प्रिय दिलीप मंडल जी, आप किस ‘नैतिक बल’ के साथ भारतीय पत्रकारिता का स्तर तलाश रहे हैं?

कृष्णकांत  के फेसबुक वॉल से साभार |

प्रिय दिलीप मंडल जी,

आज ही आपने यह जान लेने का दावा किया कि भारत के पत्रकार इतने मूर्ख क्यों होते हैं. ​आज ही मैंने यहां पर एक शिकायत की कि हमने एक सामान्य सी खबर ​की, जिसे नेशनल दस्तक के संपादक ने हूबहू कॉपी किया, हेडिंग बदली और अपने नाम से छाप लिया. आप उस संस्थान को स्थापित करने का दावा करते हैं, इसलिए उस शिकायत में आपका भी नाम लिखा था.

इसे बुरा कहने, इसे अनैतिक कहने, इसे पाठकों के साथ धोखा कहने या इसे पेशेवर बेईमानी कहने की जगह आपने मुझे द वायर की कॉरपोरेट फंडिंग का हवाला दिया. आप वरिष्ठ होने की हैसियत से यह कहकर टाल सकते थे कि चूक हो गई होगी. मैं उन्हें ऐसा न करने को कहूंगा. आपने तर्क देकर उस चोरी को जायज़ ठहराया.

रिकॉर्ड यह है कि आपके इस महान संस्थान पर बीबीसी, लल्लनटॉप और अन्य वेबसाइट से भी खबरें चुराने का आरोप है, जिसका आपने ऐसे ही धू​र्तता के साथ बचाव किया है.

5 घंटे हो गए हैं, वह खबर अब भी संपादक के नाम से वेबसाइट पर चल रही है. संपादक से बात की तो उन्होंने पहले कहा कि वहां से नहीं ली. हमने कहा, सर हूबहू कॉपी है. तो बोले कि अच्छा क्रेडिट दे देता हूं. मैंने कहा, अगर आपने कॉपी नहीं की तो जबरन क्रेडिट क्यों देंगे? लेकिन उन्होंने स्टोरी के बीच में एक जगह वायर का नाम डाल दिया, जबकि पूरी की पूरी खबर द वायर से उठाई गई है.

वायर को कॉरपोरेट से फंड मिला है तो इसलिए आप पत्रकारिता में चौर्य कर्म को बढ़ावा देना चाहते हैं? ​आपके निर्देशन में यह सब हो रहा है, संस्थान का संपादक कॉपी की हुई खबर को अपने नाम से पाठकों को पढ़वा रहा है. फिर आप पूछते हैं कि भारत में पत्रकार मूर्ख क्यों होते हैं? हमारे आपके पहले की पीढ़ी ने भी यही गोरखधंधा किया होगा, इसी तरह सीनाजोरी की होगी, ऐसा ही कुतर्क किया होगा, इसलिए भारतीय पत्रकार मूर्ख होते हैं, और बेशर्म भी.

अगर वायर को कॉरपोरेट फंड करता है तो इससे मेरे काम पर क्या फर्क पड़ता है? वायर अपनी फंडिंग की बात खुद ही अपने पाठकों को बताता है, आप उसी की वेबसाइट से सूचना लाकर पोस्ट लिखकर कौन सा तीर मार दे रहे हैं? वायर के पाठक जानते हैं कि वायर क्या कर रहा है, किससे पैसे ले रहा है और कैसे चल रहा है.

वायर मुझे मेरे मुताबिक काम करने देता है, मुझसे सेक्स विशेषांक नहीं निकलवाता, जैसा आपके साथ इंडिया टुडे में हुआ. मुझे आपकी तरह अपने फेसबुक स्टेटस भी नहीं डिलीट करने पड़े. मुझपर किसी शरद यादव या रामविलास पासवान का भी हाथ नहीं है. अपनी मर्जी से काम करता हूं. कोई टांग अड़ाता है तो छोड़कर चल देता हूं.

आप अरुण पुरी के पैसे से, शरद यादव ​जी की सिफारिश से संपादक बनकर पत्रकार हो सकते हैं तो मैं कॉरपोरेट के पैसे से पत्रकार क्यों नहीं हो सकता, अगर मैं कोई जनविरोधी या कॉरपोरेट पसंद काम नहीं करता? न मैं अपनी वॉल पर जाति बेचता हूं, न ही संस्थान में जनता के मुद्दे गुल करके सेक्स विशेषांक बेचता हूं. न ही किसी मालिक संपादक के डर से फेसबुक बंद कर देता हूं.

खैर, छोटी सी बात थी. कोई महान काम नहीं था, ढाई घंटे की मेहनत से बनी एक सामान्य सी रिपोर्ट थी. एक संस्थान के संपादक ने कॉपी करके अपने नाम से छाप लिया. आप उससे जुड़े हैं. आप कह देते कि ऐसा नहीं होना चाहिए. आपने उल्टा तर्क दिया.

हमें उम्मीद है कि आप कल ही फिर से अपनी वॉल पर ज्ञान देंगे कि भारत में पत्रकारिता का स्तर इतना गिरा क्यों है? पत्रकार इतने मूर्ख क्यों हैं? जनता समझती है कि आप ही के जैसे मठाधीश और बेईमान लोगों ने यह हालत कर रखी है. आप पत्रकारिता के नये नवेले पंडे हैं. अगली चोरी पर शिकायत नहीं करूंगा. यह गंदी बहस नहीं करनी. मेहनत करके दिनरात, अपना बहुत कुछ दांव पर लगाकर कायदे का दो अक्षर लिखना संभव हो पाता है. अगली बार कानून की नैतिकता काम करेगी. शर्म आए तो वह स्टोरी हटा लें, या जैसा होना चाहिए वैसा कर लें.

और, हां आप जैसे महान लोगों के लिए एक सूचना यह भी है कि दुनिया में कहीं भी सूचनाओं और विचारों का कॉपीराइट नहीं होता. सिर्फ कॉपी, टेक्स्ट या उत्पाद का कॉपीराइट होता है. मेरा सूचना या विचार पर कोई दावा नहीं है. न ही खबर पर. बस क्रेडिट न देकर नेशनल दस्तक ने पेशेवर बेईमानी की, उस पर घटिया किस्म की बहस की गई. ज्ञान देने से पहले खुद को महान बनाने की कोशिश करनी चाहिए.

ऐसी हरकत के बाद आप किस नैतिक बल के साथ भारतीय पत्रकारिता का स्तर तलाश रहे हैं?

कृष्णकांत

 

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