झारखण्ड डायरी – लघु पशुपालन है संस्कृति व जीवनशैली का हिस्सा

रुपेश पाठक

जब मुरी एक्सप्रेस रांची से 11 किमी पहले टाटी सिल्वे रेलवे स्टेशन पर पहुंची तो लगभग सुबह के साढ़े नौ बज रहे थे, साथी और मेरे मेजबान सोनी जी का थोड़े देर पहले ही मुझे मैसेज मिला जिसमें उन्होंने टाटी सिल्वे पर उतर कर फोन करने को कहा था. लगभग सूनसान से दिख रहे इस छोटे से स्टेशन पर पीएलएफआइ और सीपीआई माओईस्ट के बंद का आव्हान वाले दो पोस्टर नजर आ रहे थे, ऐसा लग रहा था मानो यहां आने वाले हर नवागन्तुक के लिए यह झारखण्ड और रांची का पहला परिचय हो.

वैसे असल में झारखंड पर प्रकृति ने अपने सौंदर्य का खजाना जम कर बरसाया है. घने जंगल, खूबसूरत वादियां, जलप्रपात, वन्य प्राणी, खनिज संपदाओं के साथ ही जैविक विविधताओं से भरपूर और बहु संस्कृति के धनी इस राज्य में किसी यायावर के लिए देखने को बहुत कुछ है. चारों तरफ से जंगलों और पहाड़ों से घिरी झारखंड की राजधानी रांची समुद्र तल से 2064 फुट की ऊंचाई पर बसी है. रांची की एक खास विशेषता है, यहाँ की भाषायी विविधता. यहाँ हिंदी, नागपुरी, भोजपुरी, मगही, खोरठा, मैथिली, बंगला, मुंडारी, उरांव, पंचपरगनिया, कुडुख और अंगरेजी बोलने वाले आसानी से मिल जाते हैं. वहीं यहां के कई जलप्रपात और गार्डन पर्यटकों को रांची की ओर बरबस खींचते रहे हैं.

21 अप्रैल को जब मैं एक गैरसरकारी संगठन की ओर से झारखंड के आदीवासी समाज में चल रहे आजीविका प्रयोगों को समझने व यहां की कुछ प्रेरणादायक कहानियों की तलाश में यहां पहुंचा तो वाकई यह देखना और समझना सुखद था कि हर तरफ ऐसी शख्सियतों के उदाहरण बिखरे पड़े हैं जिन्होंने अपनी तकदीर की रेखाएं खुद खींची हैं. 22 व 23 की शुरुआत सुबह छ बजे से हुई. ये पूरा दिन रांची के अनगढ़ा ब्लॉक और उसके जंगलों में भटकते बीता. अनगढ़ा ब्लाक के टांटी पंचायत के मातकमड़ी गांव में हेलामनी का इंतजार करते हमें करीब दो घंटे बीत चुके थे. हेलामनी अपने जानवरों को लेकर जंगल निकली थीं. संपर्क के सारे प्रयास पानी मांग रहे थे. घने जंगलों के बीच बसे इस गांव में मोबाईल नाम का यंत्र किसी निर्जीव डिब्बे से अधिक कुछ नहीं है. वैसे भी जगंल का अपना कानून और अपना नियम है. हमने भी कैमरे की मदद से जंगल को पकड़ना शुरू कर दिया. आगे बढते हुए हम किसी सरकारी प्राथमिक विद्यालय सा नजर आने वाले किसी भवन के सामने थे. सरकारी भवन की स्थिति और और वहां शिक्षक की अनुपस्थिति सरकार की प्रतिबद्धता की सारी कलई खोल रही थी. जोन्हा व टाटी से आगे बढ़ते हुए मुझे सिगारी के साप्ताहिक हाट में बिक रहे हंडिया दारू और पोर्क की गंध के साथ ही आदिवासी जीवन के कलरव और जीवंतता का उत्सव दिख रहा था. यहां संदेह और शोषण का तंत्र बहुत साफ हो जाता है. जैसे ही आप कोई पता पूछने जैसा सामान्य सवाल करते हैं, उनकी आंखे संदेह से बड़ा हो जाती हैं और कान चैकन्ने, वो अपने अनुभवी नजरों से हर बार आपके सरकारी आदमी न होने का आश्वासन चाहता है. कई बार किसी आदिवासी साथी को बुलाने पर वह धीरे से जंगल की ओर खिसक  लेता है, यहाँ के लोगों में सरकारी पेट्रोलिंग का खौफ बहुत साफ दिखता है.

22 की शाम तक हम इन जंगलों के बीच से 6 केसेज का डॉक्यूमेंटेशन कर चुके थे. यहां हर केस का डॉक्यूमेंटेशन अपने आप में एक चुनौती था, पहली चुनौती स्वयं में जंगल था, जिसका एक सिरा हाथ में पकड़ में आता तो दूसरा सिरा छूट जाता. यहां हर एक कहानी किसी परी कथा की तरह थी, जिसमें मानवीय जज्बे का तिलिस्म भरा हुआ था. पशुपालन यूं तो कमोबेश देश के हर हिस्से में गरीबों की आजीविका का सशक्त विकल्प है लेकिन पठारी क्षेत्रों विशेषकर झारखंड में लघु पशुपालन संस्कृति व जीवनशैली का हिस्सा है. आदीवासी जीवन के कलरव व कोलाहल का अभिन्न अंग. यहां आबादी का एक बड़े हिस्से के  लिए यह आय व नियमित पोषण प्राप्त करने का एक जरिया है. इसके पहले 21 को ही रांची में आजीविका प्रशिक्षण में शामिल होने आई पशुपालक लक्ष्मी खालखो से मुलाकात हुई. लक्ष्मी झारखंड के आजीविका की पोस्टर वुमैन बन चुकी हैं.

हमार अंगली मंजिल थी छोटा नागपुर. झारखंड की राजधानी रांची से उत्तर-पश्चिम में करीब 60-65 किलोमीटर पर 1933 में कोलोनाइजेशन सोसायटी ऑफ इंडिया द्वारा बसाया गया मैकलुस्कीगंज. देखते ही देखते यह कभी मिनी लंदन के रूप मे विख्यात हो गया लेकिन आज भारत के एंग्लो-इंडियन समुदाय के लिए बुना यह खूबसूरत घोंसला तिनके-तिनके बिखर रहा है. समय के साथ तालमेल नहीं बिठा पाने के संकेत यहां के रिहाइश, राह और राहगीर सब पर नजर आते हैं. एंग्लो-इंडियन समुदाय के लिए तो यह गंज आज भी स्वर्ग से कम नहीं ! भले ही आज यह रमणीक ठिकाना उतना सुहाना न रहा हो और कुल मिलाकर एक सामान्य से गंवई कस्बे का रूप ले चुका हो. गंज से पलायन कर चुके एंग्लो-इंडियन परिवारों के खाली बंगलों पर नक्सलियों और अपराधियों के कब्जों के मद्देनजर सरकार ने यहां पुलिस बल तैनात किया है. पिछले कुछ दशकों में यहां के हालात लगातार खराब हुए पर फिर भी आशा की झिलमिलाती किरणें छिटपुट दिखती रहीं. जीर्ण-शीर्ण घरों, डॉक्टर विहीन चिकित्सा केंद्र, बिजली विहीन बिजली के तारों और निष्क्रिय पानी की टंकी जैसे निराशावादी संकेतों के बीच 1997 में खुले डॉन बॉस्को स्कूल के अहाते में बाहर निकले बच्चों के शोर से इलाका गुलजार लगने लगता है. मै 25 की रात 9 बजे लखनऊ पहुंच गया. पर असल में एक यात्रा अनवरत जारी है, उम्मीद की यात्रा, झारखंड से उपजे उम्मीद की यात्रा, निरंतर चलने वाली यात्रा. अगर वाकई मुझे साझा करना होता तो मै आपसे साझा करता, झारखण्ड के पहाड़, नदियां , जंगल और आदिवासी समाज की उत्सवधर्मिता.

रुपेश पाठक

 

 

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