नथिंग न्यू बॉस ! दूसरों का गू साफ कर रहे चार लोग मर गए !

अभिषेक प्रकाश
हा हा भारत दुर्दशा देखी ना जाई!
-नो नो इतना भी सैडेस्टिक होने की जरूरत नही.
-बट हुआ क्या!
-नथिंग न्यू बॉस. ओनली फोर पीपल हैव डाइड!
-क्या चार लोग! चार लोग मर गए! पर कैसे ?
-वो दूसरों का गू साफ कर रहे थे.
-गू… मीन्स.
-ओह तुम नही समझे…थोड़ा गंदा हो गया…स्वदेशी शब्द है न,  यथार्थ के थोड़ा ज्यादा ही करीब होते हैं ये ! मेरा मतलब है ये सब सेप्टिक टैंक साफ कर रहे थे और लोगों के शौच से निकलने वाली जहरीली गैस से उनकी जीवन लीला फिनिश हो गई!
-अरे तो क्या वो कुछ पहन कर नही जाते!
-ओह मेरे मासूम फ़ेलो कंट्रीमेन तुम बहुत भोला है. अपने लोगों के बारे में ही नही पता तुझे. अच्छा तू ये बता तुझे क्या पता है?
-ए भाई मेरे को बहुत कुछ पता है जैसे कुछ दिनों में ही मुकेश अम्बानी दुनिया का सबसे अमीर आदमी हो जाएगा. भारत ने ढेर सारे हथियार खरीद लिए हैं अब कोई भी अपने देश की ओर आंख उठा कर नही देखेगा. और हां कान्स में अबकी प्रियंका चोपड़ा ने पचास लाख के कपड़े पहने थे . एक और प्लीज़ लॉस्ट है, वो ये कि अब हमारे शहर में भी मर्सेडीज का शोरूम खुलने वाले है.
-वाह इतना नॉलेज! कहां से जाना ये सब मेरे भाई!
-अरे ये तो बहुत इजी है. लगता है आप इंटरनेट यूज़ नही करते. चचा जमाना बदल गया है. अब दुनिया मुट्ठी में है हमारे . एक दिन में एक जीबी डेटा . ढेर सारे न्यूज़ . हम आज सबसे जुड़े हैं . इक्कीसवीं सदी है !
खैर छोड़िए ज्यादा कहानी बनाने की जरूरत नही है. साफ-साफ मुद्दे पर आते हैं. घिटोरनी में कुछ लोग पाखाना साफ करने में मर गए ! अब उन चार लोगों के मौत को अपनी कल्पनाशीलता के अंतिम छोर तक भयानक और विद्रूप करके पेश किया जाएगा. तब भी हम लिखेंगे क्योंकि हमें सिर्फ लिखना आता है. लूंगी उठाकर साफ सुथरी दीवाल देखकर अगर मूतने की आदत है, तब तो ठीक है, वरना अगर सार्वजनिक शौचालय का प्रयोग करने के आदी हैं तब आपको मालूम होगा कि किसी पाखाने के टैंक को साफ करना कैसा अनुभव होता होगा. मुंह में शराब की बदबू को उड़ेल कर ही कोई उसमे घुसता है और दुर्भाग्य है कि शराब आज़मगढ़ की नही बनी थी, नहीं तो मौत का ये दूसरा रास्ता हो सकता था! बुरा मत मानिए, अगर मुझे मरना हो तो मैं तुलनात्मक रूप से कम कष्टदायक मौत चुनूंगा!
सोचिए कोई जब टैंक की गहराई में घुसता होगा तो वो असल में हमारे समाज की कितनी पुरानी, अमानुषिक, घृणित, असंवेदनशील समय की सीढ़ियों को पार कर जाता होगा. संख्या में कम ही सही लेकिन हम ऐसे इग्नोरेंस को अपने स्मृति में अपने कार्यकलापों को अभी तक कैसे जगह दिए हुए हैं, ये चिंतनीय है.
लेकिन इसका समाधान क्या है? मनुस्मृति को जला देने भर से या फिर कैंडल मार्च निकाल देने से हम इससे मुक्त हो सकते हैं क्या! शायद नहीं. नहीं इसलिए क्योंकि आज कोई स्मृति हमारे सामाजिक-राजनीतिक जीवन को पूरी तरह नियंत्रित नहीं करती. हां ये जरूर है कि हम उन पूर्वाग्रहों से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाए हैं. लेकिन इतनी जागरूकता लोगों में आई है कि वह स्वयं ही नही चाहते कि लोग इतने दयनीय स्थिति में काम करें. कमी हमारे गवर्नेंस में है और नागरिक सहभागिता में है. उन कर्मियों के पास कोई सेफ्टी किट क्यों नही था! इन प्रश्नों का जवाब सामान्य नागरिक को मांगना होगा.
हां कुछ लोग जरूर यह कहते हुए मिलेंगे की तथाकथित ऊंची जातियां इस श्रम में क्यों नहीं है? तो यह हमारे सामाजिक संरचना से जुड़ा सवाल है ! जिसपर धीरे-धीरे ही सही लेकिन चोट हो रही है, लेकिन शासन से जुड़े मुद्दें सामाजिक परिवर्तन से पहले हल किए जा सकते हैं. यह एक कम जटिल प्रक्रिया होगी. जब हम उन संस्थाओं में अपनी सहभागिता सुनिश्चित करें. और हल के लिए उनसे हाथ मिलाकर आगे बढ़ें . लोकतंत्र की सफलता उसके संस्थाओं की मजबूती से है. कमजोर और कम प्रतिस्पर्धी संस्थाए इस तंत्र को कमजोर ही करेंगी. जरूरत है कि लोगों को जागरूक किया जाए और प्रशासन को उनके दरवाजे तक पहुचाया जाय. तकनीकि के रचनात्मक और नवीन प्रयोग से हम लोगों को एक गरिमापूर्ण ज़िंदगी दे सकते हैं. सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाओं का लाभ जरूरतमंदों तक पंहुचता भी है कि नही, जानने की जरूरत है. अपने ही देश के विभिन्न भागों मे सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन की स्थिति अलग अलग है. दक्षिण भारत इस मामले में बेहतर स्थिति में है और जिसको हम वहां के पब्लिक सुविधाओं की स्थिति को देखकर समझ सकते हैं.
पर गौर करने की बात है कि हमारे विमर्श के केंद्र में क्या है और इसका तरीका क्या है. हाल में जो वैकल्पिक मीडिया हमें उपलब्ध है उसका कुशल प्रयोग क्या हो सकता है जो हमें समाधान से जोड़ता हो. इन बातों से इतर इस मीडिया का प्रयोग भी सतही स्तर के वाद-विवाद, या ‘मैं सही तू गलत’ के लिए ही बहुधा हो रहा है. घिटोरनी में चार मजदूर जहरीले गैस में घूंट कर उसी टैंक में दम देने की घटना कोई सामान्य सी घटना नही है. दिल्ली में अगर कोई इस तरह के सरकारी इग्नोरेंस से मरता है तो राजधानी के बाहर का क्या हाल होता होगा. सफाई कर्मचारियों के वेतन,भत्ते, उनके सुरक्षा उपायों पर हमें अतिरिक्त संवेदनशील होने की जरूरत है और जब तक ये संवेदनशीलता नागरिक चेतना का हिस्सा नही बनेगा तब तक हम असल रूप से लक्ष्य को  प्राप्त नही कर पाएंगे.

(अभिषेक प्रकाश उत्तर प्रदेश पुलिस सेवा से जुड़े हैं. अभिषेक सामाजिक मसलों पर लगातार लिखते रहें हैं.)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here