बहुमत की सरकार सिल्वर स्क्रीन से आखिर इतना भयभीत क्यों है ?

अभिनव श्रीवास्तव 

भारतीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) को ख़बरों में बने रहना पसंद है. ये अलग बात है कि बार-बार लगभग एक जैसी वजहों से चर्चा में आकर वह उकताता नहीं. उसके मुखिया पहलाज निहलानी तो यह तक कहते हैं कि वे बस अपना ‘काम’ कर रहे हैं. इसे उनका ‘भोलापन’ कहें या ‘धूर्तता’, लेकिन ये सच है कि फिल्मों को संपादित करने के पीछे की उसकी नीयत अब कहीं ज्यादा साफ़ नजर आ रही है.

इसका नतीजा ये है कि अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन की किताब ‘दि अर्ग्यूमेंटेटिव इंडियन’ पर डाक्यूमेंट्री फिल्म बनाने वाले सुमन घोष के सामने अब एक शर्त रख दी गयी है. उनसे कहा गया है कि अगर वे अपनी फिल्म से गुजरात, गाय, हिंदुत्व और हिन्दू भारत जैसे शब्दों को निकाल दें या फिर उसे ‘बीप’ कर दें तो बोर्ड उन्हें प्रमाण पत्र दे देगा. वैसे बात अगर केवल इन शब्दों को खामोश करने की हो तो भी निहलानी और उनकी टीम की सदिच्छा पूरी होती नहीं दिख रही. वे शब्द जिन्हें बोर्ड ‘क़ानून’ और ‘व्यवस्था’ के लिये खतरा मानता है, वे डाक्यूमेंट्री के बजाय ख़बरों में जगह पाकर लोगों के बीच पहुंच गये हैं. लेकिन, इसी बात को थोड़ा और आगे बढ़ायें तो निहलानी और उनकी टीम की इन शब्दों से नाराजगी बहुत अटपटी लगने लगती है. खासकर ये देखते हुये कि हमारे हालिया राजनीतिक विमर्शों को इन शब्दों से अच्छी-खासी खुराक मिली है. ये शब्द न सिर्फ प्रचलन में हैं, बल्कि इनकी कई लोकप्रिय व्याख्यायें सार्वजनिक दायरे में मौजूद हैं.

दरअसल, शब्दों के मायने सही सन्दर्भ में खुलते हैं. वे आलोचना और विमर्श तक का रास्ता भी संदर्भों के सहारे ही तय करते हैं. पर शायद यही निहलानी और बोर्ड सदस्यों की समस्या है. वे इन शब्दों के इस्तेमाल भर से आहत नहीं हैं. उनकी भौहें इस बात पर अधिक तनीं हैं कि फिल्म में अमर्त्य सेन ने भाजपा की विचारधारा के प्राणतत्व ‘हिंदुत्व’ को नकार दिया है. उसे इस बात से नाराजगी है कि फिल्म का पहला हिस्सा साल 2002 में गुजरात दंगों की पृष्ठभूमि में फिल्माया गया है. गुजरात शब्द का इस्तेमाल सेन ने इस संदर्भ में ही किया है. रही-सही कसर फिल्म में सरकार के गऊ प्रेम पर सेन की टिप्पणी ने पूरी कर दी है. वैसे इन सबसे अलग खुद अमर्त्य सेन ने भी एक अर्थशास्त्री और विचारक के रूप में वक्त-बेवक्त भाजपा के मुंह का स्वाद कड़वा किया है. फिर चाहे वह साल 2014 में नरेन्द्र मोदी की प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी पर की गयी उनकी बेबाक टिप्पणी हो या गुजरात के मानव विकास सूचकांकों पर उनके द्वारा खड़े किये गये सवाल हों.

वजह जो भी हो, आखिर इन सभी घटनाओं से एक ऐसा बड़ा सन्दर्भ बन जाता है जो भाजपा की वैचारिक बुनावट को कुछ कमजोर करता है. उसकी कुछ कड़ियां खोल देता है और अंततः कुछ ऐसी बातों को फिर से विमर्श में ले आता है, जिसे आज बहुत सहजता से देश के धर्मनिरपेक्ष जमात की साजिश बताकर खारिज कर दिया जाता है. इनमें से एक बात तो स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजनीतिक अतीत से जुड़ती है, हालांकि उनके प्रचार तंत्र और कृत्रिम आभामंडल ने लंबे समय से उनके इस अतीत पर सवाल उठाने को जैसे वर्जित बना दिया है. यहां ये याद दिलाने की जरुरत नहीं कि कैसे इन दिनों स्वयं भाजपा और उसकी वैचारिकी नेहरू और इंदिरा गांधी के अतीत में ताक-झांक करने में पूरे श्रम से जुटी हुयी है. इतिहास को तोड़ना-मरोड़ना और फिर उसे राजनीतिक रंग देकर सच बताने का पाखण्ड करना उसकी कार्यशैली की पहचान बना हुआ है.

लेकिन इस विमर्श के विस्तार में फिलहाल न भी जायें तब भी यह पूछना जरूरी लगता है कि आखिर बहुमत से सत्ता में आयी सरकार और उसके नुमाइंदों को ये विमर्श क्यों डराते हैं? आखिर क्यों उसे फिल्म प्रमाणन बोर्ड जैसी संस्थाओं में ऐसे लोग बैठाने पड़ते हैं जो कुछ प्रचलित घटनाओं और संदर्भों में तनाव की संभावनायें ढूंढ लेते हैं?

यह सही है कि फिल्म प्रमाणन बोर्ड की कार्यप्रणाली के तौर-तरीकों पर आज भी औपनिवेशिक सोच की छाया है. वह बामुश्किल ब्रिटिश राज में बनाये गये कानूनों का विस्तार भर है और लगभग हर सरकार उसे अपने राजनीतिक हितों के अनुसार इस्तेमाल करने की कोशिश करती है. पर इसके साथ-साथ एक सच ये भी है कि ऐसे कानूनों के बावजूद भारत में डाक्यूमेंट्री फिल्मों की एक समृद्ध और खुली परंपरा विकसित हुयी जिसमें कुछ शानदार डाक्यूमेंट्री फ़िल्में फिल्म डिवीजन के सहयोग से बनायी गयीं. सुखदेव, मुशीर अहमद, मणि कौल, लोकसेन ललवानी, बी डी गर्ग जैसे बहुतेरे नामों से हमारा परिचय इसी कारण हुआ. हालांकि अस्सी के मध्य दशक तक इनमें से कुछ फिल्मकारों ने फिल्म डिवीजन के तौर-तरीकों से तंग आकर ही स्वतंत्र स्त्रोतों की ओर रुख किया. आनंद पटवर्धन और रंजन पालित इस दौर के ही कुछ प्रमुख नाम थे. निःसंदेह, विषयों  के चयन से लेकर उनकी प्रस्तुति के तरीकों पर तब भी सरकारों का नजरिया कुछ उदार नहीं था, लेकिन फिल्मों को एकदम से इकहरा रंग प्रदान करने की कोशिशें तब इतनी आसानी से सफल भी नहीं होती थीं. इसके उलट ऐसी कोशिशों से कई बार सरकारों की नैतिक वैधता को जरूर धक्का लग जाता था.

दरअसल, इस बदले हुये दौर का सबसे खतरनाक संकट यही है. एक के बाद एक अनुदार फैसले लेने के बावजूद वर्तमान सरकार और उसकी संस्थायें नैतिक तौर पर जरा सा भी विचलित नहीं होतीं. बल्कि हर बार सरकार अपनी बहुसंख्यक सोच से फिल्मकारों और कलाकारों से ही यह पूछने लगती है कि उन्हें ऐसे विवादित विषय पर फिल्म बनाने की क्या जरुरत थी. इसके आगे बनने वाला माहौल बहुत जाना-पहचाना होता है जिसमें अक्सर फिल्मकार या कलाकार को ‘राष्ट्रद्रोही’ घोषित कर दिया जाता है, उसको पाकिस्तान चले जाने की सलाह दी जाती है और कई बार देश के ऊपर बोझ जैसी संज्ञाओं से नवाजा जाता है.

वास्तव में, स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जानते हैं कि आधुनिक भारत के विचार और भाजपा के विचार का अंर्तविरोध इतना गहरा है कि उसे आसानी से पाटा नहीं जा सकता. तब भी नहीं, जबकि उनकी सरकार एक बड़े बहुमत से सत्ता में आयी है और देश की सामाजिक-राजनीतिक स्थितियां उसके वैचारिक झुकाव के अनुकूल होती चली गयी हैं. क्योंकि काजगी बहुमत मिलना कई बार शासन करने के लिये आवश्यक नैतिक वैधता की गारंटी नहीं होती. चूंकि भाजपा के वैचारिक इतिहास और अतीत की पड़ताल उसे अब भी संकट में डालती है, इसलिये वह नहीं चाहती कि ऐसी कोई कोशिश सफल हो. जाहिर है कि ऐसे में सुमन घोष जैसे फिल्मकार उसका निशाना बनते हैं.

                                                       अभिनव श्रीवास्तव

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