संघ का मिशन मोदी

 

बद्री नारायण |

(EPW से साभार अनुदित)

अनुवाद- अभिनव श्रीवास्तव

“…संघ का राजनीतिक धड़ा भाजपा है और संघ ये दावा करता है कि वह कभी भी किसी राजनीतिक पार्टी के लिये काम नहीं करेगा हालांकि जबसे बतौर प्रधानमंत्री पद उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के नाम की घोषणा हुई है तबसे संघ ने नरेंद्र मोदी को चुनवाने और उन्हें प्रोजेक्ट करने की सभी संस्थागत गतिविधियों को अपने हाथ में ले लिया है. ऐसा तब है जब आरआरएस प्रमुख मोहन भागवत बंगलौर में साफ-साफ़ कह चुके हैं कि नरेंद्र मोदी को प्रोजेक्ट करना उनका एजेंडा नहीं है…”

लोकसभा के चुनाव प्रचार के दौरान गुजरात के मुख्यमंत्री और भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी का मीडिया में जबरदस्त छवि निर्माण किया गया है. औपचारिक तौर पर माना जा रहा है कि इस पूरे प्रचार के पीछे भाजपा है, जो मोदी के छवि निर्माण, मुद्दों और  भाजपा के एजेंडे को रेखांकित करने का काम कर रही है. ज्यादातर विश्लेषणों में मोदी के इस सफल प्रचार अभियान का श्रेय कार्पोरेट पब्लिक रिलेशन एजेंसियों और ऐसे नौजवान पिछलग्गू समर्थकों को दिया जा रहा है जो सूचना तकनीकों की मदद से प्रचार करने में बेहद दक्ष रहे हैं.

हालांकि पूरे प्रचार को एक परिप्रेक्ष्य और संरचना प्रदान करने में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की भूमिका पर कम बात हो सकी है. इस लेख में नरेंद्र मोदी के चुनाव प्रचार अभियान में आरएसएस की भूमिका को समझने की कोशिश की जायेगी. यह लेख उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में इन पंक्तियों के लेखक द्वारा किये गये दौरों के आधार पर जुटाई गयी प्राथमिक सामाग्री और अखबारों में प्रकाशित रिपोर्टों से मिली द्वितीयक सामाग्री के आधार पर तैयार किया गया है.

चाहे वे भारतीय अकादमिक हों या विदेशी, दोनों ने संघ पर बहुत कम अध्ययन किया है. अक्सर अध्ययनों में भीतरी सूचनायें और जानकारियां नहीं होती हैं. आरआरएस पर राजनीतिक एथनोग्राफ़ी भी बेहद कम है. कुछ लोगों ने जो पहले आरआरएस में थे और जिन्होंने बाद में संगठन छोड़ दिया, संगठन के बारे में लिखा है, लेकिन उनमें भी संगठन के कामकाज के एथनोग्राफिक और राजनीतिक विवरणों के बजाय आलोचनात्मक राय देने की प्रवृत्ति बहुत मजबूत होती है.

साल 1925 में अपनी स्थापना के बाद से लेकर आज तक संघ की भूमिका एक जैसी रहने के बजाय लगातार बदल रही है. फिर चाहे वह हिन्दू-मुस्लिम दंगों में संगठन की भूमिका की बात हो या फिर आपदा प्रबंधन में या फिर भाजपा के साथ इसके सम्बन्ध की बात हो- ये सभी चर्चा के जाने-पहचाने मुद्दे रहे हैं. संघ की आपातकाल के दौरान कांग्रेस पार्टी के खिलाफ अफवाहों को पैदा करना और फिर उन्हें फैलाने की क्षमता पर भी चर्चा होती रही है.

संघ का राजनीतिक धड़ा भाजपा है और संघ ये दावा करता है कि वह कभी भी किसी राजनीतिक पार्टी के लिये काम नहीं करेगा हालांकि जबसे बतौर प्रधानमंत्री पद उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के नाम की घोषणा हुई है तबसे संघ ने नरेंद्र मोदी को चुनवाने और उन्हें प्रोजेक्ट करने की सभी संस्थागत गतिविधियों को अपने हाथ में ले लिया है. ऐसा तब है जब आरआरएस प्रमुख मोहन भागवत बंगलौर में साफ-साफ़ कह चुके हैं कि नरेंद्र मोदी को प्रोजेक्ट करना उनका एजेंडा नहीं है. भागवत के अनुसार-“संघ का एजेंडा लोगों के सामने बड़े मुद्दे लाना है. चूंकि संघ कोई राजनीतिक पार्टी नहीं है, इसलिए उसकी अपनी सीमायें हैं.”

संघ द्वारा चुनाव प्रचार

अपने सर संघ संचालक की इन बातों को दरकिनार करते हुये, चुनाव के अंतिम चरण में संघ ने -उन जगहों पर जहां चुनाव होना अब भी बाकी है- अपना पूरा ध्यान नरेंद्र मोदी की छवि को मजबूत करने में लगाया हुआ है. हालांकि मोदी के विज्ञापनों और प्रचार को उस आक्रामक अभियान ने भी तेजी प्रदान की है जो मीडिया में स्पष्ट रूप से दिखायी पड़ रहा है और जिसकी पहुंच मुख्यतः शहरी जनसंख्या तक है, लेकिन उत्तर प्रदेश में जमीनी स्तर पर इसकी देख-रेख संघ के हाथ में है.

विभिन्न अखबारों में प्रकाशित रिपोर्टें संकेत करती हैं कि लगभग एक लाख संघ नेता और पूरे देश की 42,000 इकाइयों से छह लाख स्वयंसेवक भाजपा की जीत को सुनिश्चित करने के प्रयास में लगे हुए हैं. संघ के उच्च स्तरीय नेताओं की एक टीम ने वाराणसी में कंट्रोल रूम की स्थापना की हुयी है जहां से वे पार्टी कार्यकर्ताओं पर हर वक्त नजर बनाये रखते हैं. इस टीम का नेतृत्व नरेंद्र मोदी के दाहिने हाथ कहे जाने वाले अमित शाह के हाथ में है और संघ के एक और शीर्ष नेता अनिल बंसल उनकी मदद कर रहे हैं.

संघ द्वारा प्रचार के लिये अपनाये गये तरीकों में से एक दूर-दराज के इलाकों में ‘नमोरथ’ वाली गाड़ियों के साथ पहुंचना भी है. रिपोर्टों के अनुसार ऐसी चार सौ गाड़ियां इकट्ठी की गयी हैं और उनको उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और हिमांचल प्रदेश के अधिकांश गावों में इस्तेमाल किया गया है (या ऐसा करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है). इन गाड़ियों में नरेंद्र मोदी के बड़े-बड़े चित्र लगाये गये हैं, ऊंची आवाज और छोटी-छोटी धुनों के साथ उनका प्रचार किया जा रहा है. ये गाड़ियां चौराहों और चौपालों पर रुकती हैं और फिल्में दिखाकर भीड़ का मनोरंजन भी करती हैं. संघ के कई स्वयंसेवक बहुत से गांवों में जा रहे हैं और घर-घर जाकर बहुत आक्रामक प्रचार में जुटे हुए हैं. संघ के भीतरी सूत्र बताते हैं कि संघ के स्वयंसेवकों और कार्यकर्ताओं को वीडियो कैमरे भी दिए गए हैं ताकि संदेह के दायरे में आने वाले भाजपा के कार्यकर्ताओं और नेताओं की (पार्टी विरोधी) गतिविधियों को रिकार्ड किया जा सके.

प्रतिक्रियायें जुटाने वाली एजेंसी के रूप में संघ

संघ 2014  के चुनाव से पहले से ही नरेंद्र मोदी की रैलियों में बोले जाने वाले भाषणों के प्रभाव के बारे में जानकारी जुटाने में लगा हुआ था. साल 2013 के नवम्बर महीने में मैं भाजपा द्वारा आयोजित की गयी रैली का अध्ययन करने अपनी एक टीम के साथ बहराइच गया. इस रैली में नरेंद्र मोदी को संबोधित करना था. जैसे ही रैली खत्म हुयी हमने देखा कि करीब 50 लोगों का एक समूह रैली में आये हुए लोगो से नरेंद्र मोदी के भाषण के बारे अपनी स्थानीय भाषा में सवाल कर रहा था. वे कुछ ऐसे सवाल पूछ रहे थे-“आपको मोदी का भाषण कैसे पसंद आया? मुस्लिम आतंकियों के बारे में मोदी ने जो कहा उसके बारे में आपका क्या सोचना है? मोदी ने इलाके के मुस्लिम माफियाओं को भी चुनौती दी है, इस बारे में आपका क्या सोचना है?” इन और इन जैसे बहुत से सवालों के जरिये वह मोदी के भाषणों पर अलग-अलग लोगों से और अलग-अलग तरीके से सवाल कर प्रतिक्रिया ले रहे थे. इनमें से कुछ के हाथ में आडियो टेप थे और कुछ मुंह ज़ुबानी ही सवाल कर रहे थे.

यह जाहिर था कि संघ का लक्ष्य रैली में आये लोगों से मोदी की  विकास की योजनाओं के बारे में उनकी राय जानने के अलावा  ‘मुस्लिम आतंकियों’ को चुनौती देने वाले आक्रामक भाषण के हिन्दुओं पर पड़ने वाले प्रभाव को समझना था. बाद में  ‘मुस्लिम आतंकियों’ शब्द को सामान्य रूप से केवल ‘मुस्लिम’ भी कहा गया. यह भाषण पटना रैली में हुए बम धमाके के कुछ दिन बाद ही दिया गया था.

हम ये निश्चित रूप से कह सकते थे कि लोगों से सूचनायें इकट्ठे कर रहे इन स्वयंसेवियों का संघ से कुछ लेना-देना है क्योंकि ये लोग बहराइच में आरआरएस के आफिस गये थे. दिसंबर 2013 में वाराणसी में राजा तालाब में हुयी रैली के अनुभव भी ऐसे ही थे. यहां भी कुछ लोगों का एक सुनियोजित समूह रैली में पीछे रहे श्रोताओं से मोदी के भाषण के बारे में प्रतिक्रियाएं इकट्ठी कर रहा था. ये लोग भी बाद में संघ के आफिस चले गए. यहां मुख्य उद्देश्य आम लोगों से वाराणसी में गंगा की सफाई के मुद्दे पर मोदी के भाषण के बारे में, मोदी द्वारा कांग्रेस नेता राहुल गांधी की आलोचना के बारे में और मोदी द्वारा दिये गये ‘कांग्रेस मुक्त’ भारत के नारे में बारे में औपचारिक राय लेना था.

ये लोग उन आम लोगों से भी चाय के नुक्कड़ों पर बात करते हुये देखे गये जो रैली में नहीं आ सके थे. हमने एक स्थानीय संघ स्वयंसेवक से इन दोनों रैलियों में संघ स्वयंसेवकों की गतिविधियों के बारे में जानने की कोशिश की. नाम नहीं जाहिर किये जाने की शर्त पर इसने हमें बताया कि संघ के स्थानीय स्वयंसेवकों के समूह मोदी के भाषणों के असर की जानकारी लेने के लिए सूचनायें इकट्ठी कर रहे हैं. कुछ हिचकिचाने के बाद उसने हमें बताया कि इन सूचनाओं को संघ आफिस में रैलियों की समीक्षा के लिए होने वाली बैठकों में पेश किया जाता है. आम लोगों की प्रतिक्रियाओं से जो मुख्य मुद्दे उभरते हैं उन्हें बड़े और मुख्य शहरों की संघ शाखाओं में पेश किया जाता है. इसके बाद इन प्रतिक्रियाओं को शीर्ष नेतृत्व तक पहुंचाया जाता है. अगर हम इस स्वयंसेवक की बात पर भरोसा कर लें तो यह जाहिर होता है कि इन शाखाओं के जरिये नरेंद्र मोदी की छवि को नया आकार देकर फैलाव प्रदान किया जाता है.

इसके अलावा मोदी के भविष्य के भाषणों के लिये इनसाइट्स भी इकट्ठे किये जाते हैं. यहीं से भाजपा की गोलबंदी की नीतियों की भी योजना बनायी जाती है. साल 2014 के चुनाव में नरेंद्र मोदी के भाषणों को भाजपा के पक्ष में होने वाली गोलबंदी का सबसे प्रभावी तरीका माना जा रहा है, यही वजह है कि मोदी की रैलियों के आयोजन को इतनी ज्यादा अहमियत दी गयी है. इस तरह संघ न सिर्फ आम लोगों तक हिंदुत्व की विचारधारा को फैला रहा है, बल्कि स्थानीय लोगों से उनकी प्रतिक्रिया भी ले रहा है. प्रतिक्रियाओं से सम्बंधित ये जानकारियां सबसे पहले संघ को दी जाती हैं और उसके बाद भाजपा को. इस तरह पार्टी की इस चुनाव की रणनीति तैयार होती है.

संघ और बूथ प्रबंधन

संघ की एक और अहम गतिविधि पोलिंग बूथ प्रबंधन है और भाजपा और संघ दोनों ने ही विभिन्न गांवों और छोटे शहरों में बेहद जमीनी स्तर पर बूथ प्रबंधन समितियां बना रखी हैं. जहां भाजपा ने प्रत्येक बूथ के लिये 25 सदस्यीय समिति बनायी है जिसका काम बूथ के मतदाताओं से बातचीत करना है तो वहीं संघ ने भी प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में समान्तर बूथ समितियां बना रखी हैं. संघ की समितियों में स्थान और स्थितियों के अनुसार 10-12 बेहद ताकतवर स्वयंसेवक हैं.

उदाहरण के लिये अगर कोई जगह दलितों और पिछड़ी जातियों के वर्चस्व वाली है तो समिति के सदस्य इन्हीं समुदायों से चुने जाते हैं. महिलाओं तक पहुंच बनाने के लिये, संघ ने महिला नेताओं और भाजपा के समर्थकों को प्रशिक्षित किया है और इनसे संघ लगातार संपर्क में है. समिति के सदस्य अपने निर्वाचन इलाके के प्रत्येक परिवार की सोच और मिजाज को पहचानते हैं, हर दिन समिति सदस्य कुछ परिवार वालों से मिलते हैं और उनकी सोच को नापने-तोलने की कोशिश करते हैं.

अगर कोई परिवार मोदी के व्यक्तित्व या उनकी राजनीति से असंतुष्ट नजर आता है, तो वे उसे बेहद आराम से मोदी के शासन और उनके नेतृत्व के सकारात्मक पक्षों के बारे में बताकर भरोसे में लेने की कोशिश करते हैं. समिति के सदस्यों पर सबसे बड़ी जिम्मेदारी चुनाव के दिन पोलिंग बूथों पर उन लोगों को लाने की डाली गयी हैं जिन तक समिति ने अपनी पहुंच बना ली है. संघ की आयोजन टीम, जो नरेंद्र मोदी के चुनाव अभियान की बेहद गौर से निगरानी कर रही है, ने बेहद सख्त रुख अपनाया है- जो स्वयंसेवक पोलिंग बूथ के आस-पास के चिन्हित परिवारों में नहीं पहुंचते हैं, समिति के सदस्यों द्वारा उनकी जवाबदेही तय की जाती है.

संघ के अलावा, उत्तर प्रदेश के शहरो और जिलों में पेशेवर दक्षताओं वाली एक टीम भी फ़ैली हुयी है. इस टीम का मिशन प्रत्येक जिले में मोदी के प्रचार में काम कर रही स्थानीय टीमों पर नजर रखना है और इसकी रिपोर्ट सीधे अमित शाह को देना है. इस टीम की ट्रेडमार्क ड्रेस नीला कुरता और नीली जींस है इसलिये टीम को ब्लू ब्रिगेड भी कहा जा रहा है. इस टीम के सदस्य एक संस्थान- सिटीजन आफ एकाउंटेबल गवर्नेंस का हिस्सा हैं और इनमें से अधिकांश भारत और ब्रिटेन के प्रतिष्ठित संस्थानों और विश्वविद्यालयों के पेशेवर पाठ्यक्रमों के स्नातक हैं.

तकनीकी तरीकों के इस्तेमाल के बारे में जानकारी रखने वाले ये पेशेवर ही ‘चाय पे चर्चा’ और मोदी की ‘थ्री डी रैलियों’ जैसे अभियानों के विभिन्न पहलुओं को अपनी दिमाग दक्षता से मजबूती प्रदान कर रहे हैं. यह टीम दो सदस्यों की इकाइयों में बांटी गयी है, जिसको प्रत्येक को एक लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र में भेजा गया है. इन टीमों को स्थानीय टीमों की गतिविधियों को जज करने का काम दिया गया है, साथ ही जहां पर स्थानीय टीमें ज्यादा दक्ष नहीं हैं, वहां पर इन तकनीकी टीमों के सदस्य स्वयं ही प्रचार टीमें बना लेते हैं.

तकनीकी टीम के सदस्य नियमित रूप से मोदी टीम की केंद्रीय इकाई को अपनी गतिविधियों के बारे में सूचित करती रहती है. भाजपा नेताओं के अनुसार एक तकनीकी टीम कई चुनाव अभियानों की देख-रेख कर रही है. यह टीम जिला और शहर कमेटियों से अलग रहकर स्वतंत्र रूप से काम करती है, लेकिन भाजपा के सभी उम्मीदवारों के संपर्क में रहती है. उत्तर प्रदेश के निर्वाचन क्षेत्रों में फैले हुये सभी टीम सदस्यों के पास बूथ प्रबंधन कमेटियों के अधिकारियों के नाम और टेलीफोन नंबर हैं. टीम ने सभी निर्वाचन क्षेत्रों में दस कार्यकर्ताओं वाले समूह तैयार करने को भी कहा है जो भाजपा के प्रति प्रचार के लिये पूरी तरह प्रतिबद्ध हों.

इन कार्यकर्ताओं को वर्तमान बूथ समितियों का सदस्य भी बनाया गया है और ऐसी रिपोर्ट आयी है कि तकनीकी टीम ने दो दर्जन बूथ समितियों को बदल दिया है. संघ और भाजपा की बूथ समितियों के समान्तर उन्होंने प्रभावी रूप से अपनी खुद की समितियां बना ली हैं. यह तकनीकी समिति स्थानीय उम्मीदवार की जरुरत को देखती है और अपनी राय केंद्रीय टीम को भेज देती है जो स्थानीय भाजपा प्रत्याशी को आवश्यक समर्थन देता है. यह टीम संघ के साथ तालमेल बैठाकर काम करती है और चुनावी गोलबंदी की रणनीति बनाने के लिये सूचनाओं और विचारों का आदान-प्रदान भी करती है.

साल 2014 चुनाव के अंतिम चरण में संघ परिवार की कई शाखायें, खुद संघ, भाजपा कैडर और तकनीकी क्षमताओं से लैस कार्यकर्ता, ‘दि ब्लू ब्रिगेड’ नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व को केंद्र में रखकर बुने हुए प्रचार अभियान की सफलता के लिये दिन रात काम कर रही हैं.
समाजशास्त्री बद्री नारायण जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर बद्री नारायण हैं.

 

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