड़ी सड़क भी एक अफग़ान गद्दार ने बनाई थी जिसका नाम शेरशाह सूरी था. बाद में उसे अंग्रेज़ों ने ग्रैंड ट्रंक रोड का नाम दिया?

यह ‘हिंदू’ शब्द भी बाहर से आया है. आप सनातनी, वैष्णव, शैव. शाक्त कुछ भी रहे हों, आपको हिंदू तो मुसलमानों ने ही बनाया.

हिंदू छोड़िए, उस हिंदी का क्या करेंगे जो दरअसल अपने मूल में उर्दू से ही बनी है? संगीत सोम के अपने नाम में बहुत सांगीतिकता भी है और वैदिकता भी, लेकिन वह वैसी हिंदी कम से कम इस जन्म में तो नहीं बोल पाएंगे जिसमें पूरी तरह उर्दू और फ़ारसी शब्द निषिद्ध हों?

तुलसी की रामचरितमानस से उर्दू के शब्द कैसे हटाएंगे? तुलसी एक ही पद में तीन बार राम को ग़रीबनवाज़ कहते हैं. क्या संगीत सोम की हिम्मत है कि वे ग़रीबनवाज़ को बदल कर दरिद्रनारायण कर डालें?

वैसे ‘दरिद्र नारायण’ नाम से एक बहुत सुंदर कहानी राजा राधिकारमण प्रसाद सिंह ने लिखी है- उसका गद्य अनूठा है, इसलिए कि उसमें उर्दू की छौंक बहुत प्यारी है. और प्रेमचंद का क्या करेंगे संगीत सोम? और मुगले आज़म और पाकीज़ा जैसी यादगार फिल्मों का? ग़ालिब और मीर को भी हटा देंगे?

क्या संगीत सोम ने किसी रामविलास शर्मा का नाम सुना है? हिंदी के बहुत बड़े आदमी रहे रामविलास शर्मा. उन्होंने मध्यकाल के तीन शिखर माने हैं- तुलसी, तानसेन और ताजमहल. क्या इस विरासत को संगीत सोम मिटा पाएंगे?

मामला कुछ ज़्यादा संगीन होता लग रहा है. हो सकता है, इन नामों से हमारे नेता परिचित ही न हों. लेकिन इतना तो वे समझ सकते हैं कि भारत एक देश नहीं, एक पूरी सभ्यता है. इस सभ्यता को बहुत सारी नदियों और समंदरों के पानी ने सींचा है. हमारे भीतर यह भूमंडलीय तरावट इतनी पुरानी है कि हर तरह की कट्टरता आकर यहां शरमा जाती है, कुछ बदल जाती है.

उस नई कट्टरता को छोड़कर जो इस पूरी विरासत को नकारने पर तुली है- जिसे अपने अलावा हर दूसरा गद्दार या दुश्मन नज़र आता है. सारी दुनिया जब बहुत सारी कट्टरताओं के विरुद्ध एक बड़ी लड़ाई लड़ रही है तो हमारे यहां कट्टरता के ये नए पैरोकार हैं जो दिखा रहे हैं कि हम भी उनसे कम नहीं.

ताजमहल की सबसे तीखी आलोचना अगर किसी ने की तो वह भी एक ‘गद्दार’ था.

साहिर लुधियानवी ने लिखा, ‘एक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताजमहल, हम गरीबों की मोहब्बत का उड़ाया है मज़ाक’

यानी ताजमहल और शाहजहां और किसी और की भी आलोचना हो सकती है. आलोचना हमें बताती है कि हम अपनी परंपरा को किस तरह- या किस-किस तरह से देख सकते हैं.

और ताजमहल के बारे में सबसे मार्मिक ढंग से अगर किसी ने लिखा तो वह भारत के पहले नोबेल सम्मान विजेता रवींद्रनाथ ठाकुर थे. गुरुदेव ने ताज को काल के कपोल पर लुढ़की हुई आंसू की बूंद कहा था. साहिर और टैगोर की ये अलग-अलग दृष्टियां बताती हैं कि सुंदरता और सृजन को देखने के कितने ढंग हो सकते हैं.

इस परंपरा के बीच ही हमारा खाना-पीना, ओढ़ना-बिछाना, सोना, हंसना-गाना, रोना और जीना बना है. इसी से भारतीयता बनी है- उसके अलग-अलग तत्व कई बार में आपस में बुरी तरह झगड़ पड़ते हैं, लेकिन वे एक-दूसरे से इस तरह बंधे हैं कि जैसे लगता है कि अलग होंगे तो अर्थहीन और बेमानी हो जाएंगे.

लेकिन संगीत सोम का वास्ता न सुंदरता से है, न सृजन से है, न परंपरा से है और न सभ्यता से- वे बस एक ऐसी नफ़रत के नुमाइंदे हैं जिनकी आंख पर पट्टी बंधी हुई है, ऐसे संगीत सोम जैसे नेता धूल में मिल जाएंगे, ताजमहल बना रहेगा.

प्रियदर्शन

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