निष्ठुर सरकारी सपने बनाम संविदाकर्मी

डॉ. चेतना पाण्डेय
एक तरफ़ रोके से भी न रुकने वाले बेबस आंसू,व्यवस्था के ख़िलाफ़ बिफरते मुर्दाबाद के ज़िद्दी नारे और आक्रोश की पराकाष्ठा और दूसरी तरफ़ तेज पानी की बौछार,लाठी चार्ज,गिरफ्तारियां और उस पर भी किसी सूरत न थमने वाला भडका जनान्दोलन. न्यायालय का एक निर्णय आता है पौने दो लाख सपने टूटकर बिखर जाते हैं. जी हां मैं  उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े और ज्वलन्त मुद्दे शिक्षकों के समायोजन के रद्द होने के हालात पर बात कर रही हूं.
मैं इस बात से पूर्णतया संतुष्ट हूं कि न्यायालय ने बिल्कुल तटस्थ और सही निर्णय लिया. यह भी मानती हूं कि वोट बैंक जल्दी हथिया लेने की कवायद में पिछली सरकार द्वारा लिये गये बेसिर पैर के फ़ैसले शिक्षामित्रों के लिये मुसीबत की वजह बन गये. लेकिन बात यहीं पूरी नहीं हो जाती क्योकि दो दशक से चातक की तरह आसमान देख रहे पौने दो लाख सपने कहां ठौर पायेंगे यह फ़ैसला अभी बाकी है.
इन दिनों योग्यता-अयोग्यता के लेकर हो रहे तर्कों-कुतर्कों की कोई कमी नहीं. उन शिक्षामित्रों को भी टीईटी परीक्षा उत्तीर्ण कर नये सिरे से नई प्रतियोगिता में शामिल हो नौकरी दोबारा अर्जित करने का मशवरा दिया जा रहा होगा जिनमें से न जाने कितनों के बच्चे भी इस प्रतियोगिता का हिस्सा होंगे. दिल पर हाथ रखकर बताइये कि प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी की लय टूट जाने के बाद क्या इसके लिए फिर एकाग्र होना इतना आसान होता है. क्या एक दशक पहले की मेरिट आज की मेरिट के सामने टिक सकेगी. मेरे इन सवालों का ईमानदार जवाब यही है कि कतई नहीं(कुछ अपवाद छोडकर). जब सवाल पापी पेट का और सन्तान की परवरिश का होता है. भूख से छटपटाते व्यक्ति के सामने से थाल खींच ली जाती है तो संयमित आदमी भी जंगली होने को मजबूर हो जाता है. गेंद अब  सरकार के पाले में है. समय तय करेगा कि क्या होता है.
शिक्षमित्रों का चयन,समायोजन और फिर समायोजन रद्द होना एक बानगी है. सोचिये कि शिक्षामित्रों ने ढाई हज़ार की नौकरी से जुडी इतनी लम्बी यात्रा के बारे में सोचा होगा. तमाम लोगों के अनुसार शिक्षा मित्र इतने अयोग्य हैं कि उनसे पढ़कर बच्चों का भविष्य डूब जायेगा. लेकिन मेरे सामने कुछ ऐसे योग्य शिक्षा मित्रों के उदाहरण हैं जिनकी योग्यता किसे बड़े ओहदे के योग्य थी. सवाल किया जा सकता है कि इतने क़ाबिल थे तो दो कौडी की नौकरी के लिए क्यों रुके रहे. जवाब यह है संविदा की शर्तें पढ़ने के बाद भी नाममात्र की राशि पर काम करने की आंखों में एक चमक होती है कि उसने जो नौकरी की है आज नहीं तो कल पूर्णकालिक सरकारी नौकरी हो जायेगी. ऐसे तमाम समायोजनों के समाज भी उदाहरण भी हैं.
मेरा मानना है कि अव्वल तो किसी भी प्रकार की नौकरी में पात्रता से समझौता न किया जाये. यदि योग्य होने के बाद भी कोई युवा नाममात्र की राशि के बदले में अपने से दस गुना ज़्यादा तनख़्वाह पाने वाले से कम काम नहीं करता तो उसका भी हक़ है बराबरी के लिए आवाज़ बुलन्द करे. सरकार का नैतिक कर्तव्य भी बनता कि वह उनकी मांग का सम्मान करे. यदि ऐसा न कर सके तो औने-पौने किसी का श्रम और प्रतिभा ख़रीदने का हक़ उसे किसने दिया.

डॉ. चेतना पाण्डेय गोरखपुर यूनिवर्सिटी की पूर्व छात्र संघ उपाध्यक्ष हैं. कविताओं के जरिए अनवरत सकारात्मक हस्तक्षेप. विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में सामाजिक, राजनीतिक व साहित्यिक विषयों पर निरंतर लेखन. राष्ट्रीय स्तर की तबला वादक.

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