नीतीश का इस्तीफ़ा – नैतिकता का अचार-बिहार में बहार – फिर से नीतीशे कुमार

व्यालोक पाठक 
हमलोग आज सुबह से पटना में हैं. दोपहर तक कोई ऐसी खबर नहीं थी कि नीतीश कुमार इस्तीफ़ा दे सकते हैं. शाम चार बजे के आस-पास ऐसी हवा बहनी चालू हुई लेकिन उसे पुष्ट करने का कोई जरिया सामने भी नहीं था और अपनी व्यस्तताएं भी. छः के इर्द गिर्द यह खबर बाहर भी आ गयी. पुष्ट करने के लिए जब तक दो-चार फ़ोन कॉल करते तब तक नीतीश कुमार ख़ुद ही टेलीविजन पर आने लगे. उन्होंने अपने इस्तीफ़े की पुष्टि करते हुए सारा ठीकरा लालू यादव के माथे फोड़ दिया.
नीतीश ने अपने इस्तीफ़े से कथित तौर पर एक मास्टर स्ट्रोक चल दिया है. हालांकि इस इस्तीफ़े में हम सभी लहालोट हो जाएं, ज़रा रुकिये और विचारिये. ज़रा यह सोचा जाय कि नीतीश बाबू की नैतिकता पूरे बीस महीने तक कहां गायब थी जब वह गठबंधन दल के मुख्य साझीदार को अपना बग़लगीर बनाये हुए थे. क्योंकि लालू यादव भी कोर्ट से सजायाफ्ता हैं और फ़िलहाल चुनाव भी नहीं लड़ सकते. शायद लालू यादव ही आरजेडी के प्रमुख भी हैं और नीतीश सरकार के कई चुनाव प्रचार कार्यक्रम में उनका चेहरा भी अखबारों में ख़ूब ही चमका है. ज़रा यह भी सोचना चाहिए कि अनंत कुमार, सुनील पांडे और मुन्ना शुक्ला इत्यादि पर “सॉफ्ट” उनकी सरकार किस मुंह से नैतिकता की बात करती है. जब ब्रम्हेश्वर मुखिया की हत्या के बाद दबंगों ने पूरे पटना को लगभग छः घंटों के लिए बंधक बना लिया था, जब शाहबुद्दीन जेल से निकले और सड़कों पर उनके समर्थकों ने खुलेआम तांडव मचाया तो ये नैतिकता कहां थी नीतीश बाबू. बहरहाल नीतीश ने बिहार की सियासत में एक पहल तो ले ही ली है और अब सब तय करेगा कि भाजपा और आरजेडी इसपर कैसी प्रतिक्रिया देते हैं.
प्रधानसेवकजी ने ट्वीट करने में देर नहीं लगाई और भाजपा के जे. पी. नड्डा और रविशंकर प्रसाद जैसे नेताओं ने नीतीश को खुला ऑफर दिखाने में भी कोई विलंब नहीं किया है. तो अब नीतीश के पास रास्ते क्या हैं?
पहला तो नीतीश विधानसभा भंग करने की सिफ़ारिश कर दें और ताजा चुनाव का सामना करें, यह उनसे होने का नहीं है. क्योंकि अगर करना होता तो वह कर चुके होते.
दूसरा, वह भाजपा से बाहरी समर्थन मात्र लेकर सरकार बचाएं या फिर भाजपा को सरकार में शामिल करें. यह सबसे आसान रास्ता है क्योंकि भाजपा सत्ता की मलाई छोड़ने पर राजी नहीं होगी.
तीसरा और अंतिम विकल्प सबसे मुश्क़िल है कि नीतीश महागठबंधन के नेता का फिर चुनाव करवायें. यह इसलिए संभव नहीं है कि नीतीश के पास संख्या बल नहीं है और उनकी पार्टी में टूट का भी ख़तरा है……..तो नीतीश कुमार क्या करेंगे? ज़ाहिर तौर पर भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाएंगे और यह ख़बर एक दो दिनों में सबके पास आ जायेगी….तो इंतजार करिये..!
व्यालोक पाठक स्वतंत्र पत्रकार हैं. प्रस्तुत आलेख लेखक के निजी विचार हैं.

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