भारत और लंका के समाजवादियों के मध्य लोहिया व लिमये के बाद सबसे मजबूत कड़ी और संवाद सेतु शिवपाल

न्यूज़ कैप्चर्ड उत्तर प्रदेश के कुछ महत्वपूर्ण महत्वपूर्ण शख्सियतों के व्यक्तित्व पर एक सीरीज प्रस्तुत कर रहा है। इसी कड़ी में हम आने वाले कुछ दिनों में शिवपाल यादव के व्यक्तित्व से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर आज के दौर के सशक्त हस्ताक्षरों के विचार प्रस्तुत करेंगे। संपादक

प्रो० तिस्सा वितर्ना
पूर्व केन्द्रीय मंत्री व महासचिव लंकन सोशलिस्ट पार्टी

भारत और लंका के मध्य जितना ऐतिहासिक रिश्ता है, उतना ही सांवेगिक रिश्ता भारत व लंका के समाजवादियों के मध्य रहा है। दोनों के मध्य संवाद और विचार विनिमय होता रहा है। भारत और लंका दोनों बुनियादी तौर पर समाजवादी गणराज्य हैं।  हमारे पूरे नाम में ‘समाजवादी’ शब्द है तो भारतीय संविधान के प्रस्तावना में समाजवादी शब्द है।  श्रीलंका में ननक्करापथराज मार्टिन परेरा का वही स्थान व योगदान है जो भारत में लोहिया या जेपी का है। डा. लोहिया की भांति डा. परेरा भी लास्की के शिष्य थे।  दोनों समवय थे। लगभग एक ही समय यूरोप से शोध कर एशिया लौटे। बयालिस की क्रांति को मजबूत करने के लिए परेरा भारत गए थे, उस  ऐतिहासिक सभा में भाग लिया था जिसमें ‘करो या मरो’ का नारा दिया गया था। वह 1937  में भारतीय मजदूरों के आंदोलन में शामिल हुए थे। जुलाई 43 में मुंबई में गिरफ्तार भी हुए।  लोहिया जब लंका आए तो विचार की संजीवनी देकर गए। उन्होंने लंका के समाजवादियों को समाजवाद का पाठ पढ़ाया। लोहिया का यह कमेंट लंका के सभी अख़बारों में छपा था ”एशिया  का सौंदर्यशाली  टुकड़ा जो यूरोप बनने की चेष्टा कर रहा था, अब उलझन में है और शायद किसी दिन मानवीय बनने की चेष्टा करे। ” परेरा लंका सम समाज पार्टी के नेता के बाद में लंका के नेता प्रतिपक्ष व  केंद्रीय मंत्री भी रहे, उन्होंने कई समाजवादी अवधारणाएं लोहिया से लेकर लंका में लागू किया। डॉक्टर हेक्टर अभयवर्धन तो लोहिया की मैनकाइंड की संपादकीय मंडल के मार्गो स्केनर व स्टालिन की बेटी श्वेतलाना के साथ सदस्य थे।  लिमये भी लंका आते रहे और हमें बुलाते रहे।  इसके बाद दशकों तक बातचीत नहीं हुई।

बरसों बाद अचानक शिवपाल जी का फोन आया मैं उस समय मिनिस्ट्री की मीटिंग ले रहा था।  बात नहीं हो पाई। 3 घंटे के अंदर चार-पांच बार फोन आया। मैंने सोचा कोई पर्सनल काम होगा तभी शिवपाल बार बार फोन कर रहे हैं, लेकिन जब बात हुई तो अच्छा लगा, शिवपाल जी ने मेरी पुस्तक पढ़ कर बधाई देने के लिए फोन किया था, दूसरा फोन उनका भारतीय मछुआरों को रिहा करने के लिए आया।  मैंने तुरंत कोस्टल मिनिस्ट्री से बात की और कहा कि इंडिया से मेरे नेता का हुक्म है।  मछुआरों को रिहा कर दिया गया, उनका कोई दोष नहीं था, वे मछली पकड़ते-पकड़ते लंका की सामुद्रिक सीमा लांघ गए थे। शिवपाल जी से जितनी भी बात हुई है, मुझे लगता है कि वे गरीबों और वंचितों के बारे में ज्यादा सोचते हैं। दूसरी बात जो शिवपाल ने कही, वह सीता माता का मंदिर बनवाने में सहयोग करने के लिए थी।  हालांकि माता मंदिर मेरे निर्वाचन क्षेत्र में नहीं पड़ता है।  टूरिज्म और धार्मिक मामले के मंत्री को मैंने कहा, शिवपाल जी को कोट भी किया।  वहां अब अच्छा काम हुआ है, वह जगह जहां माता की अग्नि परीक्षा हुई थी, अब काफी बेहतर बना दिया गया है।

शिवपाल जीके योगदान और संवेदनाओं को ध्यान में रखते हुए हमारी पार्टी के अपने 80 वें अधिवेशन में अंतर्राष्ट्रीय नेताओं में शिवपाल को आमंत्रित किया।  वे  भारत और लंका के समाजवादियों के मध्य लोहिया व लिमये के बाद सबसे मजबूत कड़ी और संवाद सेतु हैं।

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