लखनऊ- लाजवाब और उम्दा खानों का मरकज़

असद उल्लाह
लखनऊ लाजवाब और उम्दा खानो का मरकज़ है, यहां हर महफ़िल, मौसम, और त्यौहार के लिय अलग अलग पकवान होते हैं, और हर एक पकवान की अपनी ही दास्तान होती है. बिरयानी से लेके दाल तक और शीरमाल से लेके रोग़नी रोटी तक सबकी अपनी ख़ासियत और अनोखी दास्तान है. मीठे में सीवैयो से लेके आम की खीर और शाही टुकड़े तक सबकी अपनी कहानी और ज़ायक़ा है. इन खानों में मोहब्बत और लखनवी कल्चर बसा है, जो आम से खाने को भी इतना लज़्ज़तदार बना देती है.
मौसम की बात करें तो हर मौसम में तरह तरह के पकवान बनते हैं, जाड़े  की बात करे तो काली और लाल गाजर का हलवा, मक्खन जो की सुबह 3 बजे अंधेरे में शबनम की बूंदों मे बनाया जाता है, यानी दूध में मसाले मिलाकर इसे तड़के तीन बजे सुबह खुले आसमान के नीचे ओंस में प्योर कॉटन से ढककर रखना पड़ता है. ये एक बहुत ही मेहनत और कारीगरी का काम है. बरसात में अनर्से की गोली, काबुली और बिराहि सबका अपना ही मज़ा है, जब ख़ूब बारिश हो रही हो तब पुराने लखनऊ में अम्मीजान बिराहि बनाती हैं. साथ मे भुना हुआ कीमा और दशहरी आम, बिराहि एक परांठा होता है, जिसमें पिसी हुई दाल और कुछ मसालों का मेल होता है, और इसको क़ीमे और आम के साथ खाया जाता है.
जनाब, गरमियों का अपना ही मज़ा होता है, इतनी क़िस्मों के आम- दशहरी, ज़ौहरी सफ़ेदा, लखनौवा सफ़ेदा और चौसा हर एक का अलग ज़ायक़ा और मज़ा, आम की खीर और आम की बर्फ़ी के क्या कहने, तो फ़ालसे के शर्बत से तरोताज़ा हो लीजिए.
हर फेस्टिवल मे अलग तरह के पकवान…होली में तरह तरह की गुझिया,कचोरियां और पापड़ तो ईद मे तरह तरह की सीवैया बनती हैं, क़ीमामी, मुज़ाफ़र और शीर कोरमा सबकी अपनी लज्जत और ज़ायक़ा होता है.
आगे और भी बहुत कुछ है जो हम आपसे साझा करेंगे. अपने अगले हिस्से में, कुछ और ज़ायक़ेदार कहानियां…तरह तरह के खानों के साथ और हां बनाने के तरीक़े और बारीकियों पर भी गुफ़्तगू होगी…
तब तक के लिए इजाज़त दीजिए….मिलते हैं यहीं न्यूज़ कैप्चर्ड पर .

असद उल्लाह टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंस के छात्र रहें हैं, लखनवी जायके के गहरे जानकार हैं !

 

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