बेरोजगार बना रहे हैं नोटबंदी और जीएसटी के कदम

गिरीश मालवीय 

नोटबंदी  और जीएसटी के संयुक्त प्रभाव से हम मंदी के दौर में प्रवेश कर गये हैं. अगर आप सोच रहे हैं कि यह सरकार औपचारिक रूप से मंदी की घोषणा करे तो यह संभव ही नही है, क्योंकि हमारे मोदी जी के हिसाब से तो जीएसटी के एक महीने में ही व्यापारी इतने खुश हो गए है कि बस सड़को पर आकर डांस करना ही बाकी बचा है.
देश में नवम्बर में नोटबन्दी ओर जुलाई में वस्तु एवं सेवाकर (जीएसटी) लागू होने के बाद विनिर्माण क्षेत्र में गिरावट आयी है, क्योंकि इस दौरान नये आर्डर  और उत्पादन में कमी रही है. निक्की इंडिया मैन्युफैक्चरिंग पर्चेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (पीएमआई) जुलाई में 47.9 रहा है, जबकि जून में यह 50.9 अंक पर था. फरवरी, 2009 के बाद यह विनिर्माण सूचकांक का सबसे निचला स्तर है. जुलाई का यह आंकड़ा 2017 में कारोबारी स्थिति में गड़बड़ी को दर्शाता है. पीएमआई सूचकांक के 50 अंक से ऊपर रहना विनिर्माण गतिविधि में तेजी को दर्शाता है,
अर्थशास्त्री पोल्लीन्ना डी लीमा ने कहा कि भारत में विनिर्माण वृद्धि जुलाई में थम गयी और इसका पीएमआई करीब साढ़े आठ साल में अपने सबसे निचले स्तर पर आ गया. इस तरह की रिपोर्ट है कि इस क्षेत्र पर वस्तु एवं सेवा कर के क्रियान्वयन का बुरा असर पड़ा है. इस सर्वेक्षण के अनुसार, जीएसटी के क्रियान्वयन का मांग पर असर पड़ा है. उत्पादन, नये आर्डर और खरीद गतिविधियां वर्ष 2009 के बाद सबसे निचले स्तर पर पहुंच गयी.
मैन्युफैक्चिरंग और माइनिंग गतिविधियों में कमी आयी है. मैन्युफैक्चरिंग में कमी के मायने अच्छे नहीं, क्योंकि मैन्युफैक्चरिंग का जैसे-जैसे विस्तार होता है, नौकरियों के ज्यादा मौके बनते हैं. इसमे कमी का मतलब है कि बेरोजगारी में वृद्धि जो सबको दिख रहीं है सिर्फ आंख पर मोदी चश्मा लगाने वालों को नही दिख रही है.
नए रोजगार देने की बात तो दूर रही , हकीकत यह है कि बीते एक साल में ऐसे रोजगार में 70 लाख की कमी आई हैं.

गिरीश मालवीय स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं.

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