पूर्वोत्तर के रहस्य परत खोलता अद्भुत यात्रा वृत्तांत – ‘वह भी कोई देस है महराज’

कबाड़खाना  से साभार  |

‘वह भी कोई देस है महराज’ हिंदी के यात्रा-संस्मरणों में अपने ढंग का पहला और अद्भुत वृत्तांत है। सामाजिक-सांस्कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक मसलों पर लिखने वाले पत्रकार अनिल यादव का यह यात्रा-वृत्तांत पूर्वोत्तर की ज़मीनी हकीकत तो बयान करता ही है, वहाँ के जन-जीवन का आँखों देखा वह हाल बयान करता है जो दूरबीनी दृष्टि वाले पत्रकार और इतिहासकार की नज़र में नहीं आता. पेट्रोल-डीजल, गैस, कोयला, चाय देने वाले पूर्वोत्तर को हमारी सरकार बदले में वर्दीधारी फौजों की टुकडिय़ाँ भेजती रही हैं. पूर्वोत्तर केंद्रित इस यात्रा पुस्तक में वहाँ के जन-जीवन की असलियत बयान करने के साथ-साथ व्यवस्था की असलियत को उजागर करने में भी अनिल ने कोई कोताही नहीं बरती है. इस यात्रा में उन्होंने छ: महीने से ज़्यादा समय दिया और उस अनुभव को लिखने में लगभग दस वर्ष लगाए. जाहिर है कि भावोच्छ्वास का कोई झोल न हो और तथ्यजन्य त्रुटि भी न जाए इसका खयाल रखा गया है.

यात्रा की इस पुस्तक में अनिल के कथाकार की भाषा उनकी पत्रकार-दृष्टि को इस कदर ताकत देती है कि इसे उपन्यास की तरह भी पढ़ा जा सकता है. निश्चय ही बेहद पठनीय और हिंदी में पूर्वोत्तर केंद्रित अपने ढंग की इस पहली यात्रा पुस्तक को पाठकों का अपार स्नेह मिला है.

यात्रावृत्त का एक टुकड़ा आपके लिए प्रस्तुत है –

तिनसुकिया मेल
… उबड़ खाबड़ रास्ते पर चलते हुए हम लोग चालीस से ढाई सौ मीटर ऊंचाई पर आ गए थे. जूतों पर पतली लाल जोंकें लपलपाने लगीं. जल्दी ही मोजों के भीतर घुसने लगीं और उन्हें छुड़ाने के नमक की तलाश होने लगी जो किसी के पास नहीं था. बरपेटा का टिकेन्द्रजीत देर से अपना सिर खुजला रहा था. उसके सिर में एक मोटी जोंक थी जिसे मैने खींच कर निकाला.

गाइड के तौर पर साथ आए एक आदिवासी लड़के लाट गाम सिंगफो ने दांव से काटकर बेंत की हरी टहनी का मुकुट बनाया और पहन लिया. मुकुट मांगने वाले उसे घेरने लगे तो उसने सबके लिए मुकुट बनाए और एक लंबा फोटो सेशन चला. मुकुट पहनते ही दिमागों मे केमिकल लोचा घटित हुआ तो ‘ही हाई हुआ ची चाई चुंग’ की ध्वनियों में मसखरी करने लगे. वे एक हरी टहनी के सहारे आदिवासियों के अबूझ पिछड़े होने पर हंसने का बहाना पा गए थे. लड़कियों को छोड़ कर सबने उसके तेज धार वाले सिंगफो दाव को आजमा कर देखा.

दोपहर बाद धूप खिलने से जंगल रंगीन हो गया था. कहीं बांस तड़कने की आवाज सुनाई दी, जिसे सबने अपनी कल्पना में गुजरते देखा. शाम को अचानक आई बारिश ने तर कर दिया जिससे लौटते समय नदी नाव से पार करने की जरूरत नहीं पड़ी. रात में कई और पर्यावरण विशेषज्ञ आ जुटे जिन्होंने चिकन-भात खाते हुए मगरमच्छ, हार्नबिल और हाथियों पर अच्छी जानकारी दी. रात में जंगल के अनुभव सुनाने का सेशन चला. कोई बाइनाकुलर में हाथी देखकर डर गया था, किसी ने चालाकी से चुटकुले को अनुभव में बदल दिया था. अर्चना ने एक गाय के प्रसव के दौरान मरने और उसके अनाथ बछड़े से अपने लगाव का मार्मिक बयान किया. सौम्यदीप को अक्सर एक सपना आता था कि हाथी उसे घेर लेते हैं और एक वनदेवी आकर बचा लेती है. जंगल में ही रहने वाले लाट गाम सिंगफो, जो एक अस्पताल में वार्ड ब्वाय रहा था, का अनुभव विलक्षण था.

“…हाथ में दाव हो तो हम बाघ से अकेले लड़ सकता है लेकिन मुर्दे से बहुत डरता है. हमारा नौकरी छुड़ाने के लिए अस्पताल के लोगों ने एक षडयंत्र का रचना किया. एक मुर्दे को नई कमीज पहना कर एक दीवार के सहारे बिठा दिया. उसके हाथ में जलती सिगरेट फंसाया था, जेब में चिल्लर रखा था और कमर पर दाव भी टांग दिया था. दूर से दिखाकर हमको उसे बुलाने के लिए भेजा गया. नहीं सुना तो हम उसका कंधा पकड़ कर हिलाया फिर सरपट भाग खड़ा हुआ. अपना लाइफ में पहली बार एक दम गरम एक गिलास चाय एक सांस में पी गया.”

यह आत्माओं के जंगल में भटकने का पहला सच्चा किस्सा था.

रात बाबू की कहानी…

दिल्ली से हार्नबिल के एक हजार प्लास्टिक के चोंचों की पहली खेप आई थी जो नामदफा के आसपास के निशी आदिवासियों के गांवों में बांटे गए थे. यह लड़का एशियन एलीफैंट रिसर्च एंड कंजर्वेशन सेंटर, बंगलौर में प्रोजेक्ट अफसर भारत सुंदरम से एक सवाल पूछना चाहता था कि जंगल के पश्चिमी छोर पर बसे चकमा शरणार्थियों के गांवों में क्या प्लास्टिक के हाथी बांटे जाएंगे. चकमा हाथी खाते हैं जिनका शिकार वे जहरीले तीरों से करते हैं. हाथी गिराने में उन्हें आधा घंटा लगता है.

युवा भारत सुंदरम उन दिनों रसद और टेन्ट लादे कुलियों के साथ पूर्वोत्तर में हाथियों की लीद और पैरों के निशान का पीछा करते हुए उनकी गिनती कर रहा था. पूरे देश में हाथियों की गणना चल रही थी. पूर्वोत्तर खास जोन था जहां कई इलाकों में हाथियों के अस्तित्व को खतरा था, उनकी आवाजाही के कई पुराने करीडोर नष्ट हो चुके थे. लेकिन भारत की असल दिलचस्पी थी हार्नबिल में थी इसका कारण चिड़िया का वह व्यवहार था जिसकी उम्मीद आदमी से की जाती है. उसने नामदफा में एक गुलाबी सिर वाले हार्नबिल की फोटो खींची थी, यह प्रजाति अब तक देश में नहीं देखी गई थी. इसे नई खोज जैसी घटना माना जा रहा था.

हार्नबिल रंगबिरंगा, असाधारण बड़ी चोंच वाला खूबसूरत पक्षी है. मादा अंडे देती है तो चार महीने की मैटरनिटी लीव पर चली जाती है. बच्चे उड़ने लायक हो जाते हैं तब घोंसले से बाहर निकलती है. इस अवधि में नर घोंसले की रखवाली करता है और पत्नी-बच्चों के लिए भोजन जुटाता है. कुछ प्रजातियों में कोआपरेटिव सोसाइटी बन जाती है. कई पक्षी परिवार मिलकर अंडे सेती मादाओं की देखभाल करते हैं. हार्नबिल जोड़ा नहीं बदलते, वफादार प्रेमी माने जाते हैं.

रूप ही हार्नबिल का सबसे बड़ा दुश्मन है. उसके पंखों से नागा अपने मुकुट सजाते हैं. अरूणाचल की निशी समेत कई आदिवासी जातियां उसकी चोंच को मुकुट की तरह सिर पर लगाती हैं. मादा जब घोंसले में अंडे से रही होती है वे पेड़ पर घात लगाकर नर के भोजन लेकर लौटने की प्रतीक्षा करते हैं और उसका शिकार कर लेते हैं. धनीस के मांस और तेल का कामशक्तिवर्धक माना जाता है. नीम हकीमों, सड़क पर मजमा लगाकर इलाज करने वाले घुमंतू वैद्यों के पास भी ये चोंच होते हैं जो प्रेमविहीन अंधविश्वासियों को फांसने के लिए सबूत की तरह प्रयोग किए जाते हैं. लिहाजा इस पक्षी की संख्या तेजी से घट रही है उसे घने जंगलों में भी आसानी से देख पाना मुश्किल हो चुका है.

वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ फंड….और जंगलात महकमें के अफसरों ने काफी विचार के बाद यह तरकीब निकाली थी. निशी गांवों में बांटे गए ये चोंच दिल्ली की किसी फैक्ट्री में आर्डर देकर तैयार कराए गए थे. प्रति चोंच लागत पंद्रह रूपए आई थी लेकिन हार्नबिल से पैसा नहीं लिया जा सकता था इसलिए मुफ्त दिए जा रहे थे. अफसर और एनजीओ सोच रहे थे कि आदिवासी प्लास्टिक के इस खिलौने को अपने धार्मिक विश्वास में फिट कर लेंगे और मुकुट के लिए हार्नबिल का शिकार बंद हो जाएगा. कुछ संस्थाओं को एतराज था कि प्लास्टिक पर्यावरण के नुकसानदायक है इसलिए आदिवासियों को काठ की चोंच दी जानी चाहिए. बेहतर हो कि उन्हें काठ की चोंच गढ़ने की ट्रेनिंग भी दी जाए ताकि उन्हें रोजगार भी मिल सके.

आदिवासी गांवों में कुछ लोगों ने चोंचे लेकर रख लीं थीं लेकिन जिनके पास असली थीं वे उनका मजाक उड़ाने लगे. अब खतरा यह था कि आदिवासियों के झगड़े में जंगल में बचे खुचे हार्नबिल भी मारे जा सकते थे. इसीलिए लाट गाम सिंगफो यह सवाल भारत सुंदरम से पूछना चाहता था.

नामदफा के सुदूर दक्षिणी छोर देश का आखिरी गांव गांधी ग्राम है जहां बर्मा से आए लीसू (योबिन) शरणार्थियों को बसाया गया है. वहां जो चीनी और किरासिन तेल लेकर जाता है उसका स्वागत खास मेहमान की तरह किया जाता है. वे निकटतम साप्ताहिक हाट तक तीन दिन में जाते तीन दिन में लौटते हैं. इसके बदले में वे मछली देते हैं. …

***

तिनसुकिया से दुलियाजान के बीच सड़क इतनी खराब थी कि जीप से वह 24 किलोमीटर की रीढ़ के नट बोल्ट खोल देने वाली थी. चाय बागानों की हरियाली के बीच अचानक काकोजान आया फिर नौहलिया जहां से बीती 22 अक्तूबर को उल्फा ने हिन्दी भाषियों की हत्या का अभियान शुरू किया था. मटोक और मोरान आदिवासियों का यह इलाका उल्फा का गढ़ माना जाता है. उल्फा प्रमुख परेश बरूआ के मारे जाने की खबर जब भी आती है वह इसी इलाके के किसी गांव मे प्रकट होता है. खुफिया एजेंसिया कहती हैं कि परेश बरूआ के कई मटोक, मोरान क्लोन जिन्हें उल्फा के वसूली तंत्र को चालू हालत में बनाए रखने के लिए घुमाया जाता है. इस उग्रवादी नायक के मिथक में बदल जाने की कई कहानियां हैं. एक आदिवासी ने कहा, “जिस दिन परेश बरूआ नहीं रहेगा इस इलाके में एक हवा अलग से आएगा.”

नौहलिया कस्बे के बीच एक छोटी सी चहारदीवारी के भीतर एक सुरंग से लपटें उठ रही थीं. यही जलती हुई प्राकृतिक गैस देखने मैं आया था जिसे असम के प्राकृतिक संसाधनों की बर्बादी के उदाहरण के रूप में पेश किया जाता है. दुलियाजान के आयल फील्ड में ऐसे दस से अधिक स्पॉट थे जहां पचीसो साल से गैस धधक रही है. रात मे लपटों से लाल आसमान में गरजती गैस के धुंए के बादल दूर तक के गांवों के ऊपर लटके हुए थे. एक मोटे अनुमान के मुताबिक असम में प्रतिदिन 100 मिलियन क्यूबिक फीट गैस इस तरह बर्बाद होती है. उर्जा के पैमाने पर एक मिलियन क्यूबिक फीट गैस को 25 टन तेल (पेट्रोलियम) के बराबर माना जाता है. आयल इंडिया कारपोरेशन के अफसर प्रशांत बरकाकोती का कहना था, गैस जलाना जरूरी है वरना भूगर्भीय गड़बड़ी हो सकती है.

देश के कुल तेल उत्पादन का चौथाई हिस्सा असम के कुंओं से निकाला जाता है. उसके बदले केन्द्र से मिलने वाली बहुत कम रॉयल्टी यहां की राजनीति का पुराना मुद्दा है. दिल्ली यहां से चाय, तेल, कोयला ले जाती है बदले में सेना भेजती है- किसी भी दिल्ली विरोधी आंदोलन की यह स्थाई टेक होती है. दुलियाजान से कच्चा तेल बरौनी ले जाने वाली पाइप लाइन में छेद कर देने की धमकी रस्म बन चुकी है जिसे कस्बे के डिग्री कालेज के छात्रसंघ चुनाव में भी कालेज के प्रिंसिपल पर दबाव बनाने के काम लाया जाता है.

अनिल यादव -मिजाज से आवारगी और बेफिक्री के मालिक, पेशे से चर्चित कथाकार-पत्रकार !

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here