26/11 हमले के नौ साल, दिल दहला देने वाला मंजर, जानें कब कैसे क्या हुआ ?

Nine years of 26/11 attack
Nine years of 26/11 attack

26 नवंबर 2008..भारतीय इतिहास का वो काला दिन जब लश्करे-तएबा के 10 आतंकवादी मुंबई के ताज होटल में घुस गए और चार दिनों तक वहां कब्जा जमाए रखा। मुंबई आतंकी हमले में करीब 237 लोगों मारे गए जबकि 300 लोग घायल हो गए थे। देश के इतिहास में 26/11 मुंबई हमला सबसे भयावह आतंकी हमला था जिसने सभी की रूह को कंपा दिया था।

आतंकवादी कैसे पहुंचे भारत ?

Nine years of 26/11 attack
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26 नवबंर 2008 की रात पाकिस्तान के आतंकी संगठन लश्कर-ए-तएबा के 10 आतंकवादी कोलाबा के समुद्री तट से एक नाव के जरिए भारत में घुसे। पूरी तरह हथियारों से लैस और वेशभूषा ऐसी कि कोई पहचान नहीं पाए। रिपोर्ट्स के मुताबिक, लोकल मराठी बोलने वाले मछुआरे ने जब उन आतंकवादियों से पूछा कि वो कौन हैं तो उन्होंने उससे अपने काम से काम रखने को कहा और फिर वो 10 आतंकी अलग-अलग दिशाओं में बढ़ गए। ये सभी आतंकवादी दो-दो के ग्रुप में बंट गए और अपनी-अपनी दिशा पकड़ ली। इनमें से दो आतंकियों इमरान बाबर और अबू उमर ने दक्षिणी मुंबई के कोलाबा में स्थित लियोपोल्ड कैफे को निशाना बनाया, दो आतंकियों ने नरीमन हाउस, तो वहीं बाकी आतंकी दो-दो की टोली में छत्रपति शिवाजी टरमिनस, होटल ट्राइडेंट ओबरॉय और ताज होटल की तरफ बढ़ गए। इसके बाद सभी आतंकियों ने अपनी अपनी गतिविधियों को अंजाम देना शुरू किया। आतंकियों ने अपनी-अपनी लोकेशन पर घुसते ही फायरिंग और धमाके करने शुरू कर दिए। इस्माइल खान और अजमल कसाब नाम के दो आतंकवादियों ने सीएसटी यानि छत्रपति शिवाजी टरमिनस को निशाना बनाया। 9:30 बजे के आसपास ये दोनो आतंकवादी पैसेंजर हॉल से अंदर घुसे और अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। इस हमले में 58 लोग मारे गए जबकि 104 घायल हो गए। एक रेलवे अनाउंसर ने घोषणा कर वहां से लोगों को निकलने के लिए कहा जिसके चलते कई लोगों की जान बचाई जा सकी। इस फायरिंग में आतंकियों ने 8 पुलिस अफसरों को मार गिराया। करीब 22:45 तक यह फायरिंग चली जिसके बाद दोनो आतंकी कामा अस्पताल की तरफ बढ़े। मकसद था मरीजों और अस्पताल के स्टाफ को मारना, लेकिन मरीजों के वार्डों को पहले ही लॉक कर दिया गया।

सेना के कमांडो शहीद-

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इनसे निपटने के लिए केंद्र की ओर से 200 एनएसजी कमांडो भेजे गए, सेना के भी 50 कमांडो इस ऑपरेशन में शामिल थे। इसके अलावा सेना की पांच टुकड़ियों को भी वहां भेजा गया। छत्रपति शिवाजी टरमिनस पर मुंबई एंटी टेरेरिस्ट स्केव्ड के हेमंत करकरे, विजय सालस्कर और अशोक काम्टे ने कमान संभाल ली और दोनो आतंकी अजमल कसाब और इस्माइल खान की तलाश में निकल पड़े। दोनो आतंकियों ने एंटी टेरेरिस्ट स्केव्ड की टीम को देख फायरिंग शुरू कर दी। दोनो तरफ से जोरदार फायरिंग हुई जिसमें हेमंत करकरे, विजय सालस्कर और अशोक काम्टे शहीद हो गए।

अजमल कसाब को जिंदा पकड़ा-

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ताज होटल में करीब 6 बम धमाके किए गए – इनमें से एक लॉबी में, दो एलिवेटर्स पर, तीन रेस्टोरेंट में और एक ओबरॉय ट्राइडेंट में। पहली ही रात अग्निशमन के अधिकारियों ने करीब 200 बंदी लोगों को वहां से निकाला। होटल ओबरॉय के ऑपरेशन को ही खत्म करने में तीन दिन लग गए। यह 28 नवंबर की दोपहर को समाप्त हुआ और उसी दिन शाम तक नरीमन हाउस को भी खाली करा दिया गया, लेकिन ताज होटल में चली मुठभेड़ 29 नवंबर की सुबह समाप्त हुई। इसमें 9 आतंकवादियों को मार गिराया गया जबकि अजमल कसाब नाम के एक आतंकी को जिंदा पकड़ लिया गया।

रवीना ने खोया अपना पिता-

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इन नौ सालों में कई परिवार हैं जिन्हें इंसाफ का इंतजार है। मुंबई हमलों में अपने पिता रमेश बांभनिया को खो चुकीं रवीना बांभनिया अब बड़ी हो गई हैं। 2008 में रवीना सात साल की थीं, जब उसके रिश्तेदार उसके पिता के अंतिम संस्कार में शामिल होने आए थे। रमेश सरकारी दस्तावेजों में आज भी मिसिंग पर्सन हैं। रमेश बांभनिया को 26 नवंबर 2008 को मछली पकड़ने वाली उसकी बोट के साथ ही आतंकियों ने अपहरण कर लिया था और बाद में उसे मार दिया था। गुजरात के उना ताल्लुका के सिमासी गांव में उस रात आतंकियों ने चार मछुआरों का अपहरण कर लिया था। जब मुबंई के तट पर कैप्ट‍न अमर सिंह सोलंकी की बॉडी मिली थी तब और सभी मछुआरों का कोई नामोनिशन नहीं मिला था। आधिकारिकतौर पर सरकार ने उन्हें मृत घोषित नहीं किया है।

शहीद पुलिस कर्मी तुकाराम ओंबले की बेटी वैशाली दर्द-

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आंसुओं से भरी आंखें लिए शहीद पुलिस कर्मी तुकाराम ओंबले की बड़ी बेटी वैशाली ने कहा, हमें महसूस होता है कि पापा किसी भी पल घर वापस आ जाएंगे। हालांकि दिल की गहराइयों से हम जानते हैं कि वह हमारे बीच कभी नहीं लौटेंगे। पर नौ साल बाद भी उनके लौटने इंतजार है। हमें हमेशा लगता है कि पापा ड्यूटी गए हैं और वह घर लौटेंगे। हमने घर पर उनका सारा सामान वहीं रखा हुआ है, जहां वह हुआ करता था। हमें उनके सर्वोच्च बलिदान पर गर्व है। तुकाराम मुंबई पर हमला करने वाले आतंकी अजमल कसाब को पकड़ते वक्त शहीद हो गए थे। पर उनकी बहादुरी से ही कसाब को पकड़ना संभव हुआ। कसाब मुंबई हमले का एकमात्र आतंकी था, जिसे पकड़ा गया और फांसी दी गई।

देश में सर्वाधिक आतंकी हमले राजधानी मुंबई ने ही देखे-

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देश में सर्वाधिक आतंकी हमले वास्तव में आर्थिक राजधानी मुंबई ने ही देखे हैं। इनकी शुरुआत बाबरी विद्ध्वंस के बाद 12 मार्च, 1993 को मंबई में हुए सिलसिलेवार विस्फोटों से हुई। फिर दो बार लोकल ट्रेनों को निशाना बनाया गया। कई बार बेस्ट की बसों को। तीन बार झवेरी बाजार जैसे भीड़भाड़ वाले बाजारों को। एक बार गेटवे ऑफ इंडिया को। इन सभी हमलों में भीड़भाड़ वाले स्थानों को निशाना बनाया गया था। ताकि अधिक से अधिक जनहानि करके दहशत फैलाई जा सके। इस दहशत ने लोगों को जागरूक भी किया है। लोकल ट्रेन में चलते हुए कोई लावारिस बैग दिखते ही अब लोग चैतन्य हो जाते हैं। या तो बैग के मालिक की खोज की जाती है, या पुलिस को सूचित किया जाता है।  किसी भी आतंकी घटना के समय आतंकियों से पहला सामना विशिष्ट सुरक्षाबलों के बजाय स्थानीय पुलिस का ही होता है। 26/11 के समय भी ऐसा ही हुआ था। मुंबई पुलिस के एक सहायक सब इंस्पेक्टर तुकाराम ओंबुले की हिम्मत के कारण ही एक पाकिस्तानी आतंकी अजमल कसाब को जिंदा पकड़ा जा सका था। इसलिए मुंबई पुलिस को और सुरक्षित करने के लिए हाल ही में 5000 बुलेट प्रूफ जैकेट एवं नाइट विजन दूरबीनों की व्यवस्था की गई है।

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