हिंदी दूत भारत पुत्र शिवपाल

न्यूज़ कैप्चर्ड उत्तर प्रदेश के कुछ महत्वपूर्ण महत्वपूर्ण शख्सियतों के व्यक्तित्व पर एक सीरीज प्रस्तुत कर रहा है। इसी कड़ी में हम आने वाले कुछ दिनों में शिवपाल यादव के व्यक्तित्व से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर आज के दौर के सशक्त हस्ताक्षरों के विचार प्रस्तुत करेंगे। संपादक

विद्या कौलेश्वर
सचिव , भारत -मारीशस सोशलिस्ट काउन्सिल
हम लोग मारीशस में भले रहते हैं, लेकिन हमारी आत्मा हिंदुस्तान में रहती है। हमें हमारी राष्ट्र भाषा क्रियोली जितनी प्यारी है , उतना ही लगाव हिंदी से है। वैसे तो हम लोग भारत के नेताओं की काफी इज्जत करते हैं लेकिन हिंदी के सवाल पर उनकी चुप्पी अच्छी नहीं लगती। उस दिन मन गदगद हो गया जब अखबार में पढ़ा कि समाजवादी नेता शिवपाल सिंह यादव ने संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव वान की मून को पत्र लिखकर हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा का दर्जा देने की मांग की।
बदलते वैश्विक परिदृश्य में हिंदी को आधिकारिक भाषा का दर्जा मिलना चाहिए, वरना ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में हम हिंदी भाषी चाहे अमेरिका में रह रहे हों, मारीशस में हों, या भारत में, हमारी टीस यह है कि क्या हम  फ्रेंच, रसियन, मंदारिन,अरबी, स्पेनिश व अंग्रेजी बोलने वालों के समकक्ष नहीं पहुंच पाएंगे। हिंदी के प्रति अभी भी विश्व संस्था की सोच उपनिवेशवादी है। जब संयुक्त राष्ट्र संघ के मात्र 51 देश सदस्य थे तब भी यूएनओ की आधिकारिक भाषा का दर्जा साधारण सभा की धारा -51 व सुरक्षा परिषद कार्रवाही अधिनियम की धारा-41 के तहत 6 भाषाओँ को ही थी, आज सदस्य देशों की संख्या 193 है, फिर भी 6 भाषाओँ का प्रभुत्व बना हुआ है। हिंदी दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी भाषा है , फिर भी वंचित है, यह लोकतंत्र का मजाक है। लोहिया जी ने भाषाई विभेद को 60 के दशक में अपनी विश्व -यात्रा के दौरान उठाया था, अटल जी जब विश्व -मंच से हिंदी में बोले तो हमें उम्मीद जगी थी लेकिन उन्होंने कुछ खास नहीं किया। इतने बड़े सवाल पर हिंदी बेल्ट के नेताओं को बोलना चाहिए पर शिवपाल जी के अलावा अभी तक किसी ने नहीं बोला।

भोपाल में विश्व हिंदी सम्मलेन के उद्घाटन भाषण पर प्रधानमंत्री मोदी जी की ओर हमारी निगाहें लगी थी, किन्तु वे भी कुछ सार्थक बोलने की बजाय इधर -उधर घूमते व घुमाते रहे। सार्थक काम यथाशक्ति यथासंभव शिवपाल जी ने ही किया। मारीशस के विद्वान प्रहलाद रामशरण का स्वागत उन्होंने उत्तर प्रदेश में किया। जब मारिशस में चुनाव हो रहे थे, एक तरफ तत्कालीन प्रधानमंत्री नवीन रामगुलाम थे, दूसरी तरफ मारीशस सोशलिस्ट मिलिटेंट के नेता सर अनिरुद्ध जगन्नाथ। यह लड़ाई पूंजीवाद बनाम समाजवाद की थी। शिवपाल जी ने सर अनिरुद्ध जगन्नाथ को समर्थन दिया। उन्होंने फोन से समाजवादी ताकतों को मजबूत करने की अपील की। चुनाव परिणाम समाजवादियों के पक्ष में रहा और मारीशस में मारीशस सोशलिस्ट मिलिटेंट की सरकार बनी। मारीशस भारत का छोटा भाई है। भारत के बाहर दूसरा भारत है। भारत को सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता का मारीशस ने हमेशा समर्थन किया है। जब हमारे राष्ट्रपति पुरयाग लखनऊ गए तो शिवपाल जी ने उन्हें भारतीयों की तरफ से धन्यवाद-पत्र दिया। हम शिवपाल जी को कर्मयोगी मानते हैं , इसलिए जब इन्डो मारीशस सोशलिस्ट काउंसिल बनने की बात आई , मैंने अध्यक्षता के लिए शिवपाल जी के नाम का प्रस्ताव किया, सभी ने उनके नाम पर सहमति व्यक्त की। वे मारीशस व भारत विशेषकर उत्तर प्रदेश के आत्मीय रिश्ते की मजबूत डोर हैं।

 

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