प्रगतिशील मूल्यों का उत्कर्ष है लोक आस्था का महापर्व छठ !

केशव कुमार
प्रकृति के आगे मानवीय आस्था का संपूर्ण समर्पण व प्रगतिशील मूल्यों का उत्कर्ष है महालोकपर्व छठ. एक ऐसा लोकपर्व जिसके गीतों से लेकर पूजा पद्धति तक में प्रगतिशील मूल्यों का समावेश नजर आता है. शास्त्रों में सूर्यषष्ठी नाम से बताए गए चार दिनों तक चलने वाले महान लोकपर्व छठ पूजा में जहां भी पूर्वांचल के लोग रहते हैं, वे व्रत और पूजा के रूप में सर्वाधिक मान्यता प्राप्त छठ पर्व को जरूर मनाते हैं. छठ के दिनों में पूरब जाने वाले हवाई जहाजों, ट्रेन और रोडवेज की हालत देखते ही बनती है. छठ पर्व में खास सिर्फ व्रती और उनका आशीर्वाद होता है. बाकी सब एक जैसे और सिर्फ श्रद्धालु होते हैं, जिन्हें पूजा में शामिल होना ही सबसे बड़ा मकसद लगता है. इस पर्व में कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की षष्ठी आौर सप्तमी को अस्ताचलगामी और उदीयमान सूर्यदेव की उपासना की जाती है और भगवान भास्कर को अघ्र्य देकर नमन किया जाता है. सूर्य उपासना का यह पर्व कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष के चतुर्थी से सप्तमी तिथि तक मनाया जाता है. सूर्यषष्ठी व्रत होने के कारण इसे ‘छठ’ कहा जाता है.
छठ पर्व कैसे शुरू हुआ इसके पीछे कई ऐतिहासिक कहानियां प्रचलित हैं. पुराण में छठ पूजा के पीछे की कहानी राजा प्रियंवद को लेकर है. कहते हैं राजा प्रियंवद को कोई संतान नहीं थी तब महर्षि कश्यप ने पुत्र की प्राप्ति के लिए यज्ञ कराकर प्रियंवद की पत्नी मालिनी को आहुति के लिए बनाई गई खीर दी. इससे उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई लेकिन वो पुत्र मरा हुआ पैदा हुआ. प्रियंवद पुत्र को लेकर श्मशान गए और पुत्र वियोग में प्राण त्यागने लगे. उसी वक्त भगवान की मानस पुत्री देवसेना प्रकट हुईं और उन्होंने राजा से कहा कि क्योंकि वो सृष्टि की मूल प्रवृति के छठे अंश से उत्पन्न हुई हैं, इसी कारण वो षष्ठी कहलातीं हैं. उन्होंने राजा को उनकी पूजा करने और दूसरों को पूजा के लिए प्रेरित करने को कहा.
राजा प्रियंवद ने पुत्र इच्छा के कारण देवी षष्ठी की व्रत किया और उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई. कहते हैं ये पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को हुई थी और तभी से छठ पूजा होती है.

भक्तों की अटल आस्था का अनूठा पर्व छठ की चर्चा ऋग्वेद में भी की गई है. भारत में सूर्य को भगवान मानकर उनकी उपासना करने की परंपरा ऋग्वैदिक काल से चली आ रही है. सूर्य और उनकी उपासना की चर्चा विष्णु पुराण, भागवत पुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण आदि में विस्तार से की गई है. रामायण में माता सीता द्वारा छठ पूजा किए जाने का वर्णन है. वहीं, महाभारत में भी इससे जुड़े कई तथ्य हैं. मध्य काल तक छठ व्यवस्थित तौर पर पर्व के रूप में प्रतिष्ठा पा चुका था, जो आज तक चला आ रहा है. इसके अलावा तमाम पुराणों और शास्त्रीय कथानकों में भी इसकी चर्चा के पीछे प्रकृति को देवी मानने और उनके साथ मां का रिश्ता मानने की आस्था है. छठ पूजा को लेकर कई स्थानीय कहानियां भी मौजूद हैं.

दीपावली, काली पूजा और भैयादूज के बाद कार्तिक शुक्ल पक्ष तृतीया से छठ पूजा के कार्यक्रम शुरू हो जाते हैं. पहले दिन नहाय-खाय में काफी सफाई से बनाए गए चावल, चने की दाल और लौकी की सब्जी का भोजन व्रती के बाद प्रसाद के तौर लेने से इसकी शुरुआत होती है. दूसरे दिन लोहंडा या खरना में शाम की पूजा के बाद सबको खीर का प्रसाद मिलता है. अगले दिन शाम में डूबते हुए भगवान सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है. फिर अगली सुबह उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देने के बाद पूजा का समापन होता है और लोगों में आशीर्वाद और प्रसाद लेने की होड़ मच जाती है. आखिर के दोनों दिन ही नदी, तालाब या किसी जल स्रोत में कमर तक पानी में जाकर सूर्य को अर्घ्य देना होता है. सबसे कठिन व्रत कहा जाने वाला ‘दंड देना’ भी इस दो दिन के दौरान ही किया जाता है. इसे करने वाले शाम और सुबह अपने घर से पूजा होने की जगह तक दंडवत प्रणाम करते हुए पहुंचते और जल स्रोत की परिक्रमा करते हैं. दंडवत का मतलब जमीन पर पेट के बल सीधा लेटकर प्रणाम करना है. सारे श्रद्धालु बहुत ही आदर के साथ इनके लिए रास्ता छोड़ते हैं.महिला प्रधान व्रत के चारों दिन सबसे शुद्धता, स्वच्छता और श्रद्धा का जबर्दस्त आग्रह रहता है. व्रती जिन्हें ‘पवनैतिन’ भी कहा जाता है, इस दौरान जमीन पर सोती हैं और बिना सिलाई के कपड़े पहनती हैं. वे उपवास करती हैं और पूजा से जुड़े हर काम को उत्साह से करती हैं. ‘छठ गीत’ नाम से मशहूर इस दौरान गाए जाने वाले लोकगीतों को इन महिलाओं का सबसे बड़ा सहारा बताया जाता है. छठ के प्रसाद भी घर में बनाए गए पकवान या स्थानीय मौसमी फल होते हैं. यह सुविधा किसानों-पशुपालकों के लिए सबसे बड़ी राहत देने वाली होती है. प्रसाद का बड़ा हिस्सा आपसी लेन-देन से ही पूरा किया जाता है. लोगों को जोड़ने वाली यह प्रथा मौजूदा दौर में भी ‘वस्तु- विनिमय’ का सबसे बड़ा उदाहरण है. छठ पूजा के दौरान खरीदारी को लेकर सबसे कम चिंता होती है.खुद में तमाम आंचलिकता समेटे इस पर्व के दौरान आसपास के अप्रवासी ग्रामीणों का सहज ही महासम्मेलन हो जाता है. संगीत, नाटक जैसे सामूहिक कार्यक्रम और उसमें दिया जाने वाला चंदा उन्हें आपस में और मजबूती से जोड़ता है.

इस व्रत के कार्यक्रमों को कोई एक बार देख ले तो मेरा दावा है कि वह इन अनुभवों को हमेशा संजोकर रखेगा. सूर्य की किरणें ही नहीं उनकी आभाओं को भी अर्घ्य देकर अपनी आस्था मजबूत करने वाली पूजा में आपको ग्रामीण भारत का संस्कार दिखेगा, कोई सवाल नहीं दिखेगा.

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