मिस्टर प्राइम मिनिस्टर ! कुछ कीजिये, इसके पहले कि बहुत देर हो जाए…

व्यालोक पाठक 
देश के प्रधान सेवक के नाम खुला खत 

आदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र भाई दामोदरदास मोदी जी,

मैं जानता हूं कि यह चिट्ठी आप तक नहीं पहुंचेगी. जैसे देश के लाखों किसानों, मजदूरों और मज़लूमों की आवाज आप तक नहीं पहुंचती. फिर भी मैं यह चिट्ठी लिख रहा हूं, जानते हैं क्यों? मुझे लगता है शायद मेरी चिट्ठी का नोटिस आपका सबसे बड़ा विरोधी गिरोह यानी ‘वामपंथी-कॉंग्रेसी’ गठजोड़ ले लेगा और शायद तब आप उसी तरह मेरी बातों का संज्ञान लेंगे जैसे एक “झूठे दलित की मौत पर आपकी छाती फटी थी, गो तस्करों की हत्या पर आपकी आंखों से आंसू निकले थे……शायद यह संभव हो.
ख़ैर यह तो विषयांतर हो गया . तीन साल पहले जब आपने शपथ ली थी और खुली जीप में जनता का अभिवादन स्वीकार किया था तो मैं और मेरे जैसे हजारों भारतवासी आपसे ज्यादा प्रसन्न थे . आपको गद्दी मिली थी लेकिन हमें एक प्रतीक मिला था हमारे डूबते स्वाभिमान को बचाने का. हमारे गल चुके शौर्य स्तंभ को बनाने का. और हमारी पराभूत सामाजिक चेतना को जगाने का. वह प्रतीक आप थे प्रधान सेवक जी. आप हिंदुत्व के प्रतीक थे. आप एक हताश समुदाय के उम्मीदों के प्रतीक थे .
अमरनाथ की यात्रा पर गए सात तीर्थयात्रियों को चुन कर मार दिया गया है. इस घटना को अड़तालीस घंटे बीत चुके हैं. आप क्या कर रहे हैं मिस्टर प्राइम मिनिस्टर ? आपने दुःख जताया, अफसोस किया, सबसे इसकी निंदा करने को कहा लेकिन उसके बाद क्या हुआ ?
क्या आप वही नरेंद्र मोदी हैं जो हमारे एक जवान के बदले दुश्मनों के दस सिर लाने का आह्वान करता था? क्या आप वही मोदी हैं जो यह बताता था कि आक्रमण बाहर से भले हो किंतु सीमाएं तो हमारी अपनी हैं. उन सीमाओं की चौकसी हम कर सकते हैं. क्या आप वही नरेंद्र मोदी हैं जिसकी बातों को सुनकर जनता ने बमबम होकर पहली बार किसी ग़ैर कॉंग्रेसी दल को इतना प्रचंड बहुमत दिया था? क्या आप वही नरेंद्र मोदी हैं जिसने गुजरात में 2002 के बाद कोई दंगा नहीं होने दिया? क्या आप वही नरेंद्र मोदी हैं जो साठ पार का है लेकिन 18 वर्षीया युवती के मोबाइल में प्रोफ़ाइल पिक के तौर पर मौजूद है? आप वही हैं क्या?
मुझे लगता है नहीं. शायद आप अपना तेज, ओज, अपनी ऊर्जस्विता और एक दूरदर्शी व जबरदस्त प्रशासक के व्यक्तित्व को अलास्का की बर्फ में दबा आए हैं. आपके बेहद नाकारा मंत्री श्री राजनाथ सिंह और श्री रविशंकर प्रसाद जिस कश्मीरियत की लौ जगा रहे हैं, वह आपकी सूचना के बिना तो नहीं ही होगा न.
6 दिसम्बर 1992 को एक विवादित ढांचा टूटने पर पूरे पूरे बहुसंख्यक समाज को कटघरे में खड़ा कर दिया गया. चालीस हजार जवानों के संगीनों के साये में हमारी अमरनाथ यात्रा संपन्न होती है, हमारे आराध्य श्री राम आज भी टेंट में रह रहें हैं, और यह सब देखने को एक गैर राजनीतिक सामान्य धार्मिक हिन्दू अभिशप्त है. आप हिन्दू हृदय सम्राट थे और आपकी पार्टी के एजेंडे में यह शीर्ष पर था. 
कश्मीर में अब एक मंदिर नहीं बचा है. अमरनाथ के लिए जमीन मांगी जाती है तो बवाल होता है. कश्मीर में हिंदुओं को बसाने की बात होती है तो आपका 56 इंच का सीना काम नहीं आता. आप बख़ूबी जानते हैं कि जम्मू, लेह और लद्दाख में कोई समस्या नहीं है. सारी खुराफ़ात की जड़ कश्मीर का इस्लामिक रेडिकलिजेशन है. जिसका परिणाम था कि, 27 साल पहले मस्जिदों की लाउडस्पीकरों से, स्थानीय अखबारों से यह चीख़ चीख़ कर दुहराया गया की हिंदुओं का कश्मीर में कोई काम नहीं है.
आपके नाकारा, नाक़ाबिल और नालायक़ गृहमंत्री हमें कश्मीरियत की दुहाई देते हैं. ये कौन सी कश्मीरियत है मिस्टर प्राइम मिनिस्टर ? चलिए, आप पाकिस्तान से MFN का दर्जा वापस नहीं लेते, कोई बात नहीं. लेकिन आप हुर्रियत के गिलानी और मीरवाइजों की ऐश तो बंद कर सकते हैं. आप पत्थरबाजों को 10 लाख रुपये देना तो बंद कर सकते हैं. आप हमारी सेना का मनोबल तो ऊंचा रख सकते हैं.
श्रीमान मोदी जागिए, इससे पहले की बहुत देर हो जाए . भक्त बड़े गुस्से में हैं और आपको तो पता है कि भष्मासुर और रावण भी भक्त ही थे. एक शिव को जलाने पर आमादा हो गया तो दूसरा कैलाश को ही उखाड़ने चला था. ये भक्त ही हैं जिन्होंने आपको अर्श पर पहुंचाया था और उनका गुस्सा फूटा तो आपको फर्श पर लाने में भी वो हिचकेंगे नहीं.
जिस तरह साध्वी प्राची और निरंजना पर आपने लगाम लगाई रविशंकर और राजनाथ जैसों पर भी लगाम कसिये. और कुछ कीजिये साहब, कुछ कीजिये. ऐसा न हो कि बहुत देर हो जाए.
आपका एक शुभचिंतक
व्यालोक पाठक स्वतंत्र पत्रकार हैं. प्रस्तुत आलेख लेखक के निजी विचार हैं.

4 COMMENTS

  1. यकीनन व्यालोक, भक्त बहुत गुस्से में हैं। अब वाद नहीं रण का समय है। आज नहीं तो कभी नहीं।

    • स्वामी जी को, दो चार बार पाक अधिकृत कश्मीर भी जाना चाहिए…..वहां भी एक दू ठू मंदिर मिल जाएगा और कुछ ट्रेनिंग वगैरा भी ले लेंगे…

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