हुर्रियत के पॉलिटिकल लैंडस्केप में नहीं है किसी नॉन मुस्लिम के लिए जगह !

अभय श्रीवास्तव

अमरनाथ यात्रियों पर हमले के बाद जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती की प्रतिक्रिया गौर करने लायक है. महबूबा ने कहा कि, ‘इस हमले से हर मुस्लिम और कश्मीरी का सिर शर्म से झुक गया. ’यकीनन महबूबा की प्रतिक्रिया कश्मीर में कथित आज़ादी के सच की स्वीकारोक्ति है.

कश्मीर के आतंकवाद प्रभावित इलाकों में हर शुक्रवार की नमाज़ के बाद पाकिस्तान और ISIS का झंडा लहराना, आतंकी बुरहान वानी के मां-बाप का ये कहना कि – ‘मेरा बेटा इस्लाम के लिए कुर्बान हुआ’, जाकिर मूसा जैसे आतंकियों का कश्मीर में इस्लामी राज्य कायम करने का सपना; ये सब जिस सच से Kashmir watchers को वाकिफ कराता रहा है, कि भारत में कश्मीर ‘इस्लामिक रेडिकलाइजेशन की प्रयोगशाला’ है, उसे महबूबा ने अपने बयान से पुष्ट किया है.

ऐसा हमला किसी और राज्य में हुआ होता तो भारतवासियों या फिर ज़्यादा से ज़्यादा क्षेत्रीय विचार और संस्कृति के संवाहकों का सिर शर्म से झुकता ना कि किसी मज़हब के अनुयायियों का. अमरनाथ यात्रियों पर हमला बेशक एक धर्म पर ही हमला हुआ. और इस हमले से अलगाववादियों की कश्मीरियत के नाम पर कथित आज़ादी की मांग की कलई खुल गई. अलगाववादियों के एजेंडे में जिस खलीफा राज्य का मंसूबा छिपा है, उसके सामने आने वाले हर एक वाहिद विचार की हत्या होती है.1990 के दौर में जब कश्मीरी पंडितों का कश्मीर से पलायन हुआ, तो इसे पहले लॉ एंड आर्डर बाद में रिजनल अनरेस्ट जैसी संज्ञाओं से परिभाषित कर समस्या के मूल को नज़रअंदाज़ किया गया. हमारे कथित सेकुलर अब तक कश्मीर की सच्चाई को स्वीकार नहीं करना चाहते हैं. हाल ही में एक लंबे-चौड़े ब्लॉग पोस्ट में तीन बातें साबित करने की कोशिश की गई.

1.कश्मीरी पंडितों का पलायन उतनी बड़ी तादाद में नहीं हुआ, जितना प्रचारित है.

2. कश्मीरी पंडितों के पलायन में तत्कालीन प्रशासक (गवर्नर) जगमोहन का दोष है, क्योंकि उनकी नीतियां बर्बर थीं और उन्होंने कश्मीरी पंडितों को एक एजेंडे के तहत कश्मीर में रोकने की कोशिश नहीं की, बल्कि उन्हें प्रेरित किया. ब्लॉग में मायनॉरिटी कमीशन के पूर्व चेयरमैन वजाहत हबीबुल्लाह के हवाले से कहा गया कि जब वजाहत ने जगमोहन से दूरदर्शन पर कश्मीरी पंडितों से ये अपील करने को कहा कि वे कश्मीर में सुरक्षित महसूस करें और सरकार पूरी सुरक्षा उपलब्ध कराएगी, तो जगमोहन ने ऐसी अपील करने से मना कर दिया. इसकी जगह अपने प्रसारण में जगमोहन ने कहा कि, ‘पंडितों की सुरक्षा के लिए रिफ्यूजी कैम्प बनाये जा रहे हैं, जो पंडित डरा हुआ महसूस करें वे इन कैम्पस में जा सकते हैं, जो कर्मचारी घाटी छोड़ कर जाएंगे उन्हें तनख्वाहें मिलती रहेंगी.’

3. 1990 के दौर में कश्मीर में हिंदू निशाने पर आए, तो आम मुस्लिमों को भी हिंसा का सामना करना पड़ा.

अव्वल तो इन तीनों बातों को तथ्यों के आधार पर खारिज किया जा सकता है, लेकिन अगर इन बातों में अंश भर की भी सच्चाई है तो भी क्या इस बात का उत्तर नहीं खोजा जाना चाहिए कि पलायन सिर्फ एक धर्म विशेष के लोगों का ही क्यों हुआ? आज़ादी से इस देश के इतिहास में कई प्रांतों में सांप्रदायिक हिंसाएं हुई हैं, लेकिन फिर ऐसा क्या है कि कश्मीर में सदियों से रह रहे सिर्फ कश्मीरी पंडित अपना सब कुछ त्याग कर अप्रवासी होने को मजबूर हुए? कश्मीर की असल सच्चाई को छुपाने के लिए ऊपर लिखे जिन तीन कारणों का जिक्र है, उनमें से दूसरी बात को सबसे ज़्यादा उछाला जाता रहा है, क्योंकि ऐसा करना इनके लिए सबसे ज़्यादा पॉलिटकली करेक्ट है, और कश्मीर में इस्लामिक रेडिकलाइजेशन के प्रयोग को तथाकथित सेकुलर आवरण ओढ़ाने के लिए एक व्यक्ति को कटघरे में खड़ा कर बाजी मार ले जाना सबसे आसान है. चलो मान लेते हैं, कि जगमोहन का प्रशासन ठीक नहीं था, उन्होंने कश्मीरी पंडितों को रोकने का प्रयास नहीं किया बल्कि किसी एजेंडे के तहत कश्मीर छोड़ने के लिए प्रेरित किया तो भी कश्मीर समस्या का मूल तो वही है- इस्लामिक रेडिकलाइजेशन .

बामियान बुद्ध की भांति कश्मीर में भी हर संभव हिंदू प्रतीकों को नष्ट ही किया गया है. गिन-चुन कर आप एक ही बड़े तीर्थस्थल अमरनाथ गुफा को कश्मीर के शेष हिंदू प्रतीक में गिन सकते हैं. ये इसीलिए है क्योंकि इसके लिए वक्त रहते संगीनों तले यात्रा के इंतज़ाम कर दिए गए, और साल में सिर्फ एक-डेढ़ महीने तीर्थयात्रियों के वेश में पर्यटक आते रहे. जगमोहन का नाम आगे कर कश्मीर में इस्लामिक रेडिकलाइजेशन के कुकृत्यों को ढकने के लिए जो नैरेटिव चुना गया – मानवाधिकार हनन का नैरेटिव – वो इनके लिए पॉलिटकली अचूक था.

मानवाधिकार हनन के नैरेटिव में कश्मीर में इस्लामिक एजेंडे को आगे बढ़ाने वालों को 1990 से लेकर आज तक बचाया जाता रहा है. हुर्रियत के लोग पब्लिक में कभी बंदूक लेकर अवतरित नहीं होते, लेकिन कश्मीरियत के नाम पर वो टू नेशन थ्योरी और इस्लाम के नाम पर निर्मित एक देश पाकिस्तान के हाथों की कठपुतली बन कर आज़ादी मांग रहे होते हैं. गाहे बगाहे ये अपने भविष्य के कश्मीर को हदीस व शरिया कानूनों के बल पर चलने की मंशा को सार्वजानिक भी करते हैं.

हुर्रियत को कश्मीरियत का हिस्सा बताकर उनसे बातचीत की वकालत करने वालों से कभी आप पूछ कर देखिएगा कि क्या आप इसी तर्क से कश्मीरी पंडितों के किसी संगठन से भी कश्मीर समस्या के हल के लिए बातचीत की सिफारिश करेंगे? नहीं, वो ऐसा नहीं कर सकेंगे क्योंकि हुर्रियत के पॉलिटिकल लैंडस्केप में कश्मीरी पंडित एक अल्पसंख्यक होंगे, ना सिर्फ संख्याबल में बल्कि राजनीतिक विचारधारा के स्वरूप में भी. सच तो यह है कि हुर्रियत के पॉलिटिकल लैंडस्केप में किसी नॉन मुस्लिम के लिए जगह नहीं है ! वो तुरंत कश्मीर में जनमत संग्रह का जुमला उछालेंगे, कहेंगे कि कश्मीरियों को ही कश्मीर का मुस्तकबिल तय करने दीजिए, लेकिन जरा उनसे पूछिए कि क्या वो 1947 के पूर्व की कश्मीर की स्थिति को दोबारा लौटा सकेंगे? यहां ये भी पूछा जाना चाहिए कि क्या लाहौर और कराची को जनमत संग्रह से मुस्तकबिल चुनने की आज़ादी मिली थी? पाकिस्तान के पंजाब और सिंध से सिखों और हिंदुओं को पलायन करने के लिए मजबूर किया जाना, क्या उनकी क्षेत्रीयता की भावना को नष्ट किया जाना नहीं था?

आज़ाद भारत में कश्मीर को ना सिर्फ धार्मिक आज़ादी मिली, बल्कि क्षेत्रीय आज़ादी की गारंटी मिली वो भी संवैधानिक व्यवस्था के तहत धारा 370 के रूप में. लेकिन इस गारंटी का इस्तेमाल कैसे किया गया – कश्मीर को इस्लामिक रेडिकलाइजेशन की ओर बढ़ाकर. संख्याबल में पहले से ही कमतर कश्मीरी पंडितों को आतंक के दम पर कश्मीर से बेदखल किया जाना इसी प्रयास का हिस्सा था. इस्लामिस्ट के आतंकी रूप को भारतीय सुरक्षाबलों से चुनौती मिल रही है, तो अमरनाथ यात्रियों पर हमलाकर असली कश्मीरियत को निशाना बनाया गया है, ताकि कश्मीर के इस्लामिक स्टेट की अवधारणा को स्थापित किया जा सके.  कश्मीर में कैसे इस्लाम के नाम का नंगा नाच हुआ है, और हो रहा है इसे सिर्फ़ कश्मीरी पंडितों या अमरनाथ यात्रियों पर हमलों के प्रिज़्म से देखना अधूरा होगा.

याद कीजिए मार्च 2000, जब अनंतनाग के छित्तीसिंहपुरा में 36 सिखों का क़त्लेआम हुआ था. लश्कर ऑपरेटिव डेविड कोलमैन हेडली ने स्वीकारा है, कि ये नरसंहार लश्कर ने कराया. आज अमरनाथ यात्रियों पर हमले के बाद हुर्रियत का बाना पहने आतंकी बयान जारी करते हैं कि हमला निंदनीय है, लश्कर और यूनाइटेड जेहाद काउंसिल जैसे आतंकी संगठन हमले में शामिल ना होने का स्वांग रचकर इसे भारतीय एजेंसियों की ही चाल बता देते हैं, लेकिन जिस मिलिटेंट टैक्टिक्स को अपने पॉलिटिकल एजेंडे का औजार उन्होंने बनाया है, वो जाहिर करता है कि परोक्ष या अपरोक्ष उनकी पकायी विषबेल ने ही निर्दोष हिंदू यात्रियों की जान ली. कश्मीर में आज जो हालात हैं, वो सिर्फ़ कश्मीर की कमज़ोरी नहीं, वो दिल्ली की भी कमज़ोरी है.

यहां सवाल सिर्फ़ भारत गणराज्य नाम के विचार से चल रही सरकारों की ही कमज़ोरी नहीं, बल्कि तथाकथित सेकुलर समझदारी के पुनर्व्याख्या का भी है. दिल्ली-मथुरा की एक ट्रेन में सीट विवाद, कौन बड़ा गुंडा और भीड़ में कौन भारी पड़ा की वजह से हुई एक हत्या को ‘नॉट इन माय नेम’ कहकर पॉलिटिकल कैम्पेन चलाने वाले अमरनाथ यात्रियों की हत्या को ये कहकर कमतर करके आंकना चाहते हैं कि मारने वाला भले इस्माइल (पुलिस के मुताबिक इसी नाम का आतंकी संदिग्ध है) हो, लेकिन उस वक्त यात्रियों से भरी बस की स्टीयरिंग एक सलीम शेख़ के पास थी. सलीम शेख़ के पास बस की स्टीयरिंग होने से क्या कश्मीर को इस्लामिक रेडिकलाइजेशन की प्रयोगशाला बनाने की सच्चाई छुप जाती है?

कश्मीर की समस्या सुलझानी है, तो सबसे पहले सेकुलरिज़्म का ढोंग रचने वाले पॉलिटिकल एजेंडा सेटर्स से निपटना होगा, क्योंकि ये लोग ना सिर्फ़ आतंकियों को मज़बूती देते हैं, बल्कि यही वो लोग हैं जो पाकिस्तान को उसका कश्मीर एजेंडा तय करने का मेटेरियल (विचार) उपलब्ध कराते हैं. पत्थरबाज़ को जीप से बांधकर बड़ी क्राइसिस का शांतिपूर्ण निपटारा करने वाले मेजर नितिन गोगोई की एक सुर में तारीफ होती, कोई मानवाधिकार आयोग पत्थरबाज को 10 लाख रुपए दिए जाने की सिफारिश नहीं करता तो यकीन मानिए 10-12 आतंकी, 100-50 पत्थरबाज़ वैसे ही अधमरे हो जाते, लेकिन अफसोस हालात ये नहीं है. संगीनों के साये में भले बाकी अमरनाथ यात्री सुरक्षित पवित्र गुफा तक के दर्शन कर आएं, लेकिन कश्मीर को इस्लामिक रेडिकलाइजेशन से बचाए बिना कुछ भी नहीं होने वाला है.

अभय श्रीवास्तव पत्रकार हैं ! विभिन्न वैकल्पिक और मुख्य धारा के पत्र -पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन !

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