एक और कविता-बस आगे बढते जाना है !

डा० कुमारी प्रियंका
अब ठान लिया ये जिंदगी,
न रूकना है, न झुकना है,
बस आगे बढते जाना है।
समय नहीं है , आज मेरे साथ
उसके हर कांटों पर पहरे हैं,
ख्वाब भी अधूरे हैं मेरे,
परिस्थितियों ने घेरे हैं।
डरने वाले को डराती रहीं हूं,
लड़ने वाले को लड़ाती रही हूं।
तेरी आंख मिचौली में कितनों ने सपने खोये,
बस तेरे जिद के आगे कितनों ने अपने खोये,
थक गई हूं डर -डर के,
घुट रही हूं मर-मर के।
अब कहां मेरा हौसला रुकेगा,
अब बता ये कहां झुकेगा।
अब दोनों चलते हैं,
अपनी रफ्तार पकड़ते हैं,
जीत गयी तो एहसासो में,
हार गयी तो ख्वाबों में,
अब ये वेदना सहना नहीं,
तेरे चुनौतियों के सामने झुकना नहीं,
अब आगे बढ़ते जाना है,
अब अागे बढते जाना है।

डा० कुमारी प्रियंका वीर कुंवर सिंह आरा विश्वविद्यालय से इतिहास में पीएचडी हैं !

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