गणेश के ‘टेस्ट’ में मीडिया कितना ‘पास’?

अभिनव श्रीवास्तव |

बिहार विद्यालय परीक्षा बोर्ड के पूर्व टॉपर गणेश कुमार के निलंबन और अंततः गिरफ्तारी ने अधिकांश भारतीय मीडिया को अपनी पीठ थपथपाने का अवसर दे दिया है. मीडिया ये कहने की स्थिति में है कि उसने बिहार के ‘शिक्षा तंत्र’ की वास्तविकता से देश को परिचित करा दिया है. चूंकि न्यूज चैनलों पर चलने वाले ‘मीडिया टेस्ट’ के बाद ही गणेश को ‘फेल’ घोषित कर दिया गया था, इसलिये इसके बाद गणेश के परीक्षा नतीजों को बिहार बोर्ड द्वारा रद्द किये जाने की ‘औपचारिकता’ सचमुच महज ‘औपचारिकता’ ही लगी.

वैसे भी, जिस आक्रामकता के साथ मीडिया ने बिहार की शिक्षा व्यवस्था की गड़बड़ियों को गणेश के रूप में एक चेहरा प्रदान किया, उसके बीच अपना पक्ष रखने और तर्क-वितर्क करने जैसे ‘अभिजात्य’ मूल्यों की कोई जगह नहीं थी. नतीजतन, इलेक्ट्रानिक मीडिया के प्रतिनिधियों ने गणेश को जितना ‘निरीह’ और ‘बुद्धू’ दिखाना चाहा, वह उससे कहीं ज्यादा ‘बुद्धू’ नजर आया. हालांकि ये लिखते-लिखते भी याद दिलाना जरूरी है कि बिहार विद्यालय परीक्षा समिति ने गणेश की उत्तर पुस्तिकाओं में अब तक कोई गलती नहीं निकाली है और उसे भ्रामक जानकारी देने के अपराध में गिरफ्तार करने की बात कही है.

असल में, यह पूरा मामला भारत में शिक्षा तंत्र की बदहाली के साथ-साथ मीडिया की संरचना और उसकी भूमिका को समझने का भी एक अध्याय हो सकता है. निस्संदेह, भारत में आज कारोबारी मीडिया की ताकत और प्रभाव पहले के मुकाबले कहीं अधिक संगठित है. सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक मामलों पर ‘राज्य’ की तरह व्यवहार करना उसकी सत्ता संरचना का ही एक पहलू है. इसलिये गणेश को पहले ‘मीडिया टेस्ट’ में असफल घोषित करना और उसके ठीक बाद उसकी इस ‘असफलता’ को अपनी ‘सफलता’ से जोड़ना कोई अचरज में डालने वाली बात नही लगती है. अलबत्ता, अब बिहार सरकार द्वारा की गयी जांच की घोषणा और उसके नतीजे की बात बेमानी हो गयी है. वहीं गणेश के अपराधी और मूर्ख होने की बात अब ‘कामन सेंस’ बन चुकी है.

लेकिन क्या ऐसा कहना बिहार में शिक्षा तंत्र की कारगुजारियों पर पर्दा डालना है? आखिर इस बात पर कई शिक्षाविदों और जानकारों में भी सहमति है कि बिहार समेत देश के कई राज्यों में परीक्षा में नक़ल का कारोबार बेहद पेशेवर और व्यवस्थागत रूप से बरसों से चल रहा है. फिर मीडिया की भूमिका पर सवाल क्यों खड़े किये जाने चाहिये?

इस सवाल का जवाब साल 2015 में घटे एक घटनाक्रम में है. तब टीवी न्यूज मीडिया में बिहार और उत्तर प्रदेश में दसवीं और बारहवीं की परीक्षा के दौरान होने वाली सामूहिक नक़ल के विजुअल्स ने सनसनी पैदा कर दी. स्टूडियो पत्रकारिता में सिमटते देश के अंग्रेजी और हिन्दी इलेक्ट्रानिक मीडिया के अधिकांश चैनलों के लिये ये विजुअल्स किसी अचम्भे से कम नहीं थे. इनकी नाटकीय ढंग से बार-बार प्रस्तुति कर बिहार की परीक्षा प्रणाली को कटघरे में खड़ा किया गया तो यह एक ‘राष्ट्रीय’ मुद्दा बन गया.

लेकिन यह आश्चर्य की बात रही कि इस दौरान न तो नक़ल माफियाओं और उनके कारोबारी गठजोड़ पर सवाल उठाये गये और न ही इसके कारणों को राज्य के शिक्षा तंत्र की बुनियादी खामियों से जोड़कर देखा गया. इस बीच कुछ स्वतंत्र जानकारों ने यह अवश्य कहा कि बिहार में नक़ल की परंपरा की वजहें सामाजिक और व्यवस्थागत दोनों हैं. इस दौरान राज्य में शिक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिया और योग्यता पर भी सवाल उठाये गये.

लेकिन टीवी न्यूज मीडिया का सारा जोर इन विजुअल्स को सामने रखकर सनसनी फैलाने पर रहा. दरअसल, ये मामला मीडिया के समाजशास्त्र में ‘विजुअल रियलिज्म’ कहे जानी वाली परिघटना की एक बानगी भर था. इसकी अगली शर्त थी, छात्रों के चेहरों को सामने रखकर मूल मुद्दे से ध्यान भटकाना और एक प्रकार की स्टीरियोटाइपिंग को मजबूत करना. नतीजतन, ‘हम बिहार के टॉपर हैं’, ‘बिहार में नक़लराज’ जैसे शीर्षक वाले कार्यक्रमों की पूरी सीरीज आरम्भ हो गयी.

वास्तव में, भारत में खुद को राष्ट्रीय कहने वाले टीवी न्यूज मीडिया में क्षेत्रीय राजनीति और कुछ समाजों के प्रति कुलीनता का भाव कूट-कूटकर भरा हुआ है. वह इन समाजों की सामाजिक-सांस्कृतिक विशिष्टताओं और बुनियादी समस्याओं से कोई संवाद तो करना नहीं चाहता, लेकिन धारणाओं के निर्माण में अग्रणी दिखना चाहता है. खासकर, अंग्रेजी टीवी मीडिया ने तो लंबे समय तक वर्नाक्यूलर समाजों को अपने विजुअल डोमेन का हिस्सा ही नहीं माना. अगर कोई मामला उसके विजुअल डोमेन में आता भी है, तो वह ज्यादातर अवसरों पर अपने वैचारिक आग्रहों को थोपने की कोशिश करता है. उसका यह व्यवहार अंग्रेजी की भाषाई श्रेष्ठता, स्वयं को आधुनिक और वर्नाक्यूलर समाज को दोयम दर्जे का बताने वाली मानसिकता से पैदा होता है. समाजशास्त्री इस रूप में अंग्रेजी को संस्कृत की तरह ही ज्ञान की ब्राम्हणवादी परंपरा का प्रतीक मानते हैं. वर्नाक्यूलर समाजों में शिक्षा से जुड़े विवादों पर अंग्रेजी मीडिया का रुख अक्सर इसी सोच से निर्धारित होता है.

यही वजह है कि देश में अपने अच्छे पाठ्यक्रम के बावजूद महज ‘संख्यात्मक अभियोग्यता’ को ‘शिक्षा’ का नाम देने वाले केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा परिषद की समझ पर अंग्रेजी मीडिया प्रायः कोई बहस नहीं करता. क्या वो प्रति वर्ष लगभग सौ फीसदी अंक लाने वाले छात्रों का मीडिया टेस्ट लेकर देश को यह बता सकता है कि उन्हें अपने पाठ्यक्रम का सौ फीसदी ज्ञान है?

वहीं दूसरी तरफ, हिन्दी टीवी मीडिया लगातार वर्नाक्यूलर समाजों की वास्तविकता के ज्यादा निकट होने की बात तो कहता है, लेकिन असल में वह अंग्रेजी मीडिया की ‘एजेंडा सेटिंग’ क्षमता की बराबरी करने के लिये जूझता भी रहता है. आश्चर्य नहीं कि इस मामले में उसका कवरेज लगभग-लगभग अंग्रेजी टीवी मीडिया की ‘नक़ल’ साबित हुआ है. इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि हिन्दी टीवी मीडिया की संरचना और उसकी अभिव्यक्ति पर जातीय पूर्वाग्रहों का भी असर होता है. यही कारण रहा कि टीवी चैनल एबीपी न्यूज, आज तक और हिन्दी टीवी मीडिया का एक हिस्सा इस मामले में ज्यादा आक्रामक नजर आया.

अंग्रेजी और हिन्दी प्रिंट मीडिया की भी स्थिति कोई बहुत अलग नहीं रही. टाइम्स आफ इंडिया ने साल 2015 में सामूहिक नक़ल के विजुअल्स सामने आने के बाद बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में परीक्षा की अवधि और उसके बाद परिणामों में होने वाली धांधलियों की ख़बरों को छापने का सिलसिला एकाएक तेज किया. इन ख़बरों की प्रस्तुति और उनके ट्रीटमेंट पर उसी सोच की छाया थी जिसका जिक्र ऊपर किया जा चुका है.

ये अफ़सोसजनक था कि हिन्दी अखबारों ने भी इस नजरिये से किसी स्वायत्त सोच का परिचय नहीं दिया. पिछले कुछ दिनों में बिहार का क्षेत्रीय मीडिया भी इस मामले की कवरेज राष्ट्रीय मीडिया द्वारा निर्धारित वैचारिक लाइन के इर्द-गिर्द ही करता रहा है. यहां तक कि ख़बरों के चयन और भाषा के नजरिये से गंभीर कहे इंडियन एक्सप्रेस समूह का अखबार जनसत्ता का कवरेज भी अंग्रेजी अखबारों का अनुवाद भर ही था.

इस विश्लेषण के कुछ अपवाद भी हैं. जैसे हिन्दी इलेक्ट्रानिक और प्रिंट मीडिया की तरफ से ये तर्क आते हैं कि हर साल संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा में सफल होने वाले हिन्दी माध्यम के छात्रों को वह खूब जगह देता है. इनमें अधिकांश बिहार समेत हिन्दी भाषी राज्यों से आने वाले छात्र होते हैं. बेशक, इस तरह की ख़बरों से क्षेत्र विशेष के बारे में बनने वाले पूर्वाग्रह टूटते हैं. लेकिन अगर हिंदी मीडिया इन ख़बरों की अनदेखी नहीं कर पाता तो इसका कारण भी है. इसका कारण संघ लोक सेवा आयोग परीक्षा का विशिष्ट इतिहास और प्रष्ठभूमि है. इस परीक्षा में अंग्रेजी का वर्चस्व तोड़ने के लिये देश की हिन्दी पट्टी में लंबे समय तक आंदोलन हुये हैं, जिसमें तत्कालीन हिन्दी पत्रकारिता की भी अपनी भूमिका थी.

इसलिये भाषायी मीडिया इस मुद्दे के साथ एक निकटता महसूस करता है. लेकिन इससे यह भ्रम नहीं पाल लेना चाहिये कि आज का व्यवसायिक हिंदी मीडिया हिंदी विमर्श और भाषायी चेतना बढ़ाने का कोई सायास प्रयास करता है. उसकी रूचि हिंदी माध्यम से आने वाले छात्रों की प्रष्ठभूमि और उनके संघर्षों को दोयम दर्जे की भावुकता में लपेटकर एक बेहद सतही किस्म का अस्मितामूलक विमर्श तैयार करने में होती है. इस विमर्श की सीमायें कितनी स्पष्ट होती हैं, यह हिंदी मीडिया जगत में जातीय उत्पीड़न और आरक्षण जैसे संजीदा विषयों पर होने वाली एकतरफा बहसों में सहज ही दिखायी पड़ जाता है.

इसमें शायद ही कोई संदेह है कि बिहार विद्यालय परीक्षा बोर्ड के नतीजे और गड़बड़ियां अपने आप में देश के राज्य बोर्डों और शिक्षा के गिरते स्तर के बारे में आगाह कर रहे हैं. लेकिन ये स्थिति कोई एकाएक नहीं आयी है. भारत में नब्बे के दशक में मध्य प्रदेश जैसे राज्यों ने शिक्षा के ठेकाकरण की शुरुआत कर दी थी. बाद में इसी मॉडल को बिहार और अन्य राज्यों ने अपनाया. बीच में कुछ राज्यों ने शिक्षा सुधारों को लागू कर इसे काबू कर लिया, लेकिन बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य इस राह पर चलते ही रहे.

संयोग से भारत में नब्बे का दशक ही इलेक्ट्रानिक मीडिया के विस्तार का भी समय था. कहने की जरुरत नहीं कि उदारीकरण की जिस कोख से मीडिया ने जन्म लिया है, वही शिक्षा जैसे गंभीर मुद्दे पर उसकी समझ की सीमायें भी निर्धारित कर देता है. ऐसे में इस बात का जवाब देना बहुत मुश्किल नहीं कि गणेश कुमार का ‘मीडिया टेस्ट’ लेने प्रश्नपत्र को कहां से और कैसे तैयार किया गया?

अभिनव स्वतंत्र पत्रकार हैं.

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