गो अपने हज़ार नाम रख लूँ, पर अपने सिवा मैं और क्या हूँ !

न्यूज़ कैप्चर्ड उत्तर प्रदेश के कुछ महत्वपूर्ण शख्सियतों के व्यक्तित्व पर एक सीरीज प्रस्तुत कर रहा है। इसी कड़ी में हम आने वाले कुछ दिनों में शिवपाल यादव के व्यक्तित्व से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर बात करेंगे।  संपादक 

रुपेश पाठक, युवा पत्रकार 

जौन एलिया साहब की पंक्तियां हैं : सब मेरे बग़ैर मुतमइन हैं /मैं सब के बग़ैर जी रहा हूँ/क्या है जो बदल गई है दुनिया/मैं भी तो बहुत बदल गया हूँ/गो अपने हज़ार नाम रख लूँ/पर अपने सिवा मैं और क्या हूँ….
ये पंक्तियां एक शख्सियत के तौर पर शिवपाल यादव जी पर सटीक बैठती है। वे भारतीय राजनीति के औघड़ राजनेता हैं, जो विशुद्ध वर्तमान में जीता है, किसी पीर या दरवेश की तरह, जो यह मानता है कि बिना उम्मीद के हमारा कोई भविष्य नहीं, जब भी कोई मन में उम्मीदें संजो उनके पास पहुंचा, और उन्हें लगा की वाकई मदद की जानी चाहिए तो उन्होंने अपने हदों और सरहदों से भी बाहर जाकर उसकी मदद की। अगर उन्हें यह समझ में आ गया कि यह काम संगठन और देश-समाज के हित में है तो उन्होंने किसी की परवाह नहीं की, लोगों के कहने, सुनने कीभी नहीं।
तमाम नाटकीय घटनाओं के बाद आज सबसे दुखद है शिवपाल को महत्वाकांक्षी बताया जाना, उनकी महत्वाकांक्षाएं तो थीं, लेकिन उससे उनका हित कहीं नहीं जुड़ा था। वह संगठन को मजबूत और नेताजी को शिखर पर देखना चाहते थे। उनके करीबियों को पता है कि अखिलेश के लिए उनके मन में हमेशा वात्सल्य और स्नेह ही रहा है। शिवपाल को पद की चाहत कभी रही ही नहीं। अगर होती तो 1996 की बजाये 1980 में ही वह विधायक बन जाते। 1980 में नेताजी तीन−तीन जगह से चुनाव जीते थे, दो सीटें बाद में उन्होंने छोड़ दी थीं, इसके लिये वे दावेदारी कर सकते थे , लेकिन उन्होंने विधायक बनने की बजाये संगठन को प्राथमिकता दी। शिवपाल को करीब से जानने वाले भी यही कहते हैं कि भले ही वह मंत्री रहे हों लेकिन उन्हें संगठन और संघर्ष का रास्ता ही हमेशा रास आया। नेताजी की सभाओं में दरियां बिछाईं, बूथ स्तर पर काम किया। जब संगठन या नेताजी पर हमला हुआ तो वह उनके पीछे खड़े नजर आये। बलराम सिंह यादव, दर्शन सिंह यादव के सामने खड़े होकर गोलियों की बौछार झेली। इतना सब होने के बाद भी शिवपाल ने कभी अपने को संगठन से ऊपर नहीं समझा। वह निस्वार्थ संगठन की सेवा करते रहे। साइकिल पर सवार होकर दूर−दूर जनसभाओं में पहुंच जाया करते थे।
यह जनता से जुड़ाव का ही नतीजा था कि शिवपाल 1996 में तेरहवीं विधानसभा के लिये हुए चुनाव में वह पहली बार जसवन्तनगर से विधानसभा का चुनाव लड़े और ऐतिहासिक मतों से जीत भी हासिल की। इसी वर्ष वे समाजवादी पार्टी के प्रदेश महासचिव बनाये गये। सांगठनिक क्षमता इतनी कि पार्टी को मजबूत बनाने के लिए शिवपाल ने पूरे उत्तर प्रदेश को कदमों से नाप दिया। समय के साथ उनकी लोकप्रियता और स्वीकार्यता बढ़ती चली गयी। तत्कालीन समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष रामशरण दास के अस्वस्थ होने के चलते 01 नवम्बर, 2007 को मेरठ अधिवेशन में शिवपाल को कार्यवाहक प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया और बाद में रामशरण दास की मृत्यु के बाद 6 जनवरी, 2009 को वे पूर्णकालिक प्रदेश अध्यक्ष बन गये। इसी दौरान मई 2009 में उन्हें विधानसभा में नेता विरोधी दल की भूमिका भी मिल गई। उस समय बसपा की सरकार थी। 

ऐसे कठिन समय में नेता विपक्ष की जिम्मेदारी संभालना किसी के लिये आसान नहीं था, लेकिन शिवपाल ने इस दायित्व को संभाला और बखूबी निभाया भी। वह विपक्ष तथा आम जनता से जुड़े मुद्दे सदन से लेकर सड़क तक पर उठाते रहे। इसी दौरान पार्टी से निकाले गये नेता आजम खान की वापसी हो गई तो नेता प्रतिपक्ष पद से इस्तीफा देने में शिवपाल ने एक पल का भी विलम्ब नहीं किया, जो दर्शाता है कि उन्हें पद से अधिक सिद्धान्त और पार्टी हित की चिंता रहती थी।
यह अतीत की बातें हैं तो सच्चाई यह भी है कि मौजूदा विधान सभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को संभवतः इतनी करारी हार का सामना नहीं करना पड़ता, यदि परिवार एकजुट होता।

 

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