शंगरीला में पाकिस्तान से पिछड़ा भारत

अभिनव श्रीवास्तव |

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में वैश्विक मंचों पर भारत की प्रभावी मौजूदगी का प्रचार बहुत जोर-शोर से किया जाता है. गाहे-बगाहे खुद प्रधानमंत्री मोदी इस बात को दोहराते रहते हैं, लेकिन बीते दिनों एक प्रतिष्ठित वैश्विक मंच पर भारत की नामौजूदगी चर्चा का विषय बनी रही. बात सिंगापुर सरकार द्वारा हर साल आयोजित की जाने वाले शंगरीला डायलाग की है जिसमें चीन और अमेरिका समेत 28 एशिया-पैसिफिक देशों के रक्षा मंत्री, वरिष्ठ अधिकारी और सैन्य प्रमुख भाग लेते हैं.

ऐसी खबर थी कि वित्त और रक्षा मंत्रालय का संयुक्त कार्यभार संभाल रहे अरुण जेटली की व्यस्तता के चलते इस बार भारत की ओर से रक्षा राज्य मंत्री सुभाष भामरे के नेतृत्व में एक राजनयिक मंडल सिंगापुर जायेगा, लेकिन अंत में भारत ने इस डायलाग से अपने हाथ पीछे खींच लिये. इससे पहले भारत साल 2002 से 16 बार आयोजित हो चुके इस डायलाग में 12 बार हिस्सा ले चुका है. आख़िरी बार रक्षा मंत्री मनोहर पारिर्कर ने इस डायलाग में भारत का प्रतिनिधित्व किया था.

वहीं अंग्रेजी अखबार ‘दि हिन्दू’ के अनुसार आयोजकों ने इस डायलाग में भारत के प्रतिनिधित्व को पाकिस्तान के ‘स्तर’ का नहीं माना. इस डायलाग में पाकिस्तान का नेतृत्व जाइंट चीफ्स आफ स्टाफ कमेटी के अध्यक्ष जुबैर महमूद हयात ने किया. जुबैर अहमद हयात को डायलाग के प्रमुख पैनल में जगह मिली जबकि आयोजकों ने रक्षा राज्य मंत्री सुभाष भामरे को 2-4 जून तक चलने वाले समापन सत्र के अंतिम दिन शामिल करने की शर्त रखी. नतीजतन, भारत ने डायलाग में अपना कोई प्रतिनिधि नहीं भेजा. हालांकि सिंगापुर में भारत के उच्चायुक्त जावेद अशरफ ने सभी सत्रों में भागीदारी की.

शंगरीला डायलाग की बीते वर्षों में रणनीतिक अहमियत काफी बढ़ी है. अधिकांश देश द्विपक्षीय वार्ताओं से पहले इस तरह के मंच का इस्तेमाल अपने पक्ष में माहौल और बढ़त बनाने के लिये करते हैं. भारत की नामौजूदगी में पाकिस्तान ने चीन-पाकिस्तान आर्थिक कारिडोर (सीपीईसी) पर भारत के रवैये पर सवाल खड़े करते हुये कहा कि भारत के अलावा दक्षिण और मध्य एशिया के ज्यादातर देश इस परियोजना से जुड़ चुके हैं. गौरतलब है कि भारत चीन-पाकिस्तान आर्थिक कारिडोर को अपनी संप्रभुता के खिलाफ मानता है.

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