किस्से के इस हिस्से में सैफई कहां खड़ा है !

न्यूज़ कैप्चर्ड उत्तर प्रदेश के कुछ महत्वपूर्ण शख्सियतों के व्यक्तित्व पर एक सीरीज प्रस्तुत कर रहा है। इसी कड़ी में हम आने वाले कुछ दिनों में शिवपाल यादव के व्यक्तित्व से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर बात करेंगे।  संपादक 

असद , सैफई से लौटकर

साल 2017  के  नवंबर के किसी एक आम हल्की ठंढ वाली अलसाई सुबह में पूर्व लोकनिर्माण मंत्री शिवपाल यादव इटावा के अपने घर से लखनऊ के लिए निकले । किसी वजह से लखनऊ जल्दी पहुंचना था । ब्लैक कैट कमांडो जिप्सियों पर लटक रहे थे । गाड़ियां चालू थी । स्टाफ, समर्थक और कारिंदे तैयार खड़े थे। इसी बीच किसी स्थानीय बुजुर्ग किसान ने किसी दूर के गांव में किसी के ख़त्म होने की सुचना दी। शिवपाल काफिले के साथ बिना बोले निकले और बीच रास्ते में ड्राइवर को बोले फलां गांव चलो। साथ चल रहे काफिले में किसी के लिए यह अप्रत्याशित नहीं था । पीछे चल रही सभी गाड़ियां उनके पीछे हो लिए । चूंकी गांव के अंदर लंबी चौड़ी गाड़ियां घुस नहीं सकती थीं, इसलिए शिवपाल झट से उतरे और नालियों-गलियों को उलांघते, गमी वाले घर में पहुंच गए। ये शिवपाल जी की एक खास पहचान है ।

अब तक उनके व्यक्तित्व के तीन पहलू सामने आते रहें हैं,  एक नेता जी यानी मुलायम के साथी और सबसे विश्वसनीय सहयोगी की भूमिका में । दूसरा, शिवपाल जी की भूमिका सपा के राजनीतिक मैनेजर की भी रही है। मुलायम सिंह 2003 में मुख्यमंत्री बने थे, यह केवल तभी संभव हो सका जब शिवपाल थे। अगर शिवपाल का राजनीतिक प्रबंधन न होता तो विधायकों की संख्या पूरी नहीं होती और सरकार नहीं बनती । तीसरा, नेता विरोधी दल के रूप में, मायावती के पांच साल (2007-12) के शासन में अकेले शिवपाल सामना करते रहे । मुलायम और अन्य नेता दिल्ली में रहते थे ।

कहते हैं भविष्य नियंत्रित नहीं होता, निर्देशित नहीं होता , स्वतः घट जाता है । बीते एक साल में समाजवादी कुनबे, उसकी राजनीति और उसके भीतर के तासीर में भी बहुत कुछ घट गया है । इस पूरे डेवलपमेंट में एक सवाल यह है कि आज सैफई कहां खड़ा है । यह सच है कि इसी समाजवादी परिवार ने समाजवाद के सृजन पीठ सैफई को सैफई बना दिया।

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