कविता – और सुनो बरखुरदार मुझे इस बंद कमरे में बड़ा आराम दिखायी देता है !

मुझे अपने बंद कमरे में
आराम दिखायी देता है
ना ही किसी का रोना
ना चिल्लाना सुनायी देता है
ना कोई लाचार
ना ही भूख से बिलबिलता
दिखायी देता है
सब चकाचक है गुरु
कहाँ कुछ गड़बड़ दिखायी देता है
और अगर कुछ है ख़राब
तो भी क्यूँ त्यागूँ मैं अपना आराम
मैं अपने एयर कंडिशन कमरे की
खिड़की क्यूँ खोलूँ
किसी का कोई हक़ मारे
तो क्यूँ बोलूँ
किसी निर्दोष ग़रीब के संग
क्यूँ हो लूँ
मैंने तो बचपन से अपने लिये
पढ़ाई की है
दिन रात मेहनत कर
ये नौकरी मिली है
पाई पाई जोड़ के
ये हवेली ली है
और सुनो बरखुरदार मुझे इस बंद
कमरे में बड़ा आराम दिखायी देता है
“शिखर”
रमा यादव भारतीय प्रबंधन संस्थान , रोहतक में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं !

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