….नहीं पाप का भागी केवल व्याध !

व्यालोक पाठक |

नहीं पाप का भागी केवल व्याध!

साल 2008-09 की बात है. इन पंक्तियों का लेखक द संडे इंडियन नामक पत्रिका में काम करता था. जी हां, वही अरिंदम चौधरी वाली. नौकर भले था, पर हनक कम नहीं थी. खुद को यह लेखक शानदार रिपोर्टर और बेहतरीन डेस्क-कर्मी आंकता था.

उसी वक्त एक खबर की भनक लगी. ख़बर आज के नोबल प्राइज विजेता कैलाश सत्यार्थी के खिलाफ थी. क्लू बहुत छोटा था, पर लेखक ने खोदना शुरू किया. कुछ सिरे हाथ में आए ही थे, कि दबाव की राजनीति शुरू हो गई. पहले तो एक कलीग ने ‘समझाया’, फिर बाहर से लोग ‘समझाने’ लगे.

इसके बाद धमकी और प्रलोभन। उस वक्त जवानी का जोश औऱ पिता की ईमानदारी का खुमार सिर पर था, सो लेखक हिला नहीं. आखिर, खुद घोड़े के मुख से भी धमकी मिली, कहा गया कि पत्रकारिता का करियर शुरू होने के पहले खत्म हो जाएगा.

पूरे प्रकरण में चट्टानी मजबूती के साथ लेखक के संपादक खड़े रहे. (उनका नाम नहीं ले रहा, क्योंकि उनसे बात नहीं हो पायी है, आज्ञा नहीं ले पाया हूं). वह चूंकि अकेले तो थे नही, तीन-चार लोग थे, जिनको मिलकर फैसला लेना होता था. बात शायद अरिंदम तक भी गई .

स्टोरी छपी, तो लेकिन चार पेज की स्टोरी एक पेज में. उसमें क्या बचा होगा, यह पाठक अंदाजा लगा सकते हैं. (बाद में, पूरी स्टोरी अभिषेक श्रीवास्तव ने अपने ब्लॉग जनपथ डॉट कॉम पर छापी और शायद अंग्रेजी में भी छपवायी. लेखक को याद है कि किसी जर्मन महिला ने भी बाद में इंटरव्यू लिया था)

खैर, मामला यहीं नहीं रुका. मानहानि के केस की धमकी आयी और उसके साथ ऑफिस में मीटिंग (लेखक के लिए मानसिक प्रतारणा) का दौर चालू हुआ. पूरे समय मेरे संपादक चट्टान की तरह पीछे खड़े रहे. अंत में, दो महीने बाद मेरी और मेरे कुछ समय बाद संपादक जी की भी नौकरी जाती रही.

‘प्रभात खबर’ ने कटिहार के भुक्तभोगी पत्रकार को मझधार में छोड़ दिया है. यह उस बैनर का हाल है, जो ‘अख़बार नहीं, आंदोलन’ था. जिसका एक इतिहास था, अपने कर्मचारियों का साथ देने का. वह अखबार आज डर के मारे,लोभ के मारे झुका नहीं है, रेंग रहा है, सरीसृप की तरह.आंदोलन तो दूर इस तरह झुककर तो बाजारू बनना भी मुश्किल है!

अरुण शौरी के साथ एक्सप्रेस याद आता है, मार्क टली के साथ बीबीसी. ये पत्रकार बने, क्योंकि संस्थान इनके साथ था. संस्थान ने इनकी स्टोरी को own किया, उससे पल्ला नहीं झाड़ा.

प्रभात खबर कुछ हज़ार रुपए देता होगा, उस पत्रकार को. लाखों का सौदा उस हज़ार पर भारी पड़ गया. राजदंड का भय, या दाम का लालच…किसने पहुंचाया प्रभात ख़बर को यहां.

दो दिनों तक कोई कार्रवाई नही. उल्टा एक धड़ा तो पत्रकार के चरित्र पर कीचड़ उछालने, उसे पत्रकारीय कर्तव्य समझाने और यादवजी को पाक-साफ ठहराने में लगा है. लोग उसकी बहन तक की तरफ इशारा कर रहे हैं, उसे बिका हुआ साबित कर रहे हैं. हालांकि, यह किसी को पता नहीं है कि असल झगड़ा क्या है और विधायक ने उसे इतनी भद्दी गालियां क्यों दीं?

कटिहार के एक पत्रकार को कटिहार का विधायक जान से मारने की धमकी देता है, तो दिल्ली के पत्रकार को वहां का सांसद या विधायक थोड़े ही छोड़ेगा? पत्रकारों की साख वैसे ही दांव पर है, इसमें आप अगर अब भी अपनी सुविधा के हिसाब से कोने तलाश रहे हैं, तो कल आपकी बारी है.

मसला बहुत सीधा है. पत्रकार को एक विधायक ने जान से मारने की धमकी दी, अश्लील और वीभत्स गालियां दीं. उसे सज़ा होनी चाहिए. इसको आएं-बाएं-शाएं बोलकर उलझाइए मत, भले ही आप लालू यादव के भक्त हों या …..

व्यालोक पाठक स्वतंत्र पत्रकार हैं.

 

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