नोटबंदी की बरसी पर सरकार के बयानवीरों के ही बदल गये सुर!!

गिरीश मालवीय

आज 8 नवम्बर है आज का दिन ऐसा है जिसे लम्बे समय तक भारत मे याद रखा जाएगा, पिछले साल 8 नवम्बर की रात 8 बजे एक ऐसा फैसला लिया गया जिससे भारत की अर्थव्यवस्था को जो धक्का पुहंचा, जिससे उबरने में उसे दशकों लग जाएंगे.

नोटबन्दी एक डिजास्टर स्ट्रोक था जिसे मास्टर स्ट्रोक बताने में आज भी भाजपा के बयानवीर कोई कसर नही छोड़ रहे हैं, ज्या द्रेज ने कहा था कि नोटबन्दी पूरी रफ्तार से चल रही मोटर गाड़ी के टायरों पर गोली दागने जैसा ही है, अफसोस है कि वह सही थे.

स्टीव फोर्ब्स ने भी उस वक्त बहुत मार्के की बात कही थी “भारत सरकार का नोट बंदी का कृत्य घोर अनैतिक है, क्योंकि मुद्रा वह वस्तु है, जो लोगों द्वारा बनाई गई वस्तुओं का प्रतिनिधित्व करती है इस तरह के संसाधन सरकारें नहीं, लोग पैदा करते हैं “.

अर्थशास्त्र से जुड़े बहुत से लोगो ने इसकी आलोचना की है, अमर्त्य सेन, अरुण कुमार, रघुराम राजन समेत सभी रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर ने इसकी आलोचना की है लेकिन इन सभी आलोचनाओं को विपक्ष की साजिश, देशद्रोही विचार आदि कह कर खारिज कर दिया गया,मीडिया ने भी हां में हां ही मिलाई, लेकिन कुछ अर्थशास्त्र से जुड़े ज्ञाता ऐसे भी थे जो उस वक्त यह मानते थे कि नोटबन्दी से देश की अर्थव्यवस्था में बहुत बड़ा सुधार आएगा. नोटबन्दी की बरसी पर यह जान लेना समीचीन होगा कि आज उनका क्या कहना पड़ता है.

प्रख्यात अर्थशास्त्री एस. गुरूमूर्ति ने उस वक़्त नोटबंदी को वित्तीय पोखरण बताते हुये कहा था कि ऐतिहासिक आर्थिक कुप्रबंधन को समाप्त करने के लिए यह बहुत जरूरी था, उन्होंने कहा था कि पोखरण परमाणु परीक्षण के बाद तमाम तरह की अटकलें लगायी जा रही थीं, लेकिन उससे न सिर्फ देश की दिशा बदली बल्कि दशा भी बदल गयी; और भारत की छवि बुद्ध तथा महात्मा गाँधी वाले देश से हटकर एक शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में उभरी. उसी तरह से इस नोटबंदी से भी भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत होगी.

कुछ दिनों पहले यही गुरुमूर्ति साहब मद्रास स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स में आयोजित एक कार्यक्रम में नोटबंदी के विषय पर बोले कि अर्थव्यवस्था रॉक बॉटम पर है यह एकदम पेंदे पर पहुंच गई है. नोटबंदी “गैस चैंबर” बन गया हैं वह पहला रणनीतिक फ़ॉल्ट था. इसका अर्थ था कि सरकार अग्रिम टैक्स संग्रह की जगह टैक्स इकठ्ठा करने के लिए काले धन के पीछे भाग रही थी.

उनका कहना था कि नोटबंदी के फायदे थे लेकिन उस पर इतना खराब अमल हुआ कि काला धन रखने वाले बच गए। नकदी के खत्म होने से आर्थकी के उस अनौपचारिक क्षेत्र को लकवा मार गया है जो 90 प्रतिशत रोजगार देता था और जिसको 95 प्रतिशत पूंजी बैंकों के बाहर से मिलती है। नतीजतन कुल उपभोग और रोजगार जड़ हो गया है.

गुरुमूर्ति की यह आत्मस्वीकृति काफी दिलचस्प है. कुछ ऐसे ही विचार उन्होंने जीएसटी को लेकर भी रखे कि जीएसटी अच्छी बात है मगर यह बहुत महत्वकांक्षी है। एक ही झटके में भारत की पूरी आर्थिकी को औपचारिक, फोरमलाइज कर देना चाह रहे हैं। यह संभव नहीं है। ऐसा क्रमशः (calibrated formalisation) से होना चाहिए। मीडिया फेल हो रहा है। भारत में आर्थिक थिंक टैंक मौलिक काम नहीं कर रहे है.

कुछ ऐसा ही हाल नोटबंदी के फैसले का पुरजोर समर्थन करने वाले दक्षिणपंथी मैगजीन ‘स्‍वराज्‍य’ के संपादक आर जगन्‍नाथन का हुआ उन्होंने माना कि उन्‍होंने इस बारे में गलत अनुमान लगाया। जगन्‍नाथन ने मैगजीन में लिखे एक लेख में कहा है कि ‘यह मिया कल्‍पा (गलती मानने) का समय है।’

जगन्‍नाथन अपनी राय में बदलाव की वजह बताते हुए लिखा है कि ‘अब, खासकर कर्ज माफी के लिए किसान आंदोलन के बाद, मुझे लगता है कि नोटबंदी के बहीखाते में लाभ के मुकाबले हानि का कॉलम ज्‍यादा भरा है। यह (नोटबंदी) फेल हो गया।” वह लिखते हैं, ”मोदी के 500 व 1,000 रुपए के नोटों को अवैध घोषित करने के 7 महीने बाद, हालात ये हैं कि खर्च, फायदों पर भारी पड़ रहा है। और किसान कर्ज माफी का नोटबंदी से सीधा जुड़ाव है।”वह लिखते हैं, ”अब यह स्‍पष्‍ट तौर पर कहा जा सकता है कि नोटबंदी वह आखिरी कदम था जिसने किसानों की कमर तोड़ दी, और किसानों के विरोधों की श्रृंखला तथा कर्ज माफी की राजनैतिक मांग उठनी शुरू हुई।” जगन्‍नाथन के मुताबिक, ”नोटबंदी से इतना नुकसान होगा जितना पहले कभी नहीं हुआ

जगन्‍नाथन ने नरेंद्र मोदी के बारे में कहते हैं ”काले धन की कमर तोड़ने के लिए कड़े फैसले लेने वाले बोल्‍ड नेता जैसा बनने की सोचना अच्‍छा है, मगर यह ठीक बात नहीं कि इसे आधे-अधूरे तरीके से किया जाए और उस काम में भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था की कमर तोड़ दी जाए।”

अब बात करते हैं तीसरे महारथी की. कहते है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नोटबंदी का सुझाव अर्थक्रान्ति के अनिल बोकिल जी ने ही दिया अब बोकिल जी के सुर अचानक बदल से गए हैं. वह कह रहे हैं कि सरकार ने नोटबंदी को मानों ऐसे लागू कर दिया, जैसे ​किसी डॉक्टर ने मरीज को बिना एनेस्थीसिया दिए गंभीर आॅपरेशन कर दिया हो.

आज अनिल बोकिल कह रहे हैं कि अर्थक्रांति द्वारा दिए गए सुझाव में स्टेप वाइज नोटबंदी करना शामिल था. इसके तहत एक निश्चित समयांतराल में पहले एक हजार, फिर पांच सौ और बाद में एक सौ रुपए के नोट बंद करने की सलाह थी. इसके साथ ही डिजिटल लेन—देन को बढ़ावा देना भी शामिल था. अर्थक्रांति का सुझाव था कि 50 रुपए से अधिक की करेंसी नहीं होनी चाहिए. दो हजार जैसे बड़े नोट बाजार में लाने की सलाह तो बिल्कुल ही नहीं थी.

जीएसटी के बारे में पूछने पर उनका कहना था कि यदि जीएसटी (गुड्स एंड सर्विस) टैक्स की जगह यदि सरकार बीटीटी (बैंक ट्रांजिक्शन टैक्स) लागू करे तो अर्थव्यवस्था में तेजी से सुधार होने की संभावना थी पेट्रोल, डीजल, लीकर जैसे कई प्रोडेक्ट जीएसटी के दायरे से बाहर हैं तो फिर यह वन नेशन व टैक्स कैसे हुआ ?

यह वह लोग थे जो नोटबन्दी को शुरुआत में एक ऐतिहासिक कदम बता रहे थे,आज नोटबन्दी को एक बरस गुजर जाने के बाद चंद टुच्चे राजनेताओं के अलावा कोइ भी समझदार आदमी यह नही बोल सकता कि नोटबन्दी से वास्तविक रूप में अर्थव्यवस्था को फायदा पहुंचा है.

 गिरीश मालवीय

 

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