आतंकियों की भर्ती में ईंधन का काम कर सकता है जलवायु परिवर्तन

शुभम गुप्त पुरवार |
ब्रिटिश अखबार द गार्डियन में छपी खबर में जर्मनी के विदेश मंत्रालय द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट के हवाले से कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन आतंकवाद के कृत्यों को ईंधन देने का काम करेगा और बोको हराम और इस्लामिक स्टेट (आई.एस.) जैसे आतंकवादी संगठन इसी का फायदा उठाकर अधिक से अधिक लड़ाकों की भर्ती कर सकेंगे.
जर्मन सरकार द्वारा सहायता प्राप्त बर्लिन थिंकटैंक एडेल्फी की रिपोर्ट में बताया गया है कि बोको हराम और इस्लामिक स्टेट (आई.एस.) जैसे आतंकवादी संगठन जलवायु परिवर्तन के कारण उत्पन्न होने वाली प्राकृतिक आपदाओं (पानी और खाद्यान्न की कमी) का फायदा उठाएंगे. इससे आतंकवादी संगठन आसानी से अपने संगठन में लड़ाकों की भर्ती कर सकेंगे. साथ ही, वे अधिक आज़ादी से काम कर सकेंगे और आबादी के एक बड़े तबके पर नियंत्रण रख सकेंगे. आतंकी समूह भर्ती के लिए प्राकृतिक संसाधनों (पानी की आपूर्ति और भोजन आदि) पर नियंत्रण कर उनका हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं.
नाजीरिया में बुरी स्थिति:
अफ्रीकी देश जैसे नाइजीरिया और सोमालिया एवं पश्चिम एशियाई देश सीरिया, इराक और यमन में स्थिति तनावपूर्ण होती जा रही है. नाइजीरिया के एक बड़े भाग में आतंकवादी संगठन बोको हराम का नियंत्रण है.
उत्तर-पूर्वी नाइजीरिया में चाड झील (लेक) के क्षेत्र के आस-पास बोको हाराम की स्थिति काफी मज़बूत है. आंकड़ों के मुताबिक, नाइजीरिया की 71.5% जनसंख्या गरीबी में जी रही है और 50% से ज़्यादा आबादी कुपोषण की शिकार है. नाइजीरिया में सरकार की स्थिति और उसके शासन की बात करें, तो वहां सरकार काफी कमज़ोर अवस्था में है. ऐसी स्थिति में आतंकी संगठन प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल अपनी सुविधा के हिसाब से करते हैं. सधारण सी बात है, एक देश जहां रोज़गार नहीं है, भोजन की उपलब्धता नहीं है और सरकार का नियंत्रण नहीं है, ऐसे में आतंकी संगठनों द्वारा उस क्षेत्र के लोगों का दुरुपयोग करने की संभावना काफी अधिक बढ़ जाती है. आतंकी संगठन इन्हीं क्षेत्रों में रहने वाले आम लोगों को अपनी ढाल बनाकर अपने हितों की पूर्ति करते हैं.
 
                      सीरिया में 6 वर्षों से चल रहा गृह युद्ध, सूखे और भुखमरी की कगार पर 
 
सीरिया एक देश, जो करीब 6 वर्ष पहले आज के मुकाबले काफी अच्छी स्थिति में था,  लेकिन आज सीरिया को गृहयुद्ध से जूझते हुए 5 वर्ष हो चुके हैं और यह युद्ध 6वें वर्ष में प्रवेश कर गया है. इसी दौरान, सीरिया में आतंकवादी संगठन इस्लामिक स्टेट (आई.एस.) भी काफी मज़बूत स्थिति में पहुंच गया. इन्हीं कारणों के चलते सीरिया इतिहास के सबसे बुरे दौर में आ पहुंचा है, जहां देश सबसे खराब और व्यापक सूखा एवं भुखमरी का सामना कर रहा है. इसकी वजह से हज़ारों लोगों को अपने घरों से विस्थापित होना पड़ा और लाखों लोग गरीबी के निम्नतम स्तर पर पहुंच गए और वे सभी खाद्य असुरक्षा का सामना कर रहे हैं.
संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि सीरिया में आई.एस. पानी का हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है और वह बांधों पर नियंत्रण कर अपने दुश्मनों को नुकसान पहुंचाकर अपने कब्ज़े वाले क्षेत्र को बढ़ाना चाहता है. 2015 में सीरियाई सेना पर असानी से हमला करने के लिए आई.एस. ने रामादी बांध के गेट को ही बंद कर दिया था, ताकि सेना को पानी की आपूर्ति ही ना हो सके. इसके अलावा, पानी पर टैक्स लगाकर आतंकी संगठन अपनी फंडिंग भी कर सकते हैं. आई.एस. ने सीरियाई शहर रक्का में यही काम किया था. कुछ जगहों पर आई.एस. ने पानी की आपूर्ति को बंद नहीं किया बल्कि उसने लोगों को घरों से निकालने के लिए पानी को बाढ़ की तरह इस्तेमाल किया.
 
खुद के लिए भोजन नहीं जुटा पा रही है यमन की दो-तिहाई जनसंख्या
संयुक्त राष्ट्र (यूएन) के मुताबिक, पश्चिम एशियाई देश यमन की कुल जनसंख्या 2.74 करोड़ में से करीब दो-तिहाई लोग खुद के लिए भोजन नहीं जुटा पा रहे हैं और 73 लाख लोगों को आपात मदद की ज़रूरत है. यमन में लोगों तक सहायता पहुंचाने के लिए यूएन ने विश्व समुदाय से करीब ₹140 अरब की मदद की अपील की है. 
बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, युद्ध के कारण यमन में पिछले 2 वर्षों में बच्चों में कुपोषण 200% बढ़ा है. यूएन के मुताबिक, यमन में 1.4 करोड़ लोगों को भोजन की उपलब्धता नहीं है. इसके अलावा, 50% चिकित्सकीय सुविधाएं वहां अब काम नहीं कर रही हैं.  इसके अलावा, ऐसी ही स्थिति कई अन्य देशों (इराक, अफ़ग़ानिस्तान, सोमालिया और सूडान आदि) में भी है.
निष्कर्षतया यह कहा जा सकता है कि केवल जलवायु परिवर्तन ने ही आतंकवाद को नहीं बढ़ाया, बल्कि इसने एक ऐसे वातावरण का निर्माण किया जहां आतंकवाद तेज़ी से फल-फूल सकता है और मौजूदा तनाव व संघर्ष को बढ़ा सकता है. गार्डियन में छपी खबर के मुताबिक, दुनिया भर में अमेरिका से लेकर ब्रिटेन, यूरोप और एशियाई-प्रशांतमहासागरीय देशों तक की सेनाओं ने जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न होने वाली समस्या को रेखांकित किया है और इसके बुरे प्रभाव को उजागर किया है.
 जलवायु परिवर्तन पर ग्लोबल मिलिट्री एडवाइज़री काउंसिल ने भी चेतावनी देते हुए कहा है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से “अकल्पनीय पैमाने पर” बड़े पैमाने पर शरणार्थियों की संख्या में बढ़ोतरी होगी और यह “21 वीं सदी का सबसे बड़ा सुरक्षा खतरा” हो सकता है.” पूर्व अमेरिकी रक्षा मंत्री जेम्स मैटिस भी कह चुके हैं कि जलवायु परिवर्तन के कारण अमेरिकी सेना के लिए एक बड़ा खतरा उत्पन्न हो गया है.
साभार-
https://www.theguardian.com/environment/2017/apr/20/climate-change-will-fuel-terrorism-recruitment-adelphi-report-says
https://uploads.guim.co.uk/2017/04/20/CD_Report_Insurgency_170419_(1).pdf

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