आखिर क्यों हर साल पराली जला देता है किसान?

वीरेंदर भाटिया 

हरियाणा पंजाब में खेतों से लगते मार्ग स्मॉग से 5 मीटर की विजिबिलिटी में आंखे मिचमिचा रहे हैं. राह गुजरते राहगीरों की आंखे जल रही हैं, दमा के रोगी सांस नही ले पा रहे. दिन में कई कई बार इन्हेलर की जरुरत पड़ रही है। स्कूलों के समय बदल गए हैं. बसें लेट हैं. ट्रेन लेट हैं. सड़क पर दुर्घटनाओं का आंकड़ा तेजी से बढ़ गया है एक ही दिन में दर्जनों दुर्घटनाओं की खबर से सड़क पर रोज यात्रा करने वाला यात्री सहमा है औऱ किसान को गरिया रहा है कि पाबंदी के बाद भी किसान पराली क्यो जला रहा है औऱ सरकार के आदेशों की धज्जियां क्यों उड़ा रहा है. खबर यह भी सुनने में आई कि कुछ कर्मचारी अधिकारी जो पराली जलने वाली जगह पहुंचे तो उनकी छितर परेड हुई. इसलिए अधिकारी कमर्चारी मौका मुआयना नही कर रहे. लेकिन दूसरा सच यह भी है कि मौका मुआयना करने वाले अधिकतर अधिकारी कर्मचारी कागजों में ही मौका मुआयना करते हैं अन्यथा आम नागरिक औऱ अधिकारी के बीच इतनी दूरी ना होती.

क्या किसान को ही इसका दोषी समझा जाए कि उसने आम जन की चलती जिंदगी में ब्रेक लगा दिया है या जमीनी सच्चाई भी परखी जाए कि आखिर किसान इसे जला क्यों देता है?

किसान को अगली फसल के लिए जमीन खाली करनी है. उसके पास बच गए ठूंठ उठाने और कहीं डिस्पोज़ करने का बजट नही है. देश की सरकारों की नालायकी का यह बड़ा उदाहरण है कि 21वी सदी में आधुनिक होते मुल्कों में खुद को स्थापित करने को बेचैन भारत मे कृषि में कोई आधुनिकता नही आई है. पिछली बार भी हरियाणा औऱ पंजाब सरकारों ने कहा था कि पराली जलाना मत. हम ले जाएंगे औऱ इस से बिजली बनाएंगे. सरकार यह कह कर भूल गई. किसान भी बेहतर जानता है कि सरकार ने करना कुछ नही. सब भूल जाना है बस.

किसान की फसल के अवशेष बेहद कीमती हैं. हर वेस्ट (waste) का उपयोग (use) है. हर वेस्ट कहीं न कहीं प्रयोग होती है लेकिन सरकार उन्हें इसके लिए मंडी उपलब्ध नही करेगी बल्कि नियम बना कर डंडा लेकर खड़ी हो जाएगी. जंगली करेला भखडी अमलतास दूब जैसे कितने ही वेस्ट हैं जो आयुर्वेद में दवा हैं लेकिन किसान जला देता है. यह इसलिए क्योंकि सरकार औऱ किसान के बीच संवाद ही नही है.

पिछले ही दिनों एक थ्रेशर नुमा मशीन आयी है जो पराली को इकठा करके उसके बंडल बना देती है. बुलेट ट्रेन के थोड़े से बजट को इधर प्रयोग करके थोड़ी मशीनें ले लीजिए और फिर किसान को कहिये कि हम आ रहे हैं. पराली जलाना मत.

कृषि पर ग्रास रुट तक काम करने की जरूरत है. वैसे भी इतने सारे संघी मित्र गौ सेवा औऱ राम सेवा में लगा रखे हैं सरकार ने, क्यों ना उन्हें कृषि सेवक बना कर उन्हें शिक्षित करके कृषि विकास के लिए उतारा जाए औऱ विशेष कुशल अधिकारियों को औऱ कृषि विशेषज्ञों को मंत्रालय में बैठा कर युद्ध स्तर पर काया कल्प किया जाए. किसान कभी जिद नही करता लेकिन सरकार के डंडे से हांका भी नही जाएगा. किसानी की दशा को समझते हुए पराली को ही लाभ की वस्तु बना दीजिये. किसान जलाएगा ही नही. अन्यथा लुटे पिटे किसान के पास वेस्ट को ठिकाने लगाने का यही सस्ता इलाज है.

वीरेंद्र भाटिया

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