साल 2019 वाया बिहार, अब कौन सी करवट?

अभिनव श्रीवास्तव 

क्या बिहार के घटनाक्रम ने वास्तव में राष्ट्रीय राजनीति को एक ‘नाजुक’ और ‘नाटकीय’ मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है? यह सवाल उन लोगों के लिये एक पहेली बन गया है जो साल 2015 में हुये महागठबंधन को कमजोर पड़ गये विपक्ष के लिये संजीवनी की तरह देख रहे थे. इतिहासकार रामचंद्र गुहा तो इस घटनाक्रम में सबसे ज्यादा ‘सयाने’ साबित हुये. वे नीतीश कुमार को विपक्षी एकता का नायक बनाने की उम्मीद लगाये बैठे थे.

जाहिर है कि ऐसी उम्मीदें कई बार अपनी सदिच्छाओं से ज्यादा कुछ नहीं होतीं. भारतीय राजनीतिक घटनाक्रम अपने नतीजों में कई बार बेहद अप्रत्याशित साबित होते हैं, वे पारंपरिक मुहावरों और परिभाषाओं से पकड़ में नहीं आते. गुहा और उनके जैसी सोच समझ रखने वालों के साथ बस इतनी ही त्रासदी हुयी है. उन्होंने टेलीविजन सीरियल के अंदाज में एपिसोड दर एपिसोड आगे बढ़ रहे इस घटनाक्रम को वहां से देखा, जहां से उसे नहीं देखा जाना चाहिये था.

निस्संदेह, नीतीश कुमार की अपनी राजनीतिक शख्सियत का पहले से कहीं साफ़ होकर सामने आना इस सियासी खेल का सबसे बड़ा नतीजा है. समकालीन राजनीति में स्वयं को जिंदा रखने से ज्यादा महत्वपूर्ण उनके लिये कुछ भी नहीं है. लगभग इसी बात का भांपते हुये वे साल 2015 में भाजपा से किनारा कर राजग के साथ चले गये थे. ये कौन भूल सकता है कि तब भी उन्हें कुछ इसी अंदाज में ‘धोखेबाज’ और ‘अवसरवादी’ कहा गया था. फर्क सिर्फ इतना है कि तब ये आरोप खुद भाजपा ने लगाये थे और आज राजद और उसके समर्थक ऐसा कह रहे हैं. तब भी उनकी चिंता के दायरे में अपना सियासी अस्तित्व था और आज भी इसी चिंता में उन्होंने भाजपा को अपनी राजनीतिक छतरी में वापस बुलाया है.

लेकिन यहां से यह सवाल भी उठता है कि उन्होंने अपने सियासी अस्तित्व की कैसी शक्ल गढ़ी है? क्या ये शक्ल धुर विरोधियों के साथ पाला बदलने जैसी ‘मौकापरस्ती’ दिखाने से थोड़ी भी बदसूरत नहीं होती?  दरअसल, इन बातों का कोई सीधा सरल जवाब नहीं है.

हालांकि इसका एक जवाब ये अवश्य है कि हमारे दौर में सियासी पहचान महज एक रणनीतिक चयन बन कर रह गयी है. एक राजनेता सेकुलर, विकास पुरुष, कड़ा प्रशासक और ऐसे बहुत सारे मुखौटे या पहचानें ओढ़कर अपनी छवि बनाता है. इन तमाम मुखौटों के बीच में परिस्थितियों के अनुसार किसी एक को चुनना ही उसकी काबिलियत मानी जाती है. हम चाहें तो इसे ‘नैतिकता’ की नयी कसौटी कह सकते हैं. खुद भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नैतिकता की इस नयी कसौटी का हवाला देकर स्वीकार्यता अर्जित करते हैं, वे पहले हिन्दू कट्टरपंथी राजनेता थे, फिर विकास पुरुष हुये और उसके बाद उन्हें एक ‘सच्चे सेकुलर’ नेता की पहचान भी दी गयी.  ध्यान से देखें तो उनके टॉप डाउन गवर्नेंस मॉडल की भी यही वास्तविकता है.

असल में, इस मामले में नीतीश कुमार और प्रधानमंत्री मोदी में कुछ गजब की समानतायें हैं. नीतीश पहले एक अच्छे प्रशासक की छवि के साथ बिहार के मुख्यमंत्री रहते हैं, फिर वे सेकुलरवाद के नाम पर भाजपा के विरुद्ध एक व्यापक मोर्चा बनाने की बात कहते हुये राजग के साथ जाते हैं और पुनः शासन चलाने की मुश्किलों का हवाला देते हुये भाजपा के साथ आ जाते हैं.

वैसे बात सिर्फ इतनी भी नहीं है. महागठबंधन में मुख्यमंत्री के बतौर भी नीतीश समय समय पर खुद को स्वायत्त दिखाने से नहीं चूके. विमुद्रीकरण जैसे व्यापक महत्त्व वाले मुद्दे पर वे केंद्र सरकार के साथ दिखे. उनकी यह स्वायत्तता भाजपा के लिये एक निमंत्रण होती थी और जैसा कि कुछ जानकारों ने माना है कि राजद को नियंत्रित रखने का उपाय भी. वास्तव में, बिहार की राजनीति में नीतीश के पास नैतिक या अनैतिक ढंग से परस्पर विरोधी स्थितियों को अपने ढंग से गढ़ने का हुनर रहा है. राजनीतिक चिंतक प्रताप भानु मेहता ने कुछ दिनों पहले नीतीश की इस काबिलियत को कुछ इन शब्दों में बयान किया है:

“नीतीश मंडल दौर के बाद देश के राजनीतिक फलक पर उभरे अन्य नेताओं की तरह अपने सामाजिक आधार में ही फंसे नहीं रहे. महागठबंधन से पहले भाजपा के साथ  एक तरह से ‘अतिरेकों के गठबंधन’ की सफल इंजीनियरिंग की. साल 2005 के बाद भी उन्होंने एक व्यापक सामाजिक आधार वाली सरकार चलायी जिससे कुछ हद तक राज्य में एक गवर्नेंस का मॉडल कायम हुआ.”                    

इन तर्कों की भले ही अपनी सीमायें हों, लेकिन ये सच है कि राजग और स्वयं लालू प्रसाद यादव लम्बे समय तक बिहार की राजनीति में सक्रिय रहने के बावजूद ‘गवर्नेंस’ के स्तर पर अपना कोई मॉडल खड़ा नहीं कर सके. यह सही है कि अपनी इस छवि को गढ़ने के मामले में नीतीश कुमार एक कुशल राजनीतिक प्रबंधक रहे ,लेकिन लालू ने कभी इस बात की महत्ता को भी नहीं समझा.

यह बात वर्तमान राजनीतिक दौर में  लगातार उनके खिलाफ जाती रही और वे इसे तरह तरह से ढंकने की कोशिश करते रहे. महागठबंधन का नेतृत्व नीतीश को सौंपना इस लिहाज से एक सोचा समझा कदम अवश्य था, लेकिन भाजपा को महागठबंधन के आरम्भ से ही उन्होंने खुद पर हमला करने के अवसर बहुत आसानी से दे दिये थे. तेजस्वी यादव पर आरोप लगने के बाद वे चाहते तो तेजस्वी के बजाय किसी और को आगे कर भाजपा को उसी के दांव से चित्त कर सकते थे, लेकिन ऐसा भी नहीं हुआ.

बिहार का घटनाक्रम, साल 2019 तक कौन सी शक्ल लेगा, कहना मुश्किल है. नीतीश कुमार के लिये  राजग से किनारा कर ‘विकास पुरुष’ का रास्ता चुनने का निर्णय काफी आसान रहा है. लेकिन ‘विकास पुरुष’ का रास्ता छोड़कर दोबारा ‘सेकुलरवाद’ की चादर ओढ़ना अब इतना आसान नहीं रहने वाला. अपने बचे खुचे कार्यकाल में संभव है कि नीतीश भाजपा के आक्रामक तेवर को बीच का रास्ता निकालते हुये पचा लें. स्वभाविक है कि साल 2019 से पहले वे भाजपा के साथ अपने किसी टकराव को निर्णायक स्थिति में पहुंचने नहीं देंगे. कुल मिलाकर, सब कुछ इस बात पर निर्भर है कि वह साल 2019 तक अपनी स्वायत्त छवि का राजनीतिक प्रबंधन कैसे करते हैं?

अभिनव श्रीवास्तव 

 

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here