मैं बैरिस्टर की लड़की सनम, अंग्रेजी पढ़ा दो जी !

 

(अनामिका हमारे समय की महत्वपूर्ण कवयित्री और लेखिका हैं. उनका लेखन स्त्री के जीवन से जुड़ी विडम्बनाओं और नियति का बहुत मार्मिक चित्रण हमारे सामने रखता है. अपनी गहन अनुभूति और संवेदनाओं से उन्होंने स्त्री विमर्श को एक नये मुकाम पर पहुंचाया है. प्रस्तुत आलेख में स्त्री शिक्षा जैसे ज्वलंत मुद्दे पर उनकी इस अनुभूति और संवेदनाओं की झलक मिलती है. यह संवेदना अनामिका का परिचय है और संभवतः यही साहित्यकार कृष्ण कल्पित द्वारा हाल में भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार 2017 के संदर्भ में उन पर की गयी आपत्तिजनक टिप्पणी का एक उचित प्रत्युत्तर. संपादक )

अनामिका

धुर बचपन में मैंने एक लोकगीत सुना था ! आज जब अपनी दादियों-परदादियों के उस आनंदातिरेक के बारे में सोचती हूं जो उन्हें हिंदी की पाठ्य –पुस्तकें, पत्रिकाएं पलटते हुए मिलता होगा तो यह लोकगीत मुझे बरबस याद आ जाता है जिसने मेरे बाल-मन को जिज्ञासु और काफी उद्धिग्र किया था.

‘मैं बैरिस्टर की लड़की सनम,

मुझे अंग्रेजी पढ़ा दो जी

आईए करा दो, बीए करा दो,

एमए का दर्जा दिला दो, सनम,

अंग्रेजी पढ़ा दो जी !’

ढोलक बजाकर मुहल्ले की अनेक स्त्रियां किसी शादी के घर में यह गीत गाए चली जा रहीं थीं और मेरा मन तरह –तरह के प्रश्नों से घिरा चला जा रहा था! उस समय इनके उत्तर मैं टटोल नहीं पाई, न किसी से पूछने की हिम्मत ही जुटा पाई, पर प्रश्न बहुत दिनों तक मन में घुमड़ते रहे.

  • अंग्रेजी पढ़ाने के लिए इतना इसरार, वह भी भावी पति से? पिता से नहीं, जिसके बैरिस्टर होने पर इतना जोर है?
  • पिता बैरिस्टर हैं, फिर भी उन्हें बेटी के लिए दूल्हा जुटाने की जल्दी है! पढाई पूरा किए बिना ही शादी ? कहीं मेरे साथ तो ऐसा नहीं हो जाएगा ? मुझे तो अनजान व्यक्ति से पढाई जारी रखने की मिन्नतें नहीं करनी पड़ेंगी?
  • यह कैसा रिश्ता है नए आदमी से, जहां मिन्नतें भी हैं और रोबदाब भी की मैं इतने बड़े तोप की बेटी हूं, इसलिए तुम अंग्रेजी पढ़ा दो, औपचारिक डिग्रियां भी तुम्हीं दिला दो. और वो पलटकर पूछेगा नहीं कि तोप की बेटी हो तो तोप से ही यह फ़रमाइश करती!
  • जो किसी तोप की बेटी न हो, क्या उसे डिग्रियां हासिल करने और अंग्रेजी पढ़ने का कोई हक़ नहीं?

ये सारे प्रश्न मन में लिए किसी तरह मैं बड़ी हो गई! आज उनके उत्तर टटोलते हुए, मैं आपसे साझा करती हूं अपनी नानियों –दादियों का बचपन, उन ‘विध्याविनोदिनियों’, ‘फ़ाज़िल’ और ‘जामिल’ पदवी प्राप्त वृद्धाओं का बचपन, औपनिवेशिक परिवेश में स्त्री शिक्षा के आधारभूत प्रमेयों का आकलन साधते हुए ! हिंदी –उर्दू क्षेत्र तक मेरा यह आकलन सीमित रहेगा और मैं ये मानकर चल रही हूं कि शिक्षा के सिवा स्त्रियों का मानसिक क्षितिज उन्नत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे कैलेंडर आर्ट्स, ग्रामोफोन , मूक फिल्में , रेडियो, रंगमंच और स्वाधीनता संग्राम !

तो क्या एक सूत्रधार भाषा , एक सहेली भाषा के रूप में हिंदी के साथ अंग्रेजी की कल्पना भी स्त्रियों ने की थी ? की होगी ! जो हाथ बढाए, वही अपना ! पर स्त्रियों के गणतंत्र में पदानुक्रम की कोई परिकल्पना नहीं , इसलिए भाषाओँ के बीच भी पदानुक्रम का सवाल नहीं उठता ! यह तो परिस्थितियों पर निर्भर है कि कौन भाषाएं आपकी मुंहलगी सहेलियां बनेंगी! जो भाषाएं मुंहलगी न हो पाई, संभाव्य सहेलियां तो वे भी हैं क्योंकि अनुवाद की पुलिया उनतक भी आराम से लिए जा सकती है !

1813 में ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा एक आज्ञापत्र जारी हुआ जिसके अनुसार कम से कम एक लाख की राशि मुहैया कराई जानी थी पढ़े लिखे भारतीयों के ज्ञान संवर्द्धन और विस्तार के लिए , और उनके वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकास के लिए किए जाने वाले उपक्रमों के लिए.

A sum of not less than one lac rupees would be set apart and applied to the  revival and improvement of literature, and encouragement of the learned natives of india, and for the introduction and promotion of a knowledge of science among the inhabbitat of the british territories in india.

बहुत लंबे समय तक यह विवाद चलता रहा कि शिक्षा का माध्यम क्या होगा. इसी बीच  1854 लंदन में बोर्ड ऑफ़ कंट्रोल से एक एजुकेशन डिस्पैच आया जिसके अनुसार ‘पौर्वात्य ज्ञान ‘ की सम्पूरकता का आयोजन होना था . कैसे ? अंग्रेजी में उपलब्ध करा के ! अनुवाद कार्य चल पड़े ! एक तरफ फ़ोर्ट विलियम कालेज में इब्ने इंशा, लल्लू लाल आदि विद्वान भारतीय भाषाओँ में बिखरे पौर्वात्य ज्ञान कोशों की सर्जना करने लगे, उसके अलावा भाषाओँ के व्याकरणिक नियमन के लिए शब्दकोश, व्याकरण कोष आदि बनने लगे. बैताल पचीसी, सिंहासन बत्तीसी आदि लौकिक और महाभारत, रामायण, भागवद पुराण, पंचतंत्र आदि आर्ष कृतियों का पुनर्कथन , संपादन व अनुवाद भी इसका अभीष्ट था.

दूसरी तरफ बनारसी प्रेस व दिल्ली कालेज आदि संस्थान स्कूली बच्चे-बच्चियों के लिए पाश्चात्य विज्ञान, समाज विज्ञान आदि की पुस्तकें हिंदी –उर्दू में व्यवस्थित रूप में लिखी जाने लगी क्योंकि तबतक यह तय हो चुका था कि उच्च शिक्षा का माध्यम बेशक अंग्रेजी हो, प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा का माध्यम हिंदी-उर्दू ही होंगे. यहीं पर एक विवाद यह उठा कि लड़कियां विज्ञान, समाज विज्ञान पढ़कर क्या करेंगी? वामा शिक्षक , कलावती, मिरातुल, ऊरूस, बिना-तुल-नश, तौबतुन-नुसूह आदि आरंभिक उर्दू-हिंदी उपन्यास स्त्री शिक्षा को लेकर हुए इन विवादों पर अपना यही अभिमत प्रस्तुत करते जान पड़ते हैं कि लड़कियों को पढ़ाना जरूर चाहिए मगर उतना ही जिससे वे गृह प्रबंधन, घर के आर्थिक नियोजन, सम्बन्ध नियोजन , शिशु पालन में सफल हो सकें और कलावती की तरह बाहरी ठगों से निबटने में सक्षम हो सके.

नवजागरण के पहले स्त्री शिक्षा के बारे में पनप रही रूढ़ियों का हवाला दें तो यह स्पष्ट होगा कि उस  समय के हिसाब से स्त्री विषयक पुरुष दृष्टिकोण में इतना सुधार भी काफी था! उसके पहले की स्थिति तो यह थी कि पढ़ी लिखी स्त्रियों से संसार खौफ खाता था. ये माना जाता है कि सरस्वती माता की बात अलग है, सामान्य स्त्रियों को विद्या ऐसे ही नहीं पचती जैसे कुत्तों को घी! पढ़-लिखकर  वे या तो कटखनी डायनें हो जाती हैं या मनहूस और चंठ विधवायें! सामान्य गृहस्थी चलाने लायक धीरज उनके पास नहीं रहता, जुबान कैंची की तरह चलती है और अंत में सारे बंधन काट डालती है आदि आदि !

इन्हीं पूर्वाग्रहों का नतीजा यह हुआ कि तिरहुत, मिथिला, बनारस आदि पारंपरिक शिक्षा केन्द्रों में विद्वान  जो घरेलू अंतेवाशी (छात्र) रखते थे, उनके साथ ही चर्चाओं में उनकी अपनी बेटियां, बहनें शामिल नहीं होती थीं. कई घरेलू आख्यानों और अंतर्वीक्षाओं के साक्ष्य से मैं यह कह सकती हूं कि कई बेटियां, बहनें और घरेलू नौकर घर के ओसारे में चल रहे विद्याभ्यास की मनिकाएं चुनकर ही कई नई बातें सीख जाते थे और शाम को खेल के मैदान में या भीतरी बैठकों में जब मालिक के बच्चों –भाइयों से इनका कोई विवाद घिर जाता था तो दे मारते थे एक श्लोक मुंह पर, श्लोक याद न रहा तो कवित्त ही गढ़कर भौंचक कर देते थे प्रत्याशी को , नन्हें विद्याधरों और लालबबुओं को. रोते –रोते गुरु के पास जाकर विद्या चोरी की शिकायत कर देते थे. जवाब में फिर उन्हें सुनने को मिलता था ऐसा कोई कवित्त:

‘जो पढ़तुम तो मरतुम

ना पढ़तुम  तो भी मरतुम

कहे को दांत खटाखट करतुम’

इस बाल कवित्त में व्यंग है उन लालबबुओं बेटों व छात्रों पर जिन्हें शिक्षा की सुविधा देकर बड़ा साहब बनाने की तैयारी की जा रही है. दांत खटाखट करतुम में व्यंग है उस रटंत विद्या पर जो ब्रह्म मुहूर्त में दी जाती थी. इस विश्वास के तहत कि इसी वक़्त सरस्वती माता धरती के राउंड पर निकलती हैं और जिस छात्र को नहा-धोकर चुटिया बांधकर शास्त्र कंठस्थ जिह्वाग्र करते देखती हैं, वह चुटकियों में उनकी कृपा से विद्वान हो जाता है. सुबह-सुबह उठकर नहाने-धोने में जो दांत किटकिटाते हों तो किटकिटाते रहें! पढ़कर भी मरना है, न पढ़कर भी मरना है, तो पढ़ें क्यों! शिक्षा से महरुम बच्चियां / मृत्यु –पुत्र इस तरह अपना प्रतिशोध पूरा करते थे. मृत्यु का परम सत्य इस मनोवैज्ञानिक युद्ध में उनका चुटीला हथियार बन जाता था! इस तरह के चुटीले हथियार का प्रयोग, त्रिलोचन के ‘चम्पा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती’ में चम्पा करती है. वह लानत भेजती है और ‘ बजर गिराती है’ ऐसे पढ़ने-लिखने वालों पर जो पिया को परदेसी बना देती है, घर पर नौकरी का जुगाड़ नहीं करती.

चम्पा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती
मैं जब पढ़ने लगता हूँ वह आ जाती है
खड़ी खड़ी चुपचाप सुना करती है
उसे बड़ा अचरज होता है:
इन काले चिन्हों से कैसे ये सब स्वर
निकला करते हैं.

 

चम्पा सुन्दर की लड़की है
सुन्दर ग्वाला है : गाय भैसे रखता है
चम्पा चौपायों को लेकर
चरवाही करने जाती है

 

चम्पा अच्छी है
चंचल है
न ट ख ट भी है
कभी कभी ऊधम करेती है
कभी कभी वह कलम चुरा देती है
जैसे तैसे उसे ढूंढ कर जब लाता हूँ
पाता हूँ – अब कागज गायब
परेशान फिर हो जाता हूँ

 

चम्पा कहती है:
तुम कागद ही गोदा करते हो दिन भर
क्या यह काम बहुत अच्छा है
यह सुनकर मैं हँस देता हूँ
फिर चम्पा चुप हो जाती है

 

उस दिन चम्पा आई , मैने कहा कि
चम्पा, तुम भी पढ़ लो
हारे गाढ़े काम सरेगा
गांधी बाबा की इच्छा है –
सब जन पढ़ना लिखना सीखें
चम्पा ने यह कहा कि
मैं तो नहीं पढ़ुंगी
तुम तो कहते थे गांधी बाबा अच्छे हैं
वे पढ़ने लिखने की कैसे बात कहेंगे
मैं तो नहीं पढ़ुंगी 

मैने कहा चम्पा, पढ़ लेना अच्छा है
ब्याह तुम्हारा होगा , तुम गौने जाओगी,
कुछ दिन बालम संग साथ रह चला जायेगा जब कलकत्ता
बड़ी दूर है वह कलकत्ता
कैसे उसे सँदेसा दोगी
कैसे उसके पत्र पढ़ोगी
चम्पा पढ़ लेना अच्छा है!

 

चम्पा बोली : तुम कितने झूठे हो , देखा ,
हाय राम , तुम पढ़-लिख कर इतने झूठे हो
मैं तो ब्याह कभी न करुंगी
और कहीं जो ब्याह हो गया
तो मैं अपने बालम को संग साथ रखूंगी
कलकत्ता में कभी न जाने दुंगी
कलकते पर बजर गिरे!

एक मज़े की बात यह है कि साहित्य में चम्पा, मिनी, मुनीज़ा आदि जितनी छोटी बच्चियों के चरित्र उभरे हैं , वे सब अपने पिताओं- संरक्षकों से खूब तर्क करती हैं, अंत तक अपने हथियार नहीं डालतीं. उन दिनों सारे साहित्यकार इस बाल चरित्रों में आगे आने वाली सवाक स्त्रीवादियों की फोरग्राउंडिंग कर रहे थे. अपनी पत्नी को बोलने की छूट भले ही न दी हो, पर कल्पना में आने वाले युग की सवाक तेजस्वी लड़कियां ही हैं. नागार्जुन की ‘गुलाबी’ चूड़ियां में ट्रक ड्राइवर की बेटी अपनी स्मृति जगाए रखने के लिए स्टीयरिंग पर अपनी चूड़ियां टांग देती है, फिराक़ तो मुनीज़ा को ‘इक वही है हमारी डिक्टेटर’ कहते हैं. प्रगतिशील कवियों के यहां तो भूमिगत रहने या परिव्राजक मनः स्थिति में रहने का अपराध बोध है जिसके प्रति उनकी बेटियां ही उन्हें सजग रखती हैं.

पूरा का पूरा हिंदी-उर्दू स्त्री समाज सच पूछिए तो विरहणियों का समाज रहा है! शादी हो भी गई तो क्या , घर में बच्चों –बुजुर्गों की ज़िम्मेदारी निभाते हुए रहना तो अकेले ही है, पति परमेश्वर या तो कमाने या आंदोलन चलाने/ क्रांति मचने चले गए हैं रंगून या बंगाल या आसाम जहां रोजगार के साधन बेहतर हैं और जहां की औरतें हैं इतनी सुंदर कि भेड़ बनाकर पाल ही लेती हैं, परदेसी पिया वाले गांव –देहात की स्त्री –टोलियों में ऐसे क़िस्से चलते ही रहते हैं, और चम्पा जैसी लड़कियों के मन में गुपचुप खौफ बैठ जाता है ऐसे शहरों का, तभी तो वह चिढ़कर कहती है-

‘कलकते पर बजर गिरे’

बजर गिरे ऐसी व्यवस्था पर जो शिक्षा और रोजगार के साधन भी अपने गांव, अपने शहर में मुहैया नहीं कराती. १९१७ -१९२७ के बीच अंजुमन-ए-हिमायते इस्लाम आदि संस्थानों के सहयोग से मुस्लिम लड़कियों के लिए खुली पाठशालाओं में प्रवेश का प्रतिशत अचानक से बढ़ गया. वो इसलिए की तब तक स्कूल की दीवारें उंची करा दी गई थीं और घर से स्कूल तक ले जाने वाले बंद इक्कों का बंदोबस्त भी हो गया था!

न हिन्दुओं में, न मुसलमानों में, सहशिक्षा पर सहमति किसी की भी नहीं बनी थी. भारतेंदु और सर सैयद अहमद को जिन दो खतरों का एहसास था, उनमें पहली तो यह कि हमारा मुल्क गर्म है, लड़कियां जल्दी रजस्वला (या मां बनने लायक ) हो जाती हैं, ऐसे में आग और तिनके को साथ रखने से पढ़ाई में खाक दिल लगेगा, दूसरा यह कि ‘प्रेम सागर’ , इतिहास-भुगोल आदि का अध्ययन लड़कों के लिए मुफ़ीद है, उन्हें दुनिया चलानी है, लड़कियां इसमें अपना समय क्यों जाया करें, उन्हें तो बस घर चलाना है और समाज को बेहतर संतानें देनी है, बिना नस्ली फेंट-फांट के. भाषा में तत्सम-तदभव-देशज-विदेशज की फेंट-फांट अच्छी है पर नस्ली फेंट-फांट? नहीं,नहीं ! नस्ली शुद्धता का मुगालता भी स्त्री शिक्षा में कम बाधक नहीं बना! स्त्री की देह हो या दिमाग, उम्रकैद ही उसको मुहैया रही. मेरी एक दोस्त रजिया बताती थी कि उसके नाना जब घर के बाहर जाते थे तो एक परत में चावल-दाल फेंट कर घर की सब लड़कियों को उसके आस-पास बिठा जाते थे कि घर का सब काम ख़त्म करके चावल-दाल का एक एक दाना अलग दो. खाली दिमाग शैतान का अड्डा तुम लड़कियों के लिए!

शिक्षा का मूल प्रयोजन है-साधनों और अवसरों की समानता, न्याय और क्षमा, दोनों मानवीय क्षमताओं का लोकहित में सम्यक नियोजन, काम-क्रोध-लोभ आदि मूल प्रवृत्तियों का नियंत्रण, लोक और शास्त्र, ह्रदय और बुद्धि, घर और बाहर के बीच का पदानुक्रम का अंत! पर अभी भी शिक्षा इन मूल उद्देश्यों से दूर ही है! शिक्षा अभी भी रटंत विद्या ही है! पर्यावरण की समस्या हो या वर्ग-वर्ण-नस्ल-सम्प्रदाय और लिंगगत पूर्वाग्रहों की समस्या, शिक्षित स्त्री की करुणामयी न्यायदृष्टि ही इनका सम्यक समाधान कर सकती है , और अफ़सोस की बात यह है कि अब तक व्यापक समाज का एक हिस्सा यह समझता है की जैसे कुत्तों को घी नहीं पचता, वैसे ही स्त्रियों को ज्ञान अगर्धंत बना देता है. ऐसा समझते हुए वे यह साफ़ भूल जाते हैं कि पहले की शिक्षा विरत स्त्रियाँ तो तन मन से सेवा करती थीं पर सिर्फ अपने घर की, शिक्षदीप्त स्त्रियां तन-मन-धन से सेवा करती हैं घर की भी, और बाहर की भी.शिक्षा से प्राकृतिक स्नेह तत्व और उद्दात ही होता है. घर-बाहर दोनों जोड़कर रखने की क्षमता बढ़ जाती है. स्त्री दृष्टी से चालित शिक्षा कभी इतनी अटपटी नहीं हो सकती जितनी आज है! भोपाल गैस कांड के बाद जो बहुत दिन बाद स्कूल खुले तो पुरुष शिक्षक ने कक्षा में प्रवेश करते ही कहा, ‘ हम कहां पर थे, किस पाठ पर?’ पर शिक्षिका ने बच्चों का हाल चल पूछा, उनके परिजनों के बारे में , फिर सामाजिक उत्तरदायित्व के प्रश्न से ऐसे हादसों को जोड़ना सिखाया, तब जाकर पाठ्य पुस्तक पर आईं, सबसे बड़ा पाठ तो जीवन खुद है, स्त्री दृष्टी यह जानती है, फिर भी विडंबनाएं उसके जीवन में सबसे ज्यादा हैं, कैसे ? यह मैंने कभी इस कविता के माध्यम से इंगित करना चाहा था-

अपनी जगह से गिर कर
कहीं के नहीं रहते
केश, औरतें और नाखून,
अन्वय करते थे किसी श्लोक का ऐसे
हमारे संस्कृत टीचर!
और मारे डर के जम जाती थीं
हम लड़कियाँ
अपनी जगह पर!

जगह? जगह क्या होती है?
यह, वैसे, जान लिया था हमने
अपनी पहली कक्षा में ही!
याद था हमें एक-एक अक्षर
आरंभिक पाठों का-
“राम, पाठशाला जा!
राधा, खाना पका!
राम, आ बताशा खा!
राधा, झाडू लगा!
भैया अब सोएगा,
जा कर बिस्तर बिछा!
अहा, नया घर है!
राम, देख यह तेरा कमरा है!
‘और मेरा?’
‘ओ पगली,
लड़कियाँ हवा, धूप, मिट्टी होती हैं
उनका कोई घर नहीं होता!”

जिनका कोई घर नहीं होता-
उनकी होती है भला कौन-सी जगह?
कौन-सी जगह होती है ऐसी
जो छूट जाने पर
औरत हो जाती है
कटे हुए नाखूनों,
कंघी में फँस कर बाहर आए केशों-सी
एकदम से बुहार दी जाने वाली?

घर छूटे, दर छूटे, छूट गए लोग-बाग,
कुछ प्रश्न पीछे पड़े थे, वे भी छूटे!
छूटती गई जगहें
लेकिन कभी तो नेलकटर या कंघियों में
फँसे पड़े होने का एहसास नहीं हुआ!

परंपरा से छूट कर बस यह लगता है-
किसी बड़े क्लासिक से
पासकोर्स बीए के प्रश्नपत्र पर छिटकी
छोटी-सी पंक्ति हूँ –
चाहती नहीं लेकिन
कोई करने बैठे
मेरी व्याख्या सप्रसंग!
सारे संदर्भों के पार
मुश्किल से उड़ कर पहुँची हूँ,
ऐसे ही समझी-पढ़ी जाऊँ
जैसे तुकाराम का कोई
अधूरा अभंग!

अनामिका

 

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