क्या ताइवान दुनिया में अलग थलग पड़ रहा है?

रुपेश पाठक |

चीन विश्व की एक महाशक्ति बन चुका है, ऐसे में पिछले एक दशक से पूरी दुनिया में शक्ति संतुलन और समीकरण में बदलाव होना लाजिमी है. पनामा ने ताइवान के साथ लंबे समय से चले आ रहे अपने राजनयिक संबंधों को तोड़ चीन के साथ राजनयिक संबंध स्थापित कर लिए हैं. कहा जा रहा है कि पनामा ने आर्थिक फायदे के लिए यह कदम उठाया है. अब सवाल यह है कि इसी तरह दुनिया के बाकी देश भी एक एक करके ताइवान को छोड़ कर चीन से राजनयिक संबंध स्थापित करते रहे तो फिर ताइवान का भविष्य क्या है. कहीं ताइवान दुनिया में अलग थलग तो नहीं पड़ रहा है.

दुनिया भर के देश जो कि चीन या फिर ताइवान के साथ संबंध रखते हैं वो वन ‘वन चाइना पॉलिसी’ के आधार पर रखते हैं. वन चाइना पॉलिसी का मतलब ये है कि दुनिया के जो देश पीपल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना (चीन) के साथ कूटनीतिक रिश्ते चाहते हैं, उन्हें रिपब्लिक ऑफ़ चाइना (ताइवान) से सारे आधिकारिक रिश्ते तोड़ने होंगे. करीब 22 देश ऐसे हैं जो ताइवान को मान्यता देते हैं. साथ ही करीब 70 देशों के साथ उसके आर्थिक संबंध हैं, पूरी दुनिया से उनका संबंध बना हुआ है. आज चीन की ताकत उसकी आर्थिक व्यवस्था है. लेकिन ताइवान का निवेश भी बहुत से देशों में हैं. तो बहुत जल्द ताइवान मिट जाएगा, ऐसा नहीं होने वाला है. अफ़्रीका और कैरेबियाई क्षेत्र के कई छोटे देश अतीत में वित्तीय सहयोग के चलते चीन और ताइवान, दोनों से बारी-बारी रिश्ते बना और तोड़ चुके हैं.

दरअसल ये उलझा मामला है चीन और ताइवान के बीच, और दोनों ही देश खुद को असली चीन कहते हैं. चीन ताइवान के बीच तनाव की जड़ें इन देशों के अतीत में हैं. इसकी जड़ें 1930 के दशक में चीन के गृह युद्ध तक जाती हैं, ये चीन की नेशनलिस्ट पार्टी और कम्युनिस्ट पार्टी के बीच जंग का नतीजा है. 1949 में जब माओत्से तुंग की कम्युनिस्ट पार्टी जीत गई तो चीन के बड़े हिस्से पर इसका प्रभुत्व स्थापित हो गया. चांग काई शेक अपने समर्थकों के साथ ताइवान चले गए थे. तब से लेकर अब तक इस बात को लेकर संघर्ष जारी है कि कौन असली चीन का प्रतिनिधित्व करता है.

एक ओर पीपल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना (पीआरसी), जिसे आम तौर पर चीन कहा जाता है, वो साल 1949 में बना था. इसके तहत मेनलैंड चीन और हांगकांग-मकाऊ जैसे दो विशेष रूप से प्रशासित क्षेत्र आते हैं.दूसरी तरफ़ रिपब्लिक ऑफ़ चाइना (आरओसी) है, जिसका साल 1911 से 1949 के बीच चीन पर कब्ज़ा था, लेकिन अब उसके पास ताइवान और कुछ द्वीप समूह हैं. इसे आम तौर पर ताइवान कहा जाता है. ताइवान ओलंपिक खेल जैसे अंतरराष्ट्रीय समारोह में ‘चीन’ का नाम इस्तेमाल नहीं कर सकता.

दशकों तक चीन और ताइवान के बीच बेहद कड़वे संबंध होने के बाद 1980 के दशक में दोनों रिश्ते बेहतर होने शुरू हुए. उस वक्त चीन ने ‘वन कंट्री टू सिस्टम’ के तहत ताइवान के सामने प्रस्ताव रखा कि अगर वो अपने आपको चीन का हिस्सा मान लेता है तो उसे स्वायत्तता प्रदान कर दी जाएगी. लेकिन ताइवान ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया.

दोनों देशों की खींचतान में अमरीका को ताइवान का सबसे अहम और एकमात्र दोस्त माना जाता रहा है. हालांकि इन संबंधों में नाटकीय बदलाव भी दीखते रहे हैं. दूसरे विश्व युद्ध से साल 1979 तक अमरीका ताइवान के संबंध काफी अच्छे रहे. 1979 में तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने चीन से रिश्ते प्रगाढ़ करने की पहल करते हुए ताइवान के साथ अपने राजनयिक संबंध तोड़ लिए और चीन की वन चाइना पॉलसी को मान लिया. ‘वन-चाइना’ एग्रीमेंट के तहत अमरीका मानता रहा है कि ताइवान चीन का ही हिस्सा है और इस नीति को चीन-अमरीका संबंधों की बुनियाद माना जाता है.

अमरीका साम्यवादी विचारधारा में विभाजन करना चाहता था तो उसने चीन के साथ दोस्ती तो निभाई लेकिन उसने ताइवान के साथ रक्षा समझौता जारी रखा. इसका मतलब ये है कि अगर चीन ताइवान को अपने साथ मिलाने के लिए कोई युद्ध छेड़ता है तो वो उसे सुरक्षा की गारंटी देता है.असल में अमरीका की पुरानी रणनीति ये रही है कि चीन एक है ताइवान से अमरीका के संबंध अनौपचारिक रहेंगे.अमरीका के नव निर्वाचित राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने दिसंबर में कहा कि अमरीका को ‘वन-चाइना’ पॉलिसी से बंधकर नहीं रहना चाहिए. उनका ये बयान चीन को नागवार गुजरा.

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