कितना भयानक होगा जब आप चुप होने को अभिशप्त होंगे !

अभिषेक प्रकाश |

राजा राम मोहन रॉय की एक कविता है जिसमे वह लिखते हैं कि–

‘जरा विचार कीजिये

वह दिन कितना भयानक होगा जब आपकी मृत्यु होगी।

दूसरे बोलेंगे और आप चुप होने को अभिशप्त होंगे।’

                               सोचिए उन्नीसवीं शताब्दी में बैठा एक व्यक्ति अभिव्यक्ति के महत्व की बात कर रहा है. और आज हम प्रश्न से ही डरने लगे हैं. जबकि लोकतंत्र सार्वजनिक बहसों और पारस्परिक तर्कों के सहारे ही वयस्क होता है. लेकिन प्रश्न पूछना हमारे समाज में गुनाह होता जा रहा है. कॉपरनिकस याद हैं न, उस समय राजतन्त्र था जब उसने यह बात उठायी थी कि पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगाती है. और इसके कारण उसे धर्मगुरुओं का भारी विरोध झेलना  पड़ा थी. लेकिन तर्क करने की यह परम्परा क़ैद नहीं की जा सकी।और मानव सभ्यता आज जहाँ तक पहुँची है उसके पीछे ऐसे तर्कशील लोगों द्वारा प्रश्न उठाने की इस  निर्भीक परम्परा का महत्वपूर्ण योगदान है.

आज जो भी प्रश्न उठाए जाते है निश्चित ही कोई न कोई व्यक्ति, समुदाय या व्यवस्था उससे आहत होता है . पर क्या हमें चुप रहना चाहिए या प्रश्न का जवाब देना चाहिए. बात लोकतंत्र की हो तो हम यह पाते है कि नागरिक इन प्रश्नों के बहाने राजनीतिक बहसों में शामिल होते हैं और इन बहसों से वह अपनी एक राय बनाते हैं. इस क्रम में उन्हें नई नई सूचनाएं मिलती हैं. जो हमारी प्राथमिकताओं को तय करती हैं. और हमारे निर्णयन में काफी सहयोगी होती है. बात भारत की हो तो यह वाद-विवाद की परम्परा काफ़ी प्राचीन रही है.

नेल्सन मंडेला ने अपनी आत्मकथा  ” लॉन्ग वॉक टू फ्रीडम” में लिखा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की यह शुरुआत मेरे घर से शुरू हुई. स्थानीय मीटिंग में मैं जाता था वहां चाहे कोई किसी भी तरह का काम करने वाला हो या किसी भी वर्ग का हो उसको अपनी बात रखने की स्वतंत्रता थी. स्वशासन की नींव में महत्वपूर्ण है कि सभी लोग अपने मतों को रख सके और नागरिक के रूप में उनकी वैल्यू समान हो.”  इसको हमनें देखा कि जब वह दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति बने तो उन्होंने श्वेत-अश्वेत दोनों को अपने साथ रखा. उनके प्रश्नों को उनकी चिंताओं को समझा और लोकतंत्र में उनकी सहभागिता को सुनिश्चित किया. वहीं हम आज देखते हैं कि बहुत सारे देशों ने अपने डेमोक्रेसी में सहभागिता को तवज़्ज़ो नहीं दिया जिसके परिणामस्वरूप उस देश को गृहयुद्ध से लेकर विभाजन तक का चक्र झेलना  पड़ा.

आज हमारे देश में जो प्रश्न उठ रहें है उसको लेकर कुछ लोग शंका के शिकार हैं. वह प्रश्नों को सरकार के पक्ष-विपक्ष के रूप में देखने लगे हैं. जबकि मेरा मानना है कि हमें प्रश्नों के पीछे के वाज़िब तर्क को ढूढ़ना चाहिए, न कि प्रश्नों को वर्ग,जाति, धर्म, लिंग, भाषा, क्षेत्रीयता की राजनीतिक नाकाबंदी के रूप में. कुछ उदाहरण लीजिए जैसे पिछले दिनों हमारे प्रधानमंत्री ने ट्रिपल तलाक का मुद्दा उठाया. लेकिन शरीयत के नाम पर मुस्लिम समाज का एक बड़ा वर्ग उसका विरोध करते नज़र आया. तब इस मुद्दे पर उठे बहसों ने, याद कीजिए ,किस तरह तमाम सूचनाओं ने हमारे ज्ञान को बढ़ाया और हमारी कई भ्रांतियों को दूर किया. हमें यह भी मालूम चला कि यह कई देशों में वैध नहीं है.

हिना सिद्धू ने ईरान में चल रहे शूटिंग प्रतियोगिता में हिज़ाब पहनने से मना किया और इस मुद्दे ने हमारा ध्यान खिंचा. इसका इस्तेमाल राजनीतिक प्रोपगैंडा रचने के लिए किया जा रहा है. हमने देखा कि ईरान में भी ऐसे सुधारवादी लोगों की कमी नहीं है जो अपने समाज की अज्ञानता  दूर करने का लगातार संघर्ष कर रहे हैं.

पिछले दिनों हजारीबाग में कुछ किसान मारे गए, छत्तीसगढ़ में भी कुछ लोग(कुछ के लिए आदिवासी तो कुछ लोगों के लिए नक्सली) मारे गए. दोनों जगहों पर पुलिस व् राजनीतिक व्यवस्था पर प्रश्न उठाया गया. इस पर भी  काफी ऐतराज किया गया. हालांकि एक अन्य उदहारण में सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में यह बयान दिया कि आदिवासियों के गांव को जलाने में पुलिस का हाथ था. नया बवाल सर्जिकल स्ट्राइक और मध्य प्रदेश में कैदियों के एनकाउंटर पर उठा.

इन प्रश्नों के परिप्रेक्ष्य में हम जब लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे गंभीर मुद्दों की पड़ताल करे तो हमें उस शंकालु वर्ग जो प्रश्नों को सरकार या व्यवस्था की आलोचना के रूप में देखते हैं या जो प्रश्नों को सपाट रूप में देखते हैं कि ओर से कुछ ऐसे प्रश्न सुनने को मिलते हैं–

क्या सेना व् पुलिस के लोगों का मानवाधिकार नहीं होता.

क्या केवल आतंकवादियों व् नक्सलियों के लिए ही मानवाधिकार हैं.

आतंकवादियों को  बैठा कर खिलाने की जरुरत क्या है. उन्हें  मार देने में क्या बुराई है.

अगर आपको राष्ट्र की चिंता है तो आपको इनलोगों के मरने पर इतना दुःख क्यों होता हैं.

ऐसे तमाम प्रश्न आज हमारे सामने तैर रहें हैं. आज प्रश्न न उठाना आपकी राष्ट्रभक्ति को प्रमाणित करती हैं. हां यह जरूर है कि ये प्रश्न भी एक प्रतिक्रिया की पैदाइश है. जिसकी जड़ों में तुष्टिकरण,छद्म पंथनिरपेक्षता, व् तथाकथित वामपंथी बुद्धिजीवियों का खोखलापन है. लेकिन क्या यह देश, यहाँ के लोग वाम-दक्षिणपंथी विचारधारा के गुलाम हैं. आज इन राजनीतिक दंगल के बीच हम कुछ संकल्पनाओं को छोड़ते जा रहे हैं.जो इस इंडियन रिपब्लिक के लिए प्राणवायु की तरह है. जैसे कि–

सर्वोच्च क्या है ‘संविधान’ कि सत्ता में पदासीन लोग?

क्या हम क़ानून के प्रति प्रतिबद्ध है और क्या विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया हमारे कार्य व्यवहार और समाज को गतिमान करनी चाहिए या कि धर्म, जाति ही निर्णायक होना चाहिए.

क्या इक्कीसवीं सदीं का भारत वैज्ञानिकता की नींव पर नहीं टिका होना चाहिए.

न्यायपालिका और सेना  को क्या पवित्रता के चश्मे से ही देखना चाहिए?

लोकतंत्र के लिए व्यक्तिवादी राजनीति क्या भयावह नहीं हैं?

इन प्रश्नों को हमें विश्लेषण करना होगा यदि हम चाहते है कि भारत एक महान राष्ट्र के रूप में उभरे तो हमें इन संदेह के बादलों को घनीभूत नहीं करना चाहिए. उसके समाधान की ओर बढ़ना चाहिए।हमें यह समझना होगा कि इन प्रश्नों से उन घटनाओं पर क्या असर पड़ा. उदाहरण के लिए आप कैदियों के एनकाउंटर को ही लीजिए अगर इस पर प्रश्न नहीं उठाए जाते तो हमको अपनी कमियां दिखाई ही ना देती. जेल का सीसीटीवी कैमरा ख़राब था और उतने कैदियों की निगरानी में केवल एक सिपाही था.और कि हमारे जेल से निकलने के लिए एक दातून और चादर की जरुरत पड़ती है!और भी बहुत कुछ जिसकी जानकारी आपको मिल चुकी होगी. आप इससे पहले भी देख चुके होंगे की लोग बीसियों साल बाद जेल से बेगुनाह साबित होकर निकलते हैं जब उनकी  ज़िन्दगी पूरी तरह तबाह हो चुकी होती है. क्या इन प्रश्नों से हमें यह नहीं मालूम होता कि हमारी क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम उतनी प्रभावकारी नहीं है जितनी होनी चाहिए. क्या हमारी इन्वेस्टीगेशन सिस्टम इतना सक्षम है जो मामलो का समय से निस्तारण कर सके. व्यवस्था के हर पाये में आपको दक्षता, कार्यकुशलता,पारदर्शिता का अभाव मिलेगा ,नौकरशाही में कई लूपहोल आपको दिखेगा.

अंत में एक बात और जिस सिपाही की जेल में  हत्या हुई क्या वह बच नहीं सकता था! शायद बच सकता था या बचाया जा सकता था अगर ऐसे प्रश्न पहले किए जाते! ऐसे तमाम लोग जो हमारे बीच है चाहे वह क़र्ज़ से पीड़ित किसान हो या बॉर्डर पर बैठा सैनिक या पुलिस का कोई जवान या आदिवासी या कि कोई मजदूर या कोई स्त्री या कोई भी जिसके साथ अन्याय हो रहा है अगर हम समय से अपनी आवाज़ बुलंद करते तो हम हर साल हज़ारों लोगों को बचा सकते हैं.आज वह सिपाही भी बच सकता था अगर पुलिस रिफार्म होता, वो तमाम लोग जो फ़र्ज़ी मामलों में जेलों में क़ैद है अगर न्याय प्रणाली में सुधार हुआ होता तो निर्दोष लोग बाहर होते और दोषी को सजा हो सकती थी. पर ऐसा नहीं है।क्योंकि हम आवाज़ उठाना नहीं चाहते. और कुछ ताकतें है जो यह नहीं चाहती की आपके लब आज़ाद हों. हम अपनी प्राचीन भारतीय परम्परा जो वाद- विवाद से समृद्ध है उसको भूलते जा रहे हैं. ऐसे में मुझे शेक्सपीयर का वह वाक्य याद आता है जिसमे वह कहतें है कि– ‘अगर आप उसे पराजित करना चाहते हैं तो आपको उसके यादाश्त को मिटा देना होगा, उसके भूत को नष्ट कर देना होगा, उसकी कहानियों को समाप्त कर देना होगा”.

तो हमें इस परम्परा को बचाना ही होगा क्योंकि पार्टनर यही पॉलिटिक्स है! रीयल राष्ट्रवादी पॉलिटिक्स.

अभिषेक प्रकाश , पूर्व में ऑल इंडिया रेडिओ में , वर्तमान में पुलिस उपाधीक्षक, उत्तर प्रदेश पुलिस

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