भाजपा नेताओं को गुस्सा क्यों आता है?

भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार केंद्र में अपने तीन वर्ष पूरे कर चुकी है. उत्तर प्रदेश समेत देश के सत्रह राज्यों में सत्ता की बागडोर भी उसी के पास है, लेकिन लगता है कि इतना कुछ होने पर भी पार्टी सत्ता के साथ तालमेल नहीं बैठा पा रही है. ये बात ख़ास तौर पर उत्तर प्रदेश के बारे में सच है जहां बीते दिनों में कई बार पार्टी के कार्यकर्ता और विधायक पुलिस के आला अधिकारियों से लड़ते-झगड़ते नजर आये हैं.

इस लिहाज से सबसे ताजा वाकया बुलंदशहर का है जहां सयेना इलाके की सर्किल आफिसर श्रेष्ठा ठाकुर से कुछ स्थानीय भाजपा नेताओं ने महज इस आधार पर दुर्व्यवहार किया कि श्रेष्ठा ठाकुर और उनकी टीम ने एक मोटरसाइकिल सवार का हेलमेट नहीं पहनने के चलते 200 रुपये का चालान काटा. भाजपा नेताओं का आरोप था कि श्रेष्ठा और उनकी टीम जान-बूझकर पार्टी कार्यकर्ताओं को निशाना बना रही है.

इतना ही नहीं, इस घटना के वायरल हुये वीडियो में ये कार्यकर्ता सीधे तौर पर श्रेष्ठा से बहसबाजी करते हुये भी दिखायी दे रहे हैं. वहीं श्रेष्ठा ने भी इस वीडियो में सख्त रुख दिखाते हुये कार्यकर्ताओं को कानून के दायरे में रहने के लिये आगाह किया. गौर करने वाली बात है कि इसके बाद सर्किल आफिसर श्रेष्ठा ने पुलिस के कार्य में व्यवधान डालने के लिये पांच भाजपा नेताओं को गिरफ्तार किया, लेकिन घटना के एक हफ्ते के बाद ही उन्हें बुलंदशहर से बहराइच ट्रांसफर करने का आदेश भी थमा दिया गया.

ये चर्चा आम है कि श्रेष्ठा का ट्रांसफर भाजपा के ग्यारह विधायकों और सांसदों द्वारा मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ से की गयी शिकायत के बाद हुआ है. वहीं ख़बरों के मुताबिक़ भाजपा के नगर अध्यक्ष मुकेश भारद्वाज ने भी पार्टी कार्यकर्ताओं के मनोबल के लिये श्रेष्ठा के ट्रांसफर को जरूरी बताया था.

इससे पहले गोरखपुर में भाजपा के वरिष्ठ नेता और स्थानीय विधायक राधा मोहन अग्रवाल ने आईपीएस अधिकारी और गोरखनाथ इलाक़े की क्षेत्राधिकारी चारु निगम के साथ दुर्व्यवहार किया था. इसके बाद चारु निगम के आंखों से आंसू निकल गये जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था.

वहीं बीती आठ अप्रैल को मेरठ में भाजपा नेता संजय त्यागी ने पुलिस से भिड़ गये थे. पुलिस ने उनके बेटे को गाड़ी में हूटर लगाने से मना किया जिसके बाद त्यागी ने बेटे को पुलिस से छुड़ाने के लिये थाने जाकर हंगामा काटा और पुलिस से दुर्व्यवहार किया. बाद में राजनीतिक दबाव के चलते उनके बेटे को छोड़ दिया गया और पुलिस अधिकारी को वहां से हटा दिया गया.

हद तो तब हो गयी जब 22 अप्रैल को सहारनपुर में वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक की अनुपस्थिति में उनके आवास पर चार पांच सौ लोगों की भीड़ ने जमकर हंगामा किया. इस दौरान उनकी पत्नी और दो बच्चे घर में थे. बाद में मामले की गंभीरता को देखते हुये सहारनपुर के सांसद राघव लखनपाल, उनके भाई और देवबंद से भाजपा विधायक ब्रजेश समेत कई लोगों को नामज़द किया गया था. हालांकि कुल नतीजा सिफर रहा और किसी के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया गया. उल्टा राघव लखनपाल द्वारा लव कुमार पर पिछली सरकार के इशारे पर काम करने का आरोप लगाया गया. नतीजतन, लव कुमार को उनके पद से हटा दिया गया.

बीते दिनों बाराबंकी की लोक सभा सांसद प्रियंका सिंह ने भी पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों और मीडिया के सामने बेहद अपमानजनक लहजे में पुलिस की कार्यप्रणाली पर टिप्पणी की थी. उन्होंने इस दौरान पुलिस की खाल खींचने तक की बात कह डाली.

भाजपा नेताओं के गुस्से की वजह कुछ भी हो, लेकिन इससे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के प्रशासनिक दावों का खोखलापन साफ़ होता जा रहा है. यही वजह है कि इन सभी मामलों में पुलिस के शीर्ष अधिकारियों पर तो तबादले की गाज गिरी है, लेकिन पार्टी के किसी भी नेता पर कोई कार्रवाई नहीं की गयी है.

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