स्तनपान से बचाया जा सकता है 22 फ़ीसदी नवजातों को

अविनाश उज्जवल

स्तनपान विकल्प नहीं संकल्प है

विश्व भर में हर साल जन्म लेने वाले 13.5 करोड़ बच्चों में से 60 फीसदी को पर्याप्त स्तनपान सुलभ नहीं हो पाता है. अपर्याप्त स्तनपान का प्रभाव आर्थिक के साथ ही शिशु और बाल मृत्यु दर, संक्रमण वाली बीमारियों पर भी पड़ता है.  जिन शिशुओं को उनके जीवन के प्रथम छह माह के दौरान केवल स्तनपान करवाया जाता है, उन्हें उन बच्चों के मुकाबले मधुमेह, हाइपरटेंशन जैसी गैर-संक्रमणीय बीमारियां होने का खतरा काफी कम रहता है जिन्हें कम या बिल्कुल स्तनपान सुलभ नहीं हो पाता है.

विश्व स्तनपान सप्ताह, विश्वभर के बच्चों के स्वास्थ्य में सुधार और स्तनपान कराने को प्रोत्साहित करने हेतु 170 से अधिक देशों में प्रतिवर्ष एक अगस्त से सात अगस्त तक मनाया जाता है. इस वर्ष के विश्व स्तनपान सप्ताह का थीम सस्टेनिंग ब्रेस्टशफीडिग टूगेदर है. इसमें इस बात पर बल दिया गया है कि स्तनपान सिर्फ मां की जिम्मे वारी नहीं बल्कि इसमें  पिता, परिवार के अन्य सदस्यों , नियोक्‍ताओं और सहकर्मियों की भी भूमिका है.

विश्व के प्रसिद्ध स्वास्थ्य पत्रिका लैनसेट इंटरनेशनल 2014 के अनुसार विश्व में बच्चों की होने वाली 45 प्रतिशत मौतों के लिए किसी न किसी प्रकार से कुपोषण जिम्मेवार है. लैनसेट पोषण श्रृंखला के अनुसार स्तनपान से नवजात बच्चों की कुल होने वाली मौतों में 22 प्रतिशत तक की कमी हो सकती है. स्तनपान, डायरिया और निमोनिया के मामलों को कम करने में काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. बीपीएनआई के विश्लेषण के अनुसार अगर भारत में स्तनपान को सार्वभौमिक किया जा सके तो  भारत में 5 वर्ष से कम उम्र में होने वाली वाले बच्चों की मृत्यु को 13 प्रतिशत कम किया सकता है. इसके साथ ही बच्चों के आईक्यू में 3 अंकों की वृद्धि कर सकता है इसके साथ ही स्तन कैंसर की वजह से 4915 मौतों की रोकथाम कर सकता है . ग्लोबल न्यूट्रीशन रिर्पोट के अनुसार पोषण में 1 डालर का इंवेस्टनमेंट 16 डालर के रिर्टन के बराबर होता है. लैंसेंट पत्रिका के स्तनपान सीरीज में प्रकाशित शोध के अनुसार जो बच्चे स्तनपान करते हैं वे आगे जाकर पढ़ाई में अच्छे होते हैं, उनकी दीर्घकालिक आय बेहतर होती है, उनकी वित्तीय उत्पादक क्षमता में वृद्धि होती है. इसके अलावा स्तनपान से बच्चों को निमोनिया और डायरिया समेत अन्य संक्रमण के बाद इलाज में होने वाले खर्चो में बचत की जा सकती है.

बिहार में स्तनपान की स्थिति

नेशनल हेल्थ फैमली सर्वे 4 के अनुसार बिहार में स्तनपान के आकड़ों में काफी सुधार हुआ हैं पर अभी भी केवल 35 प्रतिशत बच्चों को ही जन्म के 1 घंटे के अंदर स्तनपान करवाया जाता है. शहरी क्षेत्रों में यह आकड़ा 41.8 प्रतिशत है, वहीं ग्रामीण इलाकों में यह 34.2 है. अगर हम 6 माह तक केवल स्तनपान की बात करें तो वर्तमान में ऐसे बच्चों का प्रतिशत नेशनल हेल्थ फैमली सर्वे 3 के 28 प्रतिशत से बढकर नेशनल हेल्थ फैमली सर्वे 4 के अनुसार 54 प्रतिशत हो गया है. 6 माह तक केवल स्तनपान के मामलों में देखा गया है कि बहुत सी माताएं स्तनपान के साथ ही बच्चों को पानी भी पिलाती हैं, जिसके कारण केवल स्तनपान के आंकड़ों में कमी आ जाती है.

क्या खास है मां के दूध में

नालंदा मेडिकल कॉलेज अस्पताल की शिशु विभागाघ्यक्ष प्रो डॉ अलका सिंह कहती हैं कि मां का पहला गाढ़ा दूध बच्चे के लिए पहले टीके जैसा होता है. यह प्रकृति निर्मित हैं और जन्म से 6 माह तक बच्चों की सारी जरूरतों को पूरा करने में पर्याप्त है. 6 माह तक केवल स्तनपान कराने से नवजात बच्चों की मृत्यु दर में काफी कमी आती है साथ ही बच्चों में रोग प्रतिरोधक क्षमता में भी वृद्धि होती है. बच्चा जन्म के 1 घंटे के बाद सक्रिय हो जाता हैं और स्तनपान करना चाहता है.

यह देखा गया है कि बच्चों को अगर सिर्फ मां के पास छोड़ दिया जाएं तो वो स्वयं मां के पास चला जाता है और दूध ढुंढ लेता है. अधिकांश लोग मानते हैं कि मां को 3 चार दिन बाद दूध आता हैं और पहले एक दो दिनों में जो दूध मां को आता हैं वो बच्चों के लिए अर्पयाप्त हैं पर वास्तविकता यह है कि 1 दिन के बच्चे का पेट 1 मक्कों के दाने के बराबर होता है और मां को होने वाला गाढ़ा पीला दूध बच्चे के लिए र्प्याप्त होता है.

स्तनपान नहीं है केवल मां का काम

स्तनपान करवाना केवल माताओं की जिम्मेवारी नहीं है. जब तक मां को उसके पति, परिवार, समाज का सहयोग नहीं मिलेगा यह मुश्किल है. पिता और अन्य पारिवारिक सदस्यों की ओर से समुचित समर्थन सुनिश्चित कर, कामकाज की स्थितियां बेहतर कर और घरेलू जिम्मेदारियां कम करके माताओं के लिए सही माहौल बनाया जाए. इससे अपने बच्चों की सेवा में जुटी माताएं स्तनपान के लिए पर्याप्त समय दे सकेंगी. जहां तक कामकाजी माताओं का सवाल है, उन्हें पर्याप्त  मातृत्व लाभ देने और उनके लिए विस्तृत छुट्टियां (जहां आवश्यक हो) सुनिश्चित करने की जरूरत है. योजना आयोग, भारत सरकार के अनुसार कुल रोजगार का केवल 8 प्रतिशत संगठित क्षेत्रों में हैं, शेष 90 प्रतिशत से ज्यादा लोग, असंगठित क्षेत्रों में कार्यरत है. यहां दुखद है कि हमारा असंगठित क्षेत्र अब भी सामाजिक सुरक्षा के फायदों से दूर है. ऐसे में सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका उन निजी क्षेत्र के उन नियोक्ताओं की हो जाती है कि वो अपने कार्यस्थलों पर माताओं के स्तनपान करवाने के लिए एक सहयोगी वातावरण का  निर्माण करें.

माता की मनोवैज्ञानिक और सामाजिक बेहतरी तथा माता तथा शिशु के बीच बेहतर मेलजोल का माता के दूध पिलाने के प्रदर्शन पर काफी सकारात्मक प्रभाव पडता है. इसलिए, यह आवश्यक है कि माता को सही प्रकार का वातावरण, खासकर तनाव मुक्त माहौल मुहैया कराया जाये जिससे कि वह सफलतापूर्वक बच्चे को स्तनपान करा सके.

याद रखिए…..अधिकतम स्तानपान और पूरक आहार अपनाना आपके शिशुओं की पौष्टिकता, सेहत, शारीरिक तथा मानसिक वृद्धि, भावनात्मिक और सामाजिक विकास के लिए आपका एक निवेश है और इस प्रकार जीवनभर के लिए उसके समग्र विकास के लिए जरूरी है.

 क्या करने की है आवश्यकता

हमारे देश भारत में लगभग 11 करोड़ महिलाएं अलग-अलग क्षेत्रों में कार्य करती है. सर्वेक्षणों के अनुसार इनमें से 80 प्रतिशत माताएं बच्चों को स्तनपान करवाना तो चाहती है पर उनमें से 60 प्रतिशत माताएं बच्चों को स्तनपान नहीं करवा पाती. हमें बच्चे के इस महत्वपूर्ण अधिकारों को सुनिश्चित करवाने के लिए अपने कार्यालयों, संस्थानों को सेंनसेटाईज करने की आवश्यकता है.

मीडिया के माध्यम से प्रचार प्रसार के द्वारा लोगों को स्तनपान के महत्व के बारे में जागरूकता फैलाने की जरूरत है. मीडिया लोगों के मानसिकता में परिवर्तन लाने में अपना सहयोग प्रदान करें. मीडिया के माध्यम से लोगों को जागरूक कर कम स्तनपान के आकड़ें  को बढ़ा सकते हैं. हमारे सभी धर्म ग्रंथों में भी स्तनपान के महत्व के बारे में बताया गया है. स्तनपान के साथ ही बच्चों के पोषण से जुड़े कार्यक्रमों को सशक्त करने की जरूरत है साथ ही सरकारी योजनाओं के सही से क्रियान्वयन और उनके अनुश्रवण की आवश्यकता है.

निजी अस्पतालों में सी सेक्शन के माध्यम से होने वाल प्रसव के मामलों में स्तनपान की शुरूआत करवाने के लिए उनके साथ कार्ययोजना बना कर कार्य करने की आवश्यकता है.

कुपोषण और बच्चों का समुचित विकास विकासशील देशों के लिए बड़ा मुद्दा है. प्रकृति ने हर मां को स्तनपान के रूप में ऐसा वरदान दिया है जिससे वो अपने बच्चों को बिना किसी बाहरी खाने के (जन्म से 6 माह तक) स्वस्थ रख सकती है. भारत जैसे देश में बच्चों के पोषण को ध्यान में रखते हुए आवश्यकता है कि इस विषय के बारे में नीति निर्माताओं का ध्यान आकृष्ट किया जाए. क्योंकि बच्चे हमारे देश के हयूमन रिर्सोस कैपीटल है और उन्हें हम सब के, सरकार के, समाज के सहयोग की जरूरत आज और अभी है.

अविनाश उज्जवल

State Media Consultant, UNICEF ( Bihar)

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