अनुशासन और अदब के अहर्निश साधक शिवपाल !

न्यूज़ कैप्चर्ड उत्तर प्रदेश के कुछ महत्वपूर्ण महत्वपूर्ण शख्सियतों के व्यक्तित्व पर एक सीरीज प्रस्तुत कर रहा है। इसी कड़ी में हम आने वाले कुछ दिनों में शिवपाल यादव के व्यक्तित्व से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर आज के दौर के सशक्त हस्ताक्षरों के विचार प्रस्तुत करेंगे। संपादक

उदय प्रताप सिंह
साहित्य और राजनीति के सशक्त हस्ताक्षर

सन 1967 में नेता श्री मुलायम सिंह यादव के जसवंत नगर क्षेत्र से विधायक चुने जाने के बाद पूरे क्षेत्र में सामाजिक और राजनैतिक बदलाव की ऐसी सुखद बयार बही की पूरा क्षेत्र विकास और खुशहाली के सपने देखने लगा। मुलायम सिंह यादव उस समय मेरे साथ जैन इंटर कॉलेज करहल में अध्यापक थे और उनके तीन भाई रामगोपाल यादव, राजपाल यादव और शिवपाल यादव उसी विद्यालय में आगे-पीछे की कक्षाओं के छात्र थे। यह वह समय था जब करहल क्षेत्र के लोग अपने को बहुत उपेक्षित अनुभव कर रहे थे और विकास की दृष्टि से करहल राजनैतिक उपेक्षा का शिकार रहा था।  मैं सेंट जॉन्स कॉलेज आगरा से एमए करके अंग्रेजी का अध्यापक नियुक्त हुआ था और उस समय के करहल के लिए मेरे मन में जाने क्यों ऐसी आत्मीयता और स्नेह बढ़ता गया कि मैं वहीँ का होकर रह गया। मुलायम सिंह यादव के परिवार और उनके सभी भाइयों से अध्यापक और छात्र के अतिरिक्त घरेलू संबंध जाने कब से विकसित हो गए जो आज तक बरकरार है। राम गोपाल, राजपाल और शिवपाल तीनों में एक गुण सामान्य था कि बोलने में अंतर्मुखी लगते थे लेकिन मुलायम सिंह द्वारा दी गई राजनीतिक और सामाजिक क्रिया-कलापों में उनकी सक्रियता प्रशंसनीय थी। इसी क्रम में इस परिवार से मेरी भी आत्मीयता बढ़ती गई। मुझे एक घटना अपने अध्यापन काल की याद आ रही है। मैं सीनियर डिवीजन कमीशंड अफसर था और कैप्टन हो गया था। मैनपुरी और फिरोजाबाद तब दो जिले नहीं हुए थे और उस समय सात अन्य  कॉलेजों में  सीनियर डिवीजन कम्पनियां छात्रों को प्रशिक्षण दे रही थीं। यह वह समय था जब 1962 के चीन युद्ध के बाद सरकार की नीति थी कि द्वितीय रक्षा पंक्तियों का शीघ्रता से विकास किया जाए और उनमें से सेना के लिए अधिकारियों और सैनिक चुने जाएं,  इस हेतु बड़े-बड़े कैंप लगते थे जिनमें बाहर से प्रशिक्षण देने हेतु अधिकारी और सैनिक प्रशिक्षक बाहर से बुलवाये जाने थे।

इसी क्रम में एक कैंप हेतु स्थल का चुनाव होना था और बाहर से आए हुए अधिकारियों ने करहल के जैन इंटर कॉलेज के खेल प्रांगण को सर्वोत्तम ठहराया। परेड और प्रशिक्षण के लिए बड़े-बड़े मैदानों के खेल के अतिरिक्त विद्यालय के चारों ओर धान के हरे भरे खेत हुआ करते थे। विद्यालय के भवन से सटी हुई एक छोटी सी नहरिया बहती थी जो सदैव लबालब रहती थी। विद्यालय का भवन भी बहुत अच्छा था। जिसमें अधिकारियों के ठहरने एवं प्रतिभागियों के ठहरने के लिए अलग-अलग उपयुक्त स्थान थे। उस समय के अविकसित करहल के हिसाब से विद्यालय प्रांगण इस कैंप के लिए आदर्श स्थल था लेकिन इस छोटे से कस्बे में न कोई होटल था, ना रेस्टोरेंट था और न ही खाने पीने की दुकानें थीं।

अतः मेरे सामने समस्या यह थी कि मुझे मेजबानी करनी पड़ेगी और लगभग 200 लोगों के लिए तीन वक़्त के खाने का प्रबंध आसान काम नहीं था।  पैसे का बंदोबस्त तो सरकार की तरफ से पर्याप्त था पर जनशक्ति का, खरीद फरोख्त, खाना बनवाने का, पीने के पानी की व्यवस्था आदि इतने कार्य थे जिन्हें सोच-सोच कर मैं परेशान था। ऐसे समय में मुझे अपने छात्र शिवपाल जी की याद आई, मुलायम सिंह से इस संबंध में विस्तार से चर्चा पहले ही हो चुकी थी और उन्होंने दूध-दही, मट्ठा, घी आदि जैसी अनुपलब्ध सामग्री की आपूर्ति का पूरा भरोसा दिया।  अब बात जन शक्ति की थी, मैंने शिवपाल जी को विश्वास में लिया और उन्होंने मुझे आश्वासन दिया कि उनके साथी-सहयोगी दिन रात काम करेंगे।  अब इन सब प्रश्नों का हल तो दिखाई पड़ने लगा पर एक विकराल समस्या थी जिसका मेरे पास कोई जवाब नजर नहीं आता था।

विद्यालय में जैन समाज का प्रबंधन था और विद्यालय में किसी अध्यापक के नियुक्त होने से पहले उनसे एक प्रकार के शपथ पत्र पर हस्ताक्षर कराए जाते थे कि वे  मांसाहारी भोजन और हर प्रकार की हिंसा से बचेंगे। मेरे मन में एक घटना यह भी थी कि विद्यालय में 26 जनवरी का उत्सव था उसी समय परेड ग्राउंड पर एनसीसी कैडेट को एक सांप नजर आया और उन्होंने अपने बाल स्वभाव की प्रतिक्रिया स्वरूप बंदूक की बटों से कुचलकर मार डाला । बाद में मुझे एनसीसी ऑफिसर होने के कारण जैन समाज और प्रबंध समिति की बातें भी सुननी पड़ी और उन्होंने कहा कि इस हिंसा के लिए मुझे क्षमा मांगनी चाहिए। ये बहुत आसान सा दंड था और मैंने स्वीकार कर लिया।

लेकिन इस समय समस्या यह थी कि एनसीसी अफसरों में सभी शाकाहारी नहीं थे खासतौर से बाहर से आए हुए कर्नल साहब थे जो पर्वतीय प्रदेश के रहने वाले थे और चीन के युद्ध में उन्होंने अद्भुत शौर्य और वीरता का परिचय दिया था और बुरी तरह घायल भी हुए थे, जिसके कारण उन्हें परमवीर चक्र से राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित किया गया था। उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि वे शाकाहारी भोजन नहीं करेंगे। जब मैंने उन्हें विद्यालय की पूरी स्थिति से अवगत करायाऔर कहा कि मांसाहार विद्यालय में देना संभव नहीं है तो बात एक समझौते पर आकर अटक गई। उन्होंने परिस्थिति को समझते हुए कहा कि अंडा तो शाकाहार में आता है, इतनी व्यवस्था तो कर सकते हो ? मैं चुप रह गया जिसे रजामंदी माना गया।

मुझे फिर शिवपाल जी की याद आई और मैंने उन्हें बुलाकर अपनी समस्या बताई और कहा कि आप ही मुसीबत में संकट मोचक हो सकते हो। मैंने उनका परिचय कर्नल साहब से कराया और मैंने उनसे कहा कि आपके भोजन की व्यवस्था अलग से इनकी तरफ से होगी और ये काम शिवपालजी ने इतनी कौशलपूर्ण ढंग से किया कि सांप भी मर गया और लाठी भी नहीं टूटी।

कैंप के समापन के बाद मैंने उनसे कहा कि आपकी विनम्रता, अनुशासनप्रियता और आज्ञाकारिता इस बात का संकेत है कि आप जीवन में बहुत सफलता प्राप्त करेंगे और मैंने उर्दू की उनको वह कहावत सुनाई ” बा अदब -बा नसीब ” !

 

 

 

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