शिवपाल की नजर में सियासत विज्ञान कम कला ज्यादा, उनके लिए भाव पक्ष है प्रधान !

न्यूज़ कैप्चर्ड उत्तर प्रदेश के कुछ महत्वपूर्ण महत्वपूर्ण शख्सियतों के व्यक्तित्व पर एक सीरीज प्रस्तुत कर रहा है। इसी कड़ी में हम आने वाले कुछ दिनों में शिवपाल यादव के व्यक्तित्व से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर आज के दौर के सशक्त हस्ताक्षरों के विचार प्रस्तुत करेंगे। संपादक

कोटमराजू विक्रम राव प्रख्यात विचारक, पत्रकार व लेखक हैं। राव ने समाजवादी विचारधारा के प्रचार -प्रसार और आपातकाल के दौरान प्रतिकार में महत्वपूर्ण और अनिवर्चनीय भूमिका निभायी है। वे जार्ज फर्नान्डीस के साथ बड़ौदा क्रांति में सहनायक के रूप में जाने जाते हैं।

उस शाम को अपने दिल्ली आवास में श्री मुलायम सिंह यादव काफी उद्विग्न दिखे। मैंने बिन मांगी सलाह दे दी, ”अपने अनुज जैसी आदतें डाल लीजिए । हमेशा मुस्कुराते रहिए ।” बस यही अदा है शिवपाल सिंह यादव की ।समचित्तता दुखसुखे समेकृत्वा , जो उनके पूर्वज ने कुरुक्षेत्र में पार्थ को बताया था । बिंदास तरीका है उनका। मायावती राज में नेता विपक्ष रहे हों, बहुमत आने पर नेतृत्वकर्ता रहें हों, शिवपाल सिंह यादव के दिलों दिमाग में तनिक ज्वार भाटा नहीं आता। भाव प्रशांत रहता है क्योंकि सियासत उनकी नजर में विज्ञान कम कला ज्यादा है। इसका अर्थ यह है कि उनके लिए भावना पक्ष हमेशा प्रधान है , वे दिमाग की जगह दिल को तरजीह देते हैं। कला भी अपार संभावनाए लिए।
बात करीब दशक भर पहले की है। डगमगाती बसपा सरकार के लिए ”अब गई तब गिरी” वाला हाल था। समाजवादी पार्टी को सरकार बनाने में विधायकों की पर्याप्त संख्या की दरकार थी। पार्टी प्रमुख के कक्ष में दोनों भाइयों में चर्चा हो रही थी। मैं भी एक स्टोरी के सिलसिले में वहीँ था। मुलायम सिंह यादव में परिस्थितिजन्य अनिश्चितता गहरा रही थी। मगर शिवपाल आश्वस्तता से लबरेज थे। मानो केवल शपथ ग्रहण का मुहूर्त तय करना ही शेष हो। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्रियों का पतन व अभ्युदय मैं देख चुका हूं। शिवपाल सिंह यादव की ढृढ़ता पहले तो मात्र अतिरेक लगी। जैसे पानी में लकीर खींचना हो। पर मेरा आकलन गलत साबित हुआ। शिवपाल की ज्यामिति युक्तियुक्त निकली। उनके अग्रज तीसरी बार मुख्यमंत्री बने। छोटे भाई का विधायकी लेखा जोखा बारीक रहा, सही रहा।
राजनेताओं के विषय में अक्सर कड़वी बातें यथार्थ के रूप में पेश होती हैं। निकिता ख्रुश्चेव ने एक बार कहा था कि राजनेता भी वहां पुल निर्माण करने का वादा करता है जहां कोई नदी ही नहीं होती। इसी तरह राष्टपति जनरल चार्ल्स दगाल ने कहा था कि राजनेता जनता को दास मानता है, पर कहता उन्हें स्वामी है। खुद अपने बारे में दगाल ने कहा था कि जब जनता उनकी उक्तियों पर भरोसा करती है, तो उन्हें अचरज होता है, क्योंकि वे स्वयं अपनी बातों को सच नहीं मानते।
मगर शिवपाल इसके उलट थे। उन्हें अपना किया वादा भी याद रहता और इरादा भी रखते हैं। लोकसभा चुनाव हो या विधान सभा, या फिर आजमगढ़ लोकसभा सीट पर अपने भाई को जिताकर उन्होंने कई बार अपनी प्रबंध शैली का परिचय दिया। सामाजिक कार्यक्रम हो या राजनीतिक सभा , वे जरूर शिरकत करते हैं। वे कोई भी जन संपर्क का माध्यम चूकते नहीं। वे जनता के बीच बने रहते हैं। वे जानते हैं कि राजनीति कोई युद्ध जैसी नहीं होती जहां काल कवलित बस एक बार होना हो। राजनीति में गिरना, उठना, जीतना तो क्रमबद्ध होता है।
एक बात और, जब कभी भी उत्तर प्रदेश का आर्थिक इतिहास लिखा जाएगा तो शिवपाल सिंह यादव के राजस्व मंत्री की भूमिका को याद किया जाएगा। औपनिवेशिक तथा कांग्रेसी राज में जमीन संबंधी कानूनों द्वारा किसानों को सामंती शोषण का शिकार बनाया गया था। इसे समाजवादी राजस्व मंत्री ने नाकारा और सुधारा। कृषकों पर लगी नकेल टूटी है। हम पत्रकारों के लिए शिवपाल की प्रेस क्लब में की गई टिपण्णी बड़ी माकूल है , सोचने पर विवश करती है , ” पहले हम अखबार पड़ते थे , अब देखते हैं। ”
कभी समाजवादियों का नारा था कि धन और धरती बंटकर रहेगी। वह नारा साकार दिख रहा है। आखिर भारतीय इतिहास की सबसे बड़ी जंग पांच गावों की मांग को अस्वीकार करने पर ही हुई थी। क्योंकि एक ढीठ राजकुमार ने सुई की नोक भर जमीन देने से इंकार कर दिया था। आज राजस्व नीति सुधार कर शिवपाल सिंह यादव ने किसानों का हित सर्वोपरि रखा है । अब मजदूरों की लड़ाई भी इन समाजवादियों को लड़ना है क्योंकि मोदी राज में पूंजीशाह फिर ताककवर हो रहें हैं। मजदूरों को हल्ला बोलना होगा। जब पिछली सदी में सोशलिस्ट नेता अयांदे सत्ता में आए थे तो चिली के क्रन्तिकारी नेता अंतोनी वियरा गैल्लो ने कहा था , ”समाजवाद साइकिल पर ही आयेगा”।

 

 

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